
आखिर विमल जी ने अपनी ठुमरी मे सास -बहू मेलोड्रामा और स्त्री के कामिनित्व व दुष्टता को नज़र लगा ही दी । उस दिन वे बड़े चिंतित थे इस पोस्ट में और हम भी टिप्पणी मे चिंता ज़ाहिर कर आए थे । पर सच कहें तो जाने कितने साल से इस चिंता मे हैं कि आखिर सीरियल क्यों हमारे समाज को और खासकर औरत को सदियों पीछे धकेल रहे हैं ? एकता कपूर को कई गालियाँ भी दे डाली मन ही मन ।
आज अखबार देखा तो पता लगा कि अफगानिस्तान की सरकार ने तुलसी और कसौटी जैसे सीरियलों पर रोक लगा दी है । ताली बजाने को मन हुआ ।पर पूरी खबर पढ कर खुशी को जंग लग गया । एक बन्द समाज की सुन्दर पैकेज में से उठती सड़ान्ध को माने दूसरे बन्द समाज ने नकार दिया हो ।यदि काबुल वालों ने ‘सास भी कभी बहू...’ को इसलिए नकारा होता कि ये कहानियाँ हमारे नागरिकों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए बिल्कुल भी ठीक नही हैं ,और ये साज़िश ,रंजिश ,हिंसा , विकृत -घिनौने चरित्रों व गलत सदेशों के इर्द गिर्द घूमती हैं ...तो अच्छा होता । लेकिन काबुलीसरकार ने कारण दिया तो केवल “विवाहेतर सम्बन्ध व टूटती शादियाँ ” । मुस्लिम समाज में बेहद लोकप्रिय होने पर भी ये सीरियल इन दो कारणों से कठमुलाओं को रास नही आये । साज़िश और बदले की भावनाओं से भरे हुए किरदार और कहानियाँ तो ठीक हैं पर शादी का टूटना और विवाहेतर सम्बन्ध कतई स्वीकार नही किये जा सकते ।आखिर अफगानी समाज पर इसका क्या असर होगा ?
शादी एक ऐसा बेसिक रिश्ता है जिसका टूटना किसी बन्द समाज को बर्दाश्त नही । और उसकी पवित्रता {?} को बचाए रखने के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं ।इन कहानियों में समाज के असली परेशानियाँ और स्त्री की मूलभूत समस्याएम कहाँ खो गयी हैं । घर को जोड़े रखना ,सत्य और त्याग की मूर्ति बनना ,करवाचौथ मनाना ,पति को देवता मानना । क्या यही हैं आज की स्त्री के जीवन की ज़रूरतें ?विमल जी ने जिन सीरियलों के नाम गिनाए वे साफ दिखा रहे हैं कि स्त्री की एक ट्रेडीशनल छवि को ही प्रोत्साहित किया जा रहा है ।
स्टार प्लस में एक खबर है “सास बहू और साज़िश ”जिसके पीछे का नारा है कि “क्योंकि सीरियल भी खबर हैं ” । इतना महत्व इन घटिया कहानियो को ? तो मुझे सबसे बड़ी आपत्ति है इस सीरियलों मे दिखाई जाने वाली साज़िशें और बदले और षडयंत्र और तानाकशी और सभी बुराइयों के बीच एक दिये सी खुद जलती और दूसरों को रोशनी देती अकेली सीता पार्वती सी नायिका से । जाने किस घर की कहनियाँ हैं ये ।गलतफहमियाँ पैदा करती हुई खलनायिकाएँ और रोती बिसूरती सावित्रियाँ जो सक्षम समर्थ हैं ।
ज़रूरत है इन सीरियल्स के पूरे बहिष्कार की ।
लेकिन मेरे या एक दो और लोगों के बहिष्कार से क्या होगा । जनता इन्हें लोकप्रिय बना रही है ,चैनल पैसे भुना रहा है ,सरकार हाथ पर हाथ रखे बैठी है ।
कहाँ से नियंत्रण स्थापित होगा । सरकार के हाथ मे हमेशा कैंची देना क्या सही होगा ? जनता क्या इतनी शिक्षित और समझदार है कि खुद ही इन्हे देखना बन्द कर दे ? क्या एक सेंसर बोर्ड होना चाहिये सीरियल्स के लिए ? या कि खुद निर्माता को जनता के प्रति यह ज़िम्म्मेदारी समझते हुए कहानियों का चयन ध्यान से करना होगा ।
Wednesday, April 23, 2008
सास बहू को विमल जी की नज़र लगी
Tuesday, April 15, 2008
IBRT -"पहले वे उपेक्षा करेंगे ,फिर वे हसेंगे ,फिर वे लड़ेंगे ...और फिर हम जीत जायेंगे ...."

