<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568</id><updated>2012-01-30T07:09:10.367+05:30</updated><category term='सीरियल विश्लेषण'/><category term='राजेन्द्र यादव'/><category term='तसलीमा नसरीन'/><category term='बचपन'/><category term='चीन'/><category term='वैलेंटाइंस डे'/><category term='DELHI  COMMISSIONER OF POLICE'/><category term='परफ्यूम'/><category term='pink chaddi campaign'/><category term='टैगोर इंटरनेशनल स्कूल'/><category term='बॉलीवुड मे स्त्री विमर्श'/><category term='बहस मे कुतर्क'/><category term='अनामिका'/><category term='aseemaa bhatt  भागी हुई लडकियाँ'/><category term='मनुष्य'/><category term='चोखेर बाली'/><category term='असीमा भट्ट'/><category term='सोना'/><category term='दो रास्ते'/><category term='स्वस्थ नौकर'/><category term='मुमताज़'/><category term='हिन्दी कविता'/><category term='निशा सूसन'/><category term='HARRY POTTER  MARKET  BOOK FILM AMERICA MAIN STREAM'/><category term='शिक्षक दिवस'/><category term='आज़ादी'/><category term='विज्ञापन'/><category term='घरेलू'/><category term='पूजा चौहान'/><category term='गधेलू'/><category term='किश्वर नाहिद पाकिस्तानी कवयित्री'/><category term='भिक्षा  वृत्ति  Hindi story'/><category term='अज़दक'/><category term='कबाड़'/><category term='aalok dhanva'/><category term='GENDER DISCRIMINATION'/><category term='laghu kathaa'/><category term='Poem'/><category term='किरण BEDI'/><category term='व्यंग्य'/><category term='बिन्दिया चमकेगी'/><category term='sahitya akademi'/><category term='मैं'/><category term='women liberation'/><category term='kyunki saas bhi kabhi bahu thee  तुलसी'/><category term='तस्लीमा नसरीन'/><category term='प्रेम का स्वरूप valentines day'/><category term='फुल-टाइम'/><category term='...'/><category term='निजता अर्चना'/><category term='बुर्का'/><category term='शिक्षा'/><category term='नटखट'/><category term='पतनशीला पोस्ट'/><category term='स्त्री'/><category term='प्यार'/><category term='घर'/><category term='HINDI लघुकथा'/><category term='दलित विमर्श Free Tibet'/><category term='।SHORT STORY'/><category term='लव दुआ'/><category term='नींद'/><category term='फ़िल्म perfume'/><category term='पतित पत्नी के नोट्स'/><category term='नंदीग्राम लोकतंत्र'/><category term='हिंदी कहानी'/><category term='हंस'/><category term='महात्मा गांधी'/><category term='जड'/><category term='मैंगलोर  पब कांड'/><category term='अस्मिता'/><category term='जवान'/><category term='कहती हैं औरते'/><category term='तिब्बत'/><category term='रिश्ते'/><title type='text'>notepad</title><subtitle type='html'>इस ब्लॉग के ज़रिये अपनी कलमघ‍सीटी को ब्‍लॉगबाजी में तब्‍दील करने का इरादा है। हम तो लिख्‍खेंगे, पढ़ना है तो पढ़ो वरना रास्‍ता नापो बाबा।</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>93</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-2630784573354164834</id><published>2010-04-29T08:46:00.008+05:30</published><updated>2010-04-29T14:32:07.671+05:30</updated><title type='text'>सिनेमा देखने जाएंगे तो गँवारू ही कहलाएंगे, मूवी देखिए जनाब !!