बहुत छोटी थी जब एक बार धर्मशाला गयी थी ।बहुत हैरानी होती थी वहाँ बसे एक छोटे तिब्बत को देख कर ।अपने मे खुश ,बुद्ध के अहिंसक श्रद्धालु ,शरणार्थी और अति साधारण मानव । लेकिन दिल्ली के बस अड्डा के पास की मोनास्ट्री से निकल ये जीव अचानक सड़कों पर कैसे उतर आये हैं ये देख अब हैरानी नही हो रही ,स्वातंत्रय किसी भी जाति की सबसे बड़ी चाह है ।एक भारतीय शायद इस बात को बहुत बेहतर समझ सकता है । लेकिन क्या वह देश भी इसे समझ पाएगा जिसने दमित होने का , जिसने शासित और शोषित होने का दंश नही सहा ?क्या मुख्य धारा का आदमी कभी हाशिये के दर्द और विमर्श को समझ सकता है ?या उसके विद्रोह को अपने विद्रूप से सदैव झुठलाने की कोशिश करता है ?और जब हाशिये के पक्ष मे बोलता है तो हमेशा उसकी शक्ति का ह्रास करने के लिए ?
बड़ी हैरानी होती है जब हम विद्रोह और विरोध के कारणो पर न जाकर विद्रोह और विमर्श के तरीकों पर ही बहस करने बैठ जाते हैं ?
तिब्बती आज भड़क उठे हैं । क्या हम उनका शोर सुन पा रहे हैं ? या शोर पर सवाल उठा रहे हैं ? भारत मे जन्मी एक बेचैन तिब्बती आत्मा कह रही है कि हम वह शोर सुनें ।इस बेचैन आत्मा के सवाल हैं -
“Please relieve us from the expectations of a community which is non-violent in nature. Buddhism preaches non-violence, but which religion doesn’t? Isn’t it human to shout and protest if your country is suppressed for decades, despite attempts of peaceful dialogue? We are just humans, not Buddha”.
आज़ादी के साथ साथ यह सवाल है अस्मिता का । और किसी भी दमित जाति की अस्मिता का सवाल शक्ति ,सत्ता के नियंत्रण से टकराता है ।इस मायने में मैं स्त्री ,दलित या किसी भी दमित अस्मिता के सवाल को भी साथ ही जोड़कर देखूंगी ।
कोई भी अस्मिता जब मुखर होती है उसके पीछे कुछ ऐतिहासिक ,राजनीतिक ,सामाजिक करण होते हैं । स्त्री ,दलित अस्मिताओं के मुखर होने के पीछे भी रहे हैं । या सबसे सही यह है कि इतिहास अपने आप मे एक बड़ा कारण हो जाता है ।वर्ना कोई दमित अस्मिता अचानक एक ही दिन अत्याचार सह कर लड़ने को आतुर नही हो जाती ।40-50 साल के अहिंसक विरोध के बाद ही आज तिब्बत भड़क उठा है । सदियों के अन्याय सहने के बाद और अपनी लॉयल्टी {?}दिखाने के बाद ही स्त्री-दलित अस्मिताएँ अब जब तब भड़क उठती हैं ।
समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखा जाए तो किसी अस्मिता के मुखर होने के पीछे कुछ अनिवार्य तत्व होते हैं जैसे -
1.उस समुदाय या जाति द्वारा एक समान इतिहास शेयर करना ।
2. समान संस्कृति और परम्परा को शेयर करना
3. उस समुदाय के उद्गम सम्बन्धी समान धारणाएँ और मिथक -परमपरा से समान रूप से सम्बद्ध होना ।
एक समान इतिहास है जो एक स्त्री होने के नाते मुझे हर स्त्री से ही नही जोड़ता बल्कि हर स्त्री को उसके अतीत के साथ निरंतरता में खड़ा करता है। यहीं से उसे बल मिलता है ।दलित अस्मिता के साथ भी ये सभी घटक लागू होते हैं और तिब्बती लोगो के साथ भी । ये सभी अस्मिताएँ एक ऐतिहासिक प्रक्रिया के तहत आगे आई हैं ।और एक समान वर्तमान भी शेयर कर रही हैं ।केन्द्रीय शक्ति सत्ता और ज्ञान की मुख्यधारा से एक समान उपेक्षा और दमन भी शेयर कर रही हैं ।
कहने वाले अभी कह रहे हैं कि दलित बार-बार वही बात करते हैं उनके पास कहने को कुछ नया नही माना कभी अन्याय हुआ था पर अब भी क्यो रो रहे हैं ,स्त्री विमर्शकारों के भी सिर पैर नही और उनकी दलीलों मे कुछ नया नही ये सुघड़ औरतो की आत्ममुग्धता के अलावा कुछ और नही ,तिब्बती भी बुद्ध के अनुयायी होकर भी हिंसा पर उतारू हैं और इसलिए खोखले हैं वे इतनी जल्दी अहिंसा से हिन्सा पर उतर आये ? इतना ही सब्र था ?
माने यह कि हर बार की तरह विरोध के कारणो पर विचार न कर के हम सब विरोध के तरीकों पर बहस कर के इधर उधर खिसक ले रहे हैं ।सवाल पुराने होते जा रहे हैं और सच ये है कि वे बढते जा रहे हैं लेकिन उनके जवाब की जगह उपेक्षा मिल रही है । और सबसे बड़ा सच यह है कि ओलम्पिक की मशाल के साथ हर देश की सरकार खड़ी है ...........
मुख्यधारा की यह उपेक्षा और यह उपहास क्या वाकई इन अस्मिताओं को उभरने से रोक लेगा ?क्या हम भड़के हुए तिब्बत पर पानी डालकर उसकी आग बुझा देंगे .....?
बेचैन आत्मा का{जाने कितनी आत्माओं का}यह विश्वास है कि उपेक्षा और उपहास का यह सिलसिला थमेगा ।-
"Mahatma Gandhi has said "First they ignore you, then they laugh at you, then they fight you. And then... you win." I hope to God it’s true for Tibet!"
" पहले वे उपेक्षा करेंगे ,फिर हसेंगे ...हाशिये के पूरे पन्ने पर बिखर जाने वाला हास्य ...{या कहें अट्टहास } , फिर वे लड़ेंगे .....और तब हम जीत जायेंगे ।"
आमीन !!
IBRT -India born restless tibetan
Monday, April 7, 2008
औरतों ! तुम तलाक क्यों नहीं ले लेतीं ?
अब तो हद है ।मैं बार बार इस टॉपिक से पीछा छुड़ाने की कोशिश करती हूँ , ये भूत की तरह मेरे पीछे लगा रहता है । माजरा क्या है ? आज क्यो न इसे चुका दूँ , पीछा छूटे !एक बार ! आर या पार ! बस इतना सा झेलना और बच जायेगा कि जब तक फैसले न ले लूँ अपने दम पर !कोई नही बदलेगा तुम्हारे लिए । तुम खुद को बदल डालो । एक दम ! कईं सदियों के कष्ट का हल एक पल दूर है । ले डालो तलाक ! या कर दो इनकार ! नही करनी शादी ! नही बनना मुझे पत्नी !नही होना मुझे गुलाम !मैं अपनी शर्तों पे जिउंगी !ये अनाम मुझे सोच के रास्तों पर से गुज़रने के पहले ही भड़का दे रहे हैं ।मुझे एकदम से कोई हल नही सूझ रहा । बस एक झटका और सालों के नरक से निजात ! कितना सरल है न !आखिर अपने आप समाज सुधर जायेगा जब हम सब एक स्वर में खड़ी होकर कह देंगी कि जाओ हम तुम्हारे बिना रह लेंगे { क्या सचमुच ? }और जो कहे के बिन तुम्हारे रह भी नही सकती और इस तरह साथ रह भी नही सकती ,अपना चेहरा देखो कि कितने अमानवीय हो और अहसास हो जाए तो खुद को बदलो ,लेकिन वो तो नही बदलेगा ,तो मैं मुँह बन्द करके पड़ी क्यों नही रहती ,अपनी घुटन से औरों को रसातल का रास्ता दिखाने का कलंक तो न मिलेगा ?
लेकिन हद है कि कोई पत्नी साथ खडी नही होगी जब मैं कहूंगी-आर या पार ।क्योंकि कुछ मामलों में नही होता आर या पार । जब होता है तो सिखाना नही पड़ता ।वो चिंतन का एक सिलसिला होता है जो आर या पार के प्रश्न का उत्तर बन जाता है ।सोच के वो स्फुलिंग जगाना या जागना ज़रूरी है,वर्ना आर- पार के क्षण में भी तुम हार का रास्ता चुनोगी ।पार चुनने की हिम्मत स्वचेतना से आती है ,अस्मिता से मिलती है ,मैं क्या हूँ ? मैं ऐसी क्यों हूँ ? किसने किया ऐसा ? यह व्यवस्था क्या है ? किसके हित मे बनाई गयी ? किसने बनाई ? इसमे मेरी जगह क्या है ? ऐसी जगह क्यों है ? क्या मैं वाकई क्षीण हूँ ? तुच्छ हूँ ? क्या मेरे प्रति किये जाने वाले कुछ सांसारिक कार्य मेरा अपमान हैं जिन्हें मैं दुनिया की रीति माने बैठी हूँ ?