</title><content type='html'>&lt;div&gt;आप अपने घर को फ्लैट कहना पसन्द करते हैं या अपार्टमेंट ? फिल्म देखने जाएँ तो उसे सिनेमा देखना कहेंगे या मूवी ? भई तय रहा कि आप 'सिनेमा देखने जाएंगे ' तो गँवारू ही कहलाएंगे । मूवी देखिए जनाब !! ई मूवी अमेरिका वाला भाई लोग ने बनाया है न! &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;गुलामी कोई देश केवल भौतिक रूप से नही करता। गुलाम देश की भाषा भी गुलामी के संकेत देने लगती है और धीरे धीरे दिमाग ही गुलाम हो जाते हैं।अंग्रेज़ की गुलामी के दौर मे उपनिवेश  का आर्थिक शोषण-दोहन किया जाता था । &lt;b&gt;&lt;i&gt;भारतेन्दु हरिश्चन्द्र&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; शोषण के इस रूप को समझ रहे थे और कभी छिपे -खुले ज़ाहिर भी कर रहे थे ।'निज भाषा ' की उन्नति भी उनकी चिंता थी । उनकी ये मारक लाइने नही भूलतीं - &lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;div&gt;अंग्रेज़ राज सुख साज सजै सब भारी &lt;/div&gt;&lt;div&gt;पै धन बिदेस चलि जात इहै अति ख्वारी &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वे ।कहने को आज हम आज़ाद हैं , पर क्या वाकई ? ये बड़े सवाल हैं , जिन पर रह रह कर मन मे विचार उठते हैं , दबते हैं , अपनी लाचारी से कराह उठती है , बैठ जाती है!और एक बड़े भारतीय जनसमूह के मन मे तो ऐसे सवाल उठते ही नही होंगे । उपनिवेशवाद ने आर्थिक गुलामी से  कैसे मानसिक -भाषाई गुलामी का रूप ले लिया है यह अह्सास तीव्र रूप में कल हमें हुआ जब बच्चो के एक स्कूल की पत्रिका मे ब्रिटिश अंग्रेज़ी के शब्दों के नए अमेरिकी इस्तेमाल पढे वर्ना शायद मैं इस ओर कभी ध्यान न देती कि ब्रिटेन की अंग्रेज़ी को सर माथे लेने वाली कौम कब धीरे धीरे अमेरिकी अंग्रेज़ी को अपना कर इठलाने लगी। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;देखिए - &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;अमेरिकन इंग्लिश           &lt;/i&gt;&lt;/b&gt; -    &lt;b&gt;&lt;i&gt;ब्रिटिश इंग्लिश &lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;Apartment ----------Flat&lt;/div&gt;&lt;div&gt;Bar -----------------Pub&lt;/div&gt;&lt;div&gt;Cab -----------------Taxi &lt;/div&gt;&lt;div&gt;Corn ----------------Maize&lt;/div&gt;&lt;div&gt;Movie ---------------Cinema&lt;/div&gt;&lt;div&gt;Pants ---------------Trousers&lt;/div&gt;&lt;div&gt;Eraser---------- ----Rubber&lt;/div&gt;&lt;div&gt;Sick -----------------Ill&lt;/div&gt;&lt;div&gt;Vacation-------------                     Holiday&lt;/div&gt;&lt;div&gt;Can------------                                tin&lt;/div&gt;&lt;div&gt;Flashlight ----------Torch&lt;/div&gt;&lt;div&gt;Overpass----------                 Flyover&lt;/div&gt;&lt;div&gt;Faculty -------------Staff&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ओह ! इरेज़र को रबर बोलना कितना खतरनाक हो गया है आप जानते नही है क्या । &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पहले कुठाराघात हिन्दी पर किया , स्वाभिमान को खतम करने के लिए ....अब देखिए हम उन्हे भी पीछे छोड़ कित्ता आगे आ गए हैं । अब हम &lt;b&gt;सबसे बड़े बॉस&lt;/b&gt; की गुलामी में नाक ऊंची करते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-2630784573354164834?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/2630784573354164834/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=2630784573354164834' title='30 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/2630784573354164834'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/2630784573354164834'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2010/04/blog-post_29.html' title='सिनेमा देखने जाएंगे तो गँवारू ही कहलाएंगे, मूवी देखिए जनाब !!'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>30</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-7372812454143025285</id><published>2010-04-28T09:56:00.000+05:30</published><updated>2010-04-28T11:56:55.784+05:30</updated><title type='text'>आप कितने बड़े "मैंने" हैं</title><content type='html'>आप अक्सर कुछ लोगों से बात करना , मिलना अवॉइड करना चाहते हैं अलग अलग कारणों से।स्वाभाविक भी है।हर किसी से नही मिलता मन। लेकिन दुनिया ऐसे नही चलती न!कभी न कभी आपको उनसे टकराना ही पड़ता है।रियल दुनिया की दोस्ती छोड़कर आप वर्चुअल स्पेस मे ही भाग कर क्यों न आ जाएँ ..आप उस प्रवृत्ति से बच नही सकते जिसे हम अपनी मित्र मंडली मे "&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मैने&lt;/span&gt;" कहकर अभिव्यक्त करते हैं।&lt;div&gt;&lt;br /&gt;ये &lt;b&gt;मैने&lt;/b&gt; कौन होते हैं?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;मैने वे है जो  आत्माभिभूत हैं और साथ ही जिन्हें लगता है कि समाज -बिरादरी -मित्र मण्डली में अपेक्षित स्थान सम्मान और आदर उन्हे नही मिल रहा जबकि वे तो कितने महान हैं।&lt;br /&gt;आप उनसे टकराए नही कि उधर से शुरु हो जाएगा ....." आप ऐसा कैसे कह सकते हैं &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मैनें ज्ञान-विज्ञान का प्रसार किया है&lt;/span&gt;, मैने अपने सारे अंग मृत्यु से पहले ही दान दे दिए हैं, मैने अपनी पत्नी को अधिकार दिए हैं, मैने अपना पतिव्रत धर्म निभाया है, मैने तो ...मैने कभी किसी का अहसान नही लिया...मैने कभी बे ईमानी ....मैने ये.. मैने वो .... अरे आप क्या समझते हैं मैने सारी ज़िन्दगी&lt;b&gt; हिन्दी की सेवा करने मे बिता दी.&lt;/b&gt;...भई मैने ..........&lt;br /&gt;मैने किसी की एक भी फालतू बात नही सुनी आजतक .. मैने अपने बच्चों को सबसे अच्छी एजुकेशन दी है , मैने तो अपने बच्चों को हमेशा फ्रीडम दी है.मैने... मैने ...मैं तो साफ साफ बात करता हूँ हमेशा चाहे बुरी लगे .... मै बहू-बेटी (या बेटा-बेटी भी हो सकता है) मे कोई फर्क नही करती ....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मैनें तो हमेशा ही सधी हुई लेखनी चलाई है ... मैने हिन्दी ब्लॉग जगत मे हमेशा ही विवेक - विश्लेषण की चेतना पैदा करने की कोशिश की है....आप क्या जाने मैनें हिन्दी ब्लॉग जगत मे किस किस बात का प्रसार किया और इसी मे अपना जीवन लगा दिया...मैने हिन्दी ब्लॉगिंग के लिए ...ब्ला ब्ला ....मैने हिन्दी ब्लॉग जगत मे ...ब्ला ... ..मैने ....मैने ...मैने.......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और आप मेरी मेहनत को क्षण भर मे एक खराब टिप्पणी करके नष्ट कर देना चाहते हैं ....मैने कभी किसी को खराब कमेंट नही दिया...मैने कभी किसी की पोस्ट की बुराई नही की..... मैने किसी विवाद का आगाज़ नही किया ......मै तो आपके ब्लॉग पर कभी नही गया आपको ही क्या ज़रूरत पड़ी थी यहाँ आकर मवाद बिखेरने की...&lt;br /&gt;हुँह !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप जानते हैं मैने कैसे कैसे हालात मे अपना कॉलम लिखा है ?अपनी बीमारी के बाद  अस्पताल से निकलते ही मैने फलाँ को बेटी के अपार्टमेंट में बुलाकर  अपना कॉलम लिखवाया और नियत समय पर 'हँस' मे भेजा ..और आप यूँ की कह देते हैं कि हमने फलाँ लेख गलत लिखा (यह हिम्मत!!) साहित्य के लिए मैने जो जो सहा है कोई नही सह सकता , सबसे बढकर मैने हिन्दी की जितनी सेवा की है वह कोई नही कर सकता (निराला या कोई प्रेमचन्द भी नही) इतने साल मैने साहित्य के लिए झोंक दिए।मैने हमेशा प्रतिक्रियाओ का सम्मान किया।मैने कभी रुपए पैसे का हिसाब नही रखा।&lt;br /&gt;और आपने किया ही क्या है जो टिप्पनी करने चले आते हैं?