"जीव क्या है ? क्यों है ? जगत क्या है ?ईश्वर क्या है ? मैं संसार में क्यों हूँ ?"ये भारतीय अध्यात्म के आदि प्रश्न हैं जिनके जवाब खोजता हुआ मानव अपनी अस्मिता और अस्तित्व के प्रति सचेत होता है ।जब तक अस्मिता के सवाल ही मन में न उठें कोई भी फैसला हमारा कैसे होप सकता है ? कहाँ से आयेगी वह ऊर्जा जो किसी निर्णय के बाद के आने वाले परिणामों को झेलने के लिए हमारा मन तैयार करेगी ? और क्या हमारे निर्णय निरपेक्ष हो सकते हैं ?जिससे मैं प्यार करती हूँ , उसे उठा के पटक दूँ ,क्योंकि वह एक व्यवस्था के तहत् पला है? या धीम धीमे चोट करूँ ?
मेरी माँ के मन में नही उठे कभी सवाल !वह ज़्यादा पढी नही थी ! उसका ज़माना भी ऐसा था जब स्त्री आज के मुकाबले ज़्यादा बन्धन में थी !मैं ,उसकी अगली पीढी ,जाने कितने सवाल उठा रही हूँ , जाने कितने फैसले खुद ले पा रही हूँ ! मेरा समाज और परिवेश उसकी अपेक्षा में थोड़ा खुला है । मैं उससे ज़्याद पढी लिखी हूँ ।
सोचती हूँ अगर मैं 9-10 क्लास पढी होती ,क्या मैं इतने सवाल उठा पाती ? क्या मैं समझ पाती कि पितृसत्ता क्या है ? वो क्यों खतरनाक है मेरे अस्तित्व के लिए ?मुझे आएना कौन दिखाता रहा ? किताबें ? टी वी ? अखबार ? कॉलेज ?कैम्पस?बहन ? या कोई मित्र?कोई तो होगा !!स्वचेतना का उत्प्रेरक !
मैं कमज़ोर हूँ !मैं उठा के पटक नही सकती अपने पिता को ! अपने पति को ! मैं उन्हे प्यार करती हूँ !इसलिए मुझे वक़्त लग रहा है !वे मेरे असली कष्टॉ को पहचान रहे हैं । वे मेरा साथ देने की कोशिश कर रहे हैं । वे खुद को बदल रहे हैं ।बेशक धीमे धीमे । उठा के पटक सकती हूँ पर ऐसा नही करूंगी ।उनकी कोशिश बेकार हो जायेगी । मुझे उनका साथ चाहिये । मुझे मातृत्व सुख भी चाहिये ।मेरी संतान को भी माता पिता दोनो चाहिये ।बटन न लगाने वाली चिड़चिड़ि पत्नियाँ मेरे आस पास हैं ।उन्हें सोचने की सही दिशा चाहिये ।
आइना दिखाने से बेहतर क्या हो सकता है ?
डॉ. अम्बेदकर ने एक बार कहा था -"गुलाम को यह दिखा दो ,अहसास करा दो कि वह गुलाम है , और वह विद्रोह कर देगा !!"
चिड़चिड़ी पत्नी
झल्लाई औरत सुबह सुबह चकरघिन्नी सी भाग रही थी । सब ठीक ठाक निबट जाए यही सोच रही थी । रोज़ यही सोचती है ।कल जो कमीज़ बटन लगाने को दी गयी थी वह उसे भूल ही गयी थी । आदमी ने उसे लाकर रोटी बेलती औरत के मुँह पर पटका ।"तुमसे एक बटन नही लगाया जाता ,मेरे ही काम नही याद रहते !"औरत की आँख से झर् झर आँसू बहने लगे ।वह रोटी छोड़ कमरे की ओर लपकी तो आदमी बोला "अब कोई ज़रूरत नही है । मैने दूसरी कमीज़ पहन ली है ।"वह मुँह झुकाए वापस बच्चों के टिफिन पैक़ करने लगी ।सबके चले जाने के बाद उसे सुकून मिला । पर अभी और बहुत् से काम निबटाने थे । दिन कटा । पता नही चला ।रात को छोटा बिस्टर मे कुनमुना रहा था । आदमी झल्ला रहा था । "उँह ! आराम से सो भी नही सकते !"