&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;आप हँसते हँसते कहेंगे कि जी हाँ आपने , आपने , आपने ....&lt;br /&gt;सब कुछ आपने ...&lt;br /&gt;हम तुच्छ प्रानी जाने क्यों इस धरती पर कीड़ों की तरह बिलबिला रहे हैं जबकि सारी क्रांति , सारा धर्म कर्म , सारा ज्ञान विज्ञान का प्रचार , सारी विद्वत्ता , सारा परोपकार तो आप ही करते आए हैं कर रहे हैं!!हम तो बे ईमान हैं, कामचोर हैं, हिन्दी की सेवा नही करते, विज्ञान का तो &lt;b&gt;व&lt;/b&gt; भी नही जानते,बच्चों को सबसे घटिया सस्ते स्कूल मे पढाते हैं,सबकी फालतू बात भी हम ही सुनते हैं...उधार करते हैं, हम अधर्मी हैं  ....सबके अहसान लेते हैं ...हम साफ बात नही  करते.. आप धन्य हैं ! अब हमे जाने दीजिए प्लीज़!अपन तो ये भी नही जानते कि यहाँ करने क्या आए हैं !&lt;br /&gt;और आप पिण्ड छुड़ाकर भागेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;-----------&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;चिंता न करें , इस लेख की कोई कड़ियाँ नही आने वालीं। वैसे  आप तो जानते ही हैं मैने कभी व्यक्तिगत आक्षेप नही किए , न ही मैने किसी का कभी दिल दुखाया , मैने तो यही सोचा है कि कुछ समझ का विस्तार हिन्दी ब्लॉग जगत मे कर सकूँ ... भई मैने तो मैने मैने कभी नही किया :) &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-7372812454143025285?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/7372812454143025285/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=7372812454143025285' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/7372812454143025285'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/7372812454143025285'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='आप कितने बड़े &quot;मैंने&quot; हैं'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-1274089442636675106</id><published>2010-04-27T09:46:00.007+05:30</published><updated>2010-04-27T10:35:16.902+05:30</updated><title type='text'>बच्चे हमारे खेत की मूली नही हैं !</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/S9ZwBB04ZiI/AAAAAAAAAT0/Au1xzRzSJLc/s1600/3603204555_7565879346.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 298px;" 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डपटते रहिए..वे आनन्द के गोते लगाएंगे ..आप झरने से बहते कल-कल पानी ,हवा मे झूमते पेड़ों की ताली बजाती पत्तियों और बुलबुलों के कलरव का सा आनन्द लेंगे उनके इस आनन्द भरे खेल मे।&lt;br /&gt;लेकिन यह भी सपने जैसा लगता है।महानगरों में बच्चों के खेलने की जगहें लगातार कम हो रही हैं , मॉल बढ रहे है।जो पार्क हैं भी वे या तो बूढों के अड्डे हैं या जवानों ने सुबह शाम वॉक के लिए कब्ज़ा लिए हैं।बच्चों के लिए चेतावनियाँ लिख दी गयी हैं - साइकिल चलाना मना है , गेन्द लाना मना है , पकड़े जाने पर जुर्माना ...छोटे छोटे बच्चे सड़क पर क्रिकेट खेलें या साइकिल चलाएँ क्या ?&lt;br /&gt;खेलना बच्चों के लिए ठीक वैसे ही ज़रूरी और नैसर्गिक क्रिया है जैसे कि भूख लगने पर भोजन करना।और जो अनुभवी हैं वे जानते हैं कि खेलना बच्चों को खाने से भी अधिक ज़रूरी और प्रिय दिखाई पड़ता है।खेल का समय बच्चों का वह स्पेस है जो बड़ों की दुनिया मे किसी भी तरह उन्हे हासिल नही होता।प्रकृति के समीप होना , आस पास को जानना , भावनात्मक , समाजिक और शारीरिक विकास के लिए 'खेलना'एक बेहद ज़रूरी बात है जिसे तमाम शिक्षाविद, समाजशास्त्री, बाल विशेषज्ञ बार बार कह चुके।शिशु-शिक्षण प्रणालियों में किंडरगार्टन और मॉंन्टेसरी पद्धति सभी मे खेल के द्वारा सीखने पर ज़ोर दिया गया।