औरत ने मन ही मन गाली दी "कमबख्त आदमी ! हरामी ,कुत्ता !इसे सबसे चिढ है । बच्चा क्या मैं दहेज में लायी थी ?रंजना पागल है । पति को रिझा कर बस में रखने के टिप्स मुझे नही चाहिये । पागल समझ रखा है ।बनावटी मुस्कान ला लाकर रोज़ बात करना मेरे बस का नही । थक जाती हूँ ।रोज़ बिस्तर गर्म कर सकूँ इतनी हालत नही बचती ।भाड़ मे जाए ।"और औरत दिन पर दिन ढीठ होती जा रही थी । वह चिड़चिड़ी थी । लड़ाक थी । आए दिन रिक्शेवलो ,औटोवालों ,धोबी से झगड़ती थी ।उसे झगड़ कर चैन मिलता ।आदमी भी यही कहता था "बस ! तुमसे तो झगड़ा करवा लो जितना मर्ज़ी !हर बात पे लड़ने को तैयार । बात करना ही गुनाह है । क्या करूँ ऐसे घर पर रहकर " और वह निकल गया संडे का दिन दोसतों के साथ बिताने ।झगड़ैल बीवी से तो निजात मिलेगी ।झक्की औरत संडे के दिन बड़े का प्रोजेक्ट बनवाती रही और पाव भाजी बनाकर बच्चों को खिलाती रही ।संडे की शाम आदमी लौटा तो औरत अगले दिन बच्चों के स्कूल के कपड़े इस्त्री कर रही थी । वह बटन लगाना संडे को भी भूल गयी थी ।क्या जानबूझकर !!?
Friday, March 28, 2008
मनुष्य़ मूलत: कबाड़ी है ..

जहाँ भी निकल जाए इनसान ..एक आशियाना साधारण ,छोटा ,जैसा भी , बनाता है उसमें रमता जाता है और धीरे धीरे एक गृहस्थी एक साम्राज्य खडा कर लेता है अपने आस- पास । फिर वक़्त गुज़रने के साथ उसमें से बहुत कुछ कबाड बनता जाता है ।फिर दिक्कत आती है उस कबाड़ के मैनैजमेंट की ।
{साफ कर दूँ कि यह कबाड़ वह कबाड़खाने वाला नही है ।}
कुछ दिन तक अनदेखा करते रहो घर को , रसोई को ,पढने की मेज़ को , किताबों-कपडों की अलमारी को और अचानक एक दिन घर कबाड़ खाना लगने लगता है और हम सब उसके कबाड़प्रिय कबाड़ी । 4-5 साल पहले दीवाली पर मन कर के खरीदा हुआ सुन्दर लैम्प शेड कब आँखों को खटकने लग जाता है पता ही नही चलता । पहले बडे मन से हम चीज़ें यहाँ-वहाँ से इकट्ठा करते हैं और वक़्त बीतते बीतते वे कबाड में तब्दील होने लगती हैं । पर मोह उन्हें फेंकने से रोके रखता है । जब बच्चे थे , घर में एक कोना ऐसा था जिसे हम खड्डा कहा करते थे ।वहाँ हर वह चीज़ जो काम की नही थी आँख मून्दकर फेंक दी जाती थी । कुछ पुराने जूते-चप्पल, एक-दो बाल्टियाँ ,पुराना हीटर ,एक खराब प्रेस ,पुराने अखबार ,मैगज़ींस ,स्पेयर बर्तन जिनकी कब ज़रूरत पडने वाली है पता नही ,सब कुछ उस अन्धे कुएँ में चला जाता था अनंत काल के लिए ।धीरे-धीरे नया सामान आता और पहले का नया सामान पुराना पड़ जाता । और खड्डा फैलता जाता था ।छतों पर पुराने ज़माने के ब्लैक एण्ड वाइट टीवी और कुछ लकडियाँ बारिशों में भीगते रहें और उसकी लकड़ी फूलती रही ।बहुत् साल बाद उससे छुटकारा पाया । अब भी यही हाल है ।फर्क यह है कि अब कोई खड्डा नही । इस छोटे से तीन कमरों के घर में कबाड़खाना बनाने लायक जगह नही है । इसलिए कबाड़ और असल सामान में फर्क धीरे-धीरे मिटता जा रहा है । जो आज नया है कल कबाड हो जाता है ।समेटे नही सिमटता । फिर भी नए कपडे खरीदे जाते हैं , पुराने फट नही रहे पर फेड तो हो रहे हैं ;अलमारी को साँस नही आ रहा । धुले कपडे -मैले कपड़े -घर आकर उतारे गये कपड़े ,धोबन दे गयी जो कपड़ॆ ,ऑल्ट्रेशन को जाने वाले कपड़े , ड्राईक्लीनिंग से आये कपड़ॆ बच्चे के छोटे हो गये कपड़े ,सब जहाँ जगह मिलती है पसर जाते हैं ।एक टेबल है । उस पर किसका सामान हो यह लड़ाई रहती है । श्रीमान जी मेरा सामान शिफ्ट करते हैं ,पीछे से मैं उनका कर देती हूँ । बच्चे का कहाँ जाएगा अभी कैसे सोचें ।अपने से फुरसत नही ।रसोई कभी कभी ज्वालमुखी सी बाहर फट पड़्ने वाली सी दिखाई देती है ।झल्लाहट होती है ।सामान ही सामान है इस घर में । सदियों से पड़ी सड़ती एक चीज़ जैसे ही ठिकाने लगाओ दूसरे तीसरे दिन कोई पूछ लेता है उसके बारे में ।
बिल आते हैं ,चिट्ठियाँ आती हैं , बैंक वालों के नितनये चिट्ठे आते हैं ,कुछ ज़रूरी खत भी आते हैं । सब इकट्ठे होते हैं ,एक दिन ढेर बन जाने के लिए ,जिसमें से किसी दिन अचानक अड्रेस प्रूफ के तौर पर ढूंढना पड़ जाता है कोई बिल ,या कुछ और । और नही मिलता । पुरानी किताबें पढी नही जातीं नयी आ जाती हैं हर बुक फेयर से ।
एक वक़्त ऐसा भी शादी के बाद कि घर से खाली हाथ निकले थे ,साल भर के अन्दर बहुत बड़ी चीज़े न सही पर बहुतेरा सामान इकट्ठा कर लिया था । सिर्फ गृहस्थों का यह हाल नही ।एक मित्र अकेली रहती थीं । उन्होने भी धीरे-धीरे एक साम्राज्य खड़ा कर लिया था अपने आस-पास । लगभग हर घर में अब देखती हूँ एक स्टोर रूम है जहाँ कुछ भी लाकर पटका जा सकता है । किसी के आने की खबर पर जहाँ बहुत कुछ ठूंसा जा सकता हो । कबाडखाना अलग न हो तो सारा घर ही कबाड़ी की दुकान में तब्दील हो जाता है ।
कभी कभी सोचती हूँ एक आदमी हर वक़्त तैनात चाहिये घर को कबाड बनने से बचाने के लिए । पुराने सामान को झड़्ने पोंछने के लिए । रद्दी की सॉर्टिंग के लिए । उतारे गये जूतों और इस्तेमाल न होने वाले चप्पलों को सहेज कर रखने के लिए । गर्मियों के आने पर स्वेटर कम्बल पलंगों और अलमारियों में धँसाने के लिए, कोट -शॉलें ड्राइक्लीन कराकर सम्भालने के लिए ।जूठे बर्तनों को उठा कर रसोई में पहुँचाने के लिए ,चादरें और तकिये के लिहाफ बदलने के लिए ,रैक से बाहर टपकती किताबों को बार बार रैक में पहुँचाने ले लिए, अलमारियों में कपड़े लगातार ठिकाने पर रखते रहने के लिए .............खपते रहने के लिए .....कबाड़ सहेजते समेटते हुए .....कबाड़ बनते रहने के लिए ......
Thursday, March 13, 2008
अहा ! सोना !! कितना आह्लादकारी !!

अहा ! सोना !! कितना आह्लादकारी है !!बरसों से सोच रही हूँ जैसे द्विवेदीयुगीन {ठीक से याद नही आ रहा नाम }एक लेखक के लेख है -"दाँत", "हाथ","नाक""कान" ...... या शुक्ल जी के ही "लोभ और प्रीति" "भक्ति -श्रद्धा" वैसे ही मै अपने प्रिय विषय "नींद" पर लिख डालूँ कुछ तडकता -फडकता । जैसा कि मेरा ब्लॉगर प्रोफाइल कहता है - सोना मेरा एक शौक है ।जब और कोई काम न हो मुझे सिर्फ और सिर्फ सोना पसन्द है {वैसे जब बहुत काम हो तब भी मेरा यही मन होता है कि सो जाऊँ } खैर ,मैं ऐसी बडी सुआड {लिक्खाड की तर्ज पर} हूँ यह मैने औरों से ही जाना है । होश सम्भालते -सम्भालते यह मेरे बारे मे प्रसिद्ध हो चुका था कि मुझे जब भी जहाँ भी कहा जाये कि -चलो सो ओ । तो मै बिना एक पल भी देर किये सो जाऊंगी । एग्ज़ाम के दिनों जब तपस्या कर रहे होते थे एक आसन पर विराज कर, झाड -झंखाड की भांति आस-पास पुस्तकें फैला कर ,तो बडी कोफ्त होती थी रात में सबके सो जाने के बाद । मन से गालियाँ फूट पडती थी हर एक व्यक्ति के प्रति जो कहता था - "हम सोने जा रहे हैं ,गुडनाइट ! ठीक से पढना ।" रात के एक डेढ बजते बजते किसी के उठने की आहट होती तो बरबस मन चिल्ला पडता था ---"अरे ! कोई तो आकर कह दो ,बेटा अब सो जा बहुत पढ लिया ।" हँह !! एम. ए. मे लेकचर अटेंड नही कर पाती थी {ये और बात है कि अब लेक्चर देने में बडा आनन्द आता है}। हद तो यह थी कि मुझे अपने बस्ते में टॉफी , काजू . मिसरी ,इलायची वगैरह रख कर ले जाना पडता था कि जब भी लेक्चर सुनते- सुनते नीन्द अने लगे मुँह चलाना शुरु कर दूँ । जैसे मच्छर "ऑल-आउट " के आदि हो जाते हैं और ऑल -आउट के सर पर ही मंडराने लगते हैं , मेरे ऊपर मंचिंग का उपाय बेअसर होने लगा । मैने क्लास करना बहुत कम कर दिया ।यूं ही पढाई की । टॉप-शॉप भी किया पर सोने की ललक मन में हर पल मचलती थी ।
फिर नीन्द को करारा झटका लगा जब संतान ने जीवन में प्रवेश किया । यह मेरी नीन्द पर कुठाराघात था । जब नन्हा शिशु दुनिया में आया मैने उस पर एक नज़र डाली । बस!! काम खत्म !! और सुख की लम्बी नीन्द में कई दिन के लिए एक साथ डूब जाना चाहा । {एक माँ की ऐसी स्वीकारोक्ति बडी पतनशील है न! } मुझे बहुत दिन तक बच्चा अपना प्रतिद्वन्द्वी लगता रहा । कमबख्त सारी रात जगता और सुबह जब घर के सारे काम मुँह बाये खडे होते वह चैन की नीन्द सोता और हम काम करते । क्या कहूँ ,मेरी नीन्द पर किसी और की नीन्द भारी पडने लगी । किसी भी और माँ की तरह मुझे भी यह स्वीकार कर लेना पडा कि मेरे "मैं" से ऊपर किसी और का "उँए -उँए... " है ।
नौकरी करते ,सुबह तडके उठ रसोई निबटाते ,तीन बार बस बदल कर हाँफते-हाँफते ऑफिस पहुँचते , पढाई भी साथ -साथ करते ,यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी से लौटते लौटते ,शाम को खाना बनाते और सबको खिलाते ,बच्चे को सुलाने के लिए बिस्तर पर धम्म से लेटते -लेटते यह हालत हो जाती कि अनायास मुख से निकलता था कि -
"ओह ! मैं कितनी खुशनसीब हूँ कि मुझे सोने को मेरा बिस्तर मिला और अटूट गहरी नीन्द !!"
पिछले दो-तीन दिन से एक प्रोजेक्ट के चलते नीन्द की शामत आ गयी थी । कल दिन भर से सर भन्ना रहा था और आँखों के आगे बस बिस्तर घूम रहा था । लोक-लाज का भय मिटाकर एक झपकी मैने कल के सेमिनार में कुर्सी पर बैठे -बैठे ले डाली । पर "ऊँट के मुँह में जीरा "साबित हुई। एक घटिया ,लकडी के फट्टे वाली कुर्सी पर भला क्या आराम मिलता । उलटा हाड-गोड दुख गये ।
घर पहुँच कर देखा सासू माँ ऑलरेडी थकान के कारण बीमार- सी पडी थीं । सर बस अब ज्यूँ फटा चाहता था ,आँखे बस अब बन्द हुआ चाह्ती थीं ,मन चीत्कार करना चाह्ता था ,लेकिन बेटे का स्कूल का होमवर्क कराना था ,सबको खाना खिलाना था । बहुत कर्म निबटाने थे । अंतत: डिस्प्रिन खा कर ,सर पर दुपट्टा बान्ध कर जब लेटी तो फिर मुँह से यही निकला -
"आह !! नीन्द कितनी आह्लादकारी है । कितनी अपनी है । कितनी सच्ची है । कितनी ज़रूरी है । मुझे दुनिया से छीन ले जाती है ,कहीं दूर ......परे ....बस मैं होती हूँ .....और नींद ...मेरे भीतर चुपचाप बहती सलिला सी ......जिसके किनारे पाँव डुबाये ,अकेली बैठ मैं जाने कितनी सदियों के लिए ऊर्जा समेट लेती हूँ ........."
Tuesday, March 4, 2008
कॉक्रोचों पर अत्याचार क्यों ?

नोट --ये एक अत्यंत गम्भीर पोस्ट है जो बहुत बडे प्रश्नों को उठाती है , कृपया इसे हास्य-व्यंग्य समझ कर अनदेखा न करें
कोई हमें निहायत असम्वेदनशील कहेगा अगर हम कॉक्रोचों का पक्ष लेने वालों पर हँसने लगें । आखिर वे भी इस जगत के जीव हैं और उन्हें भी किसी मच्छर मक्षिका की तरह जीने का हक है । और ब्लॉग बनाने का भी है । जब बैलों का हो सकता है तो कॉक्रोचेज़ का क्यो नही । हर जीव की अपनी उपयोगिता है । जीवन चक्र में से एक को भी माइनस कर दो तो सबै ब्योबस्था गडबडा जायेगी ।{खिचरी भाषा के लिये मुआफ करें , स्पॉंटेनिअस विचार ऐसी ही भाषा मे आते है :-)}आखिर कॉक्रोचेज़ कितने ज़हीन प्राणी होते हैं । और उतने ही सम्वेदनशील । जब हम लोग खा पी कर रात को चैन की बंसी वगैरह बजा रहे होते हैं तभी ये लोग दबे पाँव रसोई के अन्धेरे में उजागर होते हैं ,किसी देवदूत की तरह और सुनसान पडी रसोई को अपनी धमाचौकडी से गुलज़ार करते हैं । बेलन- कलछी -चम्मच के ये उजाड के साथी हैं ।ये न हों तो छिपकलियाँ क्या खाकर जियेंगी :-( पुरुषॉ को इनका विशेष आभारी होना चाहिये । ये विपदा बन कर स्त्री के सामने खडे हो जाते हैं और कामिनी को उनके नज़दीक लाते हैं । ये अपनी जनसंख्या को तेज़ी से बढाने मे माहिर है इस मायने में विशुद्ध भरतीय हैं । यूँ ही नही गूगल पर कॉकरोचेज़ के इतने सारे पेज दर्ज हैं ।वैसे आप सोच रहे होंगे कि इस कॉक्रोच - गुण -कथन का उद्देश्य क्या है । यूँ तो मानने को बहुतेरे हैं । न मानने को एक भी नही । पर फिलहाल एक सॉलिड कारण बता देते हैं ।
कॉक्रोचेज़ के प्रति हमारे मन में जो पूर्वाग्रह थे वे पिछले 15 दिन के मंथन के बाद दूर हुए । मंथन तब चालू हुआ जब हमने एक प्रेमी , अजी जीव-प्रेमी और कौन का प्रेमी ?, का "हिन्दुस्तान " में { हिन्दुस्तान दैनिक अखबार को कह रहे हैं , वैसे यह हिन्दुस्तान नामधारी राष्ट्र के नाम भी एक सन्देश ही समझा जाये } खेदजनक पत्र पढा जो उन्होने सम्पादक के नाम लिखा है । सम्पादक भी बडे रसिया हैं , मनबसिया हैं जो ऐसा पत्र छाप के होली की छेडछाड अडभांस में कर दिये हैं ।
पेश है पत्र -
क्या कोई और जीव भी ?
कॉलेजों में डिसेक्शन की प्रक्रिया के लिए महाराष्ट्र सहित देश भर के कॉक्रोचेज़ का प्रयोग हो रहा है । पहले मेंढक ,फिर चूहा और अब कॉकरोच ,विज्ञान के प्रयोगों के बलि चढते जा रहे हैं । कॉकरोच जैसे बेज़ुबान प्राणी पर यह अत्याचार ही तो है ।इस समाज में कॉकरोच गन्दगी का सूचक है तो क्या इनसान किसी से कम है ? महाराष्ट्र में क़ोलेज की डिसेक्शन प्रक्रिया के लिए एक -एक छात्र को असली आठ-आठ कॉकरोच चाहिये । यह कहाँ का इंसाफ है ? क्या पूरी कक्षा ही एक कॉकरोच से अपना प्रेक्टिकल पूरा नही कर सकती । पर्यावरण में कॉकरोचों का भी योगदान है । बच्चे कॉकरोचों से डरते नही । बल्कि इनकी मातारँ इनको दूध पिलाने के लिए कॉकरोचों से डराती हैं ।राजेन्द्र कुमार सिंह
से-15
रोहिणी
दिल्ली ।
{मुझे पूरा विश्वास है कि इस पत्र को सम्पादक ने एडिट किया है । जिस कारण हम कॉकरोच सम्बंन्धी अन्य कई महत्वपूर्ण जानकारियों से वंचित रह गये हैं । कोई भला मानस इस पत्र के लेखक को ब्ळॉग बनाकर अपनी बात कहने का लोकतांत्रिक माध्यम दिखाये ।}
तो दुनिया के कॉक्रोचेज़ एक हो जाओ !
हम बुद्धिजीवियों ने तुम्हारे लिये आवज़ बुलन्द की है । यूँ भी गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक कहती हैं न "कैन दि सबॉल्टर्न स्पीक ?" और ये भी कि बुद्धिजीवियों का कर्तव्य है कि वे निम्नवर्ग , दलित , शोषित के लिये आवाज़ उठायें क्योंकि वे खुद नही उठा सकते ।
एक विपरीत मत ये भी है कि -
खुदी को कर बुलन्द इतना कि हर स्प्रे से पहले , घर का मालिक तुझसे खुद पूछे -बता तरी रज़ा क्या है !वाह ! वाह!
अब ये कॉक्रोचेज़ का निजी मसला नही रहा । ये समाज का प्रश्न है जैसा कि राजेन्द्र जी ने अपने पत्र में कहा है । कृपया उदारता पूर्वक इस पर विचार करें ।
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