खेल मानवीय विकास का बेहद नैसर्गिक और बेहद सामान्य तरीका है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहर खेलने की जगहें और अवसर ही नही रहेंगे तो बच्चे अपने आप टी वी , कम्प्यूटर जैसे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स की ओर रुख करेंगे।इसका एक बड़ा कारण शिक्षा और खेल पर बराबर ज़ोर न होना भी है । कितने स्कूल खेलने के लिए छोटे बच्चों को रोज़ के टाइम टेबल मे जगह देते हैं।नर्सरी का बच्चा भी पूरा दिन कक्षा मे बन्धक की तरह बिठाया जाता है। खिड़की से बाहर झाँकने और पढने के घण्टे में तितली पकड़ने मे मस्त होने पर बुरी तरह लताड़ा जाता है, दोस्त बनाने की कोशिश में शिक्षक की झिड़कियाँ खाता है , उस नन्हे आज़ाद पंछी को लगातार 'चुप' रहने को कहा जाता है।उन्हे खेलने दीजिए , बढने दीजिए ..नही तो वे कुण्ठित हो जाएंगे ।कैसे इन्हे समझाएँ कि स्कूल को जेल मत बनाईये जहाँ खेलने का समय बचाने के लिए बच्चा अपना टिफिन छोड़ दे और दिन भर भूखा रहे ।प्राण जाए पर खेल न जाए !   &lt;br /&gt;ऐसे मे यह महसूस होता है कि शिक्षा के अधिकार से भी ज़रूरी बाल- अधिकार '&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;खेलने का अधिकार'&lt;/span&gt; है जिसे हम बच्चों से छीन रहे हैं। राजेश जोशी की कविता 'बच्चे काम पर जा रहे हैं 'एक और दर्दनाक पक्ष दिखाती है।यहाँ वे बच्चे हैं जो किसी भी अधिकार से वंचित हैं , दर असल वे बचपन से ही वंचित हैं । वे असमय प्रौढ हो जाने को अभिशप्त हैं।खेल -कूद की उम्र मे काम पे जाना और पढने की बजाए गाहक को रिझाना सीखना उनके साथ वह अमानवीय अत्याचार है जिसे रोकने मे राज्य और समाज दोनों ही नाकाबिल साबित हुए हैं।&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;किसी भी समाज और देश का भविष्य इससे तय होता है कि वह अपने बच्चों ,भावी नागरिकों के साथ कैसे पेश आता है।बच्चे हमारे खेत की मूली नही हैं ! उन्हे उनका बचपन नही मिलना इस बात का संकेत है कि हमें हमारा भविष्य नही मिलेगा !&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-1274089442636675106?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/1274089442636675106/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=1274089442636675106' title='17 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/1274089442636675106'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/1274089442636675106'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='बच्चे हमारे खेत की मूली नही हैं !'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/S9ZwBB04ZiI/AAAAAAAAAT0/Au1xzRzSJLc/s72-c/3603204555_7565879346.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-83264584049173108</id><published>2009-04-01T17:34:00.000+05:30</published><updated>2009-04-01T17:38:05.168+05:30</updated><title type='text'>एलिस इन वंडरलैंड</title><content type='html'>अच्छी लड़की ।सीधा कॉलेज ।कॉलेज से सीधा घर ।आँखे हमेशा नीची । लम्बी बाह के कुर्ते और करीने से ढँकता दुपट्टा ।पढने मे होशियार ।शाम को कभी घर से बाहर नही निकली । छत पर अकेली नही गयी । यहाँ कैम्पस में सारी शिक्षा ,सारी संरचनाएँ ढह गयीं छत और आँगन और सड़कें एकाकार हो गयीं ।आज़ादी का पहला अहसास ।हॉस्टल के कमरे में पहली बार वोदका को लिम्का मे मिलाकर पिया और घंटों मदहोश रही ।खों-खों करते सिगरेट का पहला कश खींचा ।कैम्पस में ढलती शाम को सडक के दोनो किनारे फूटपाथ के किनारे बनी मुँडेरी पर दो दो छायाएँ दिखाई पड़ जातीं । मुख पर एक स्मित रेखा खिंच आती ।हॉस्टल की ज़िन्दगी । परम्परावादी घरों से निकली हुई लडकी के लिए एक एडवेंचर "एलिस इन वंडर्लैंड "जैसा ।कोई देख नही रहा ।देखता भी हो तो मेरी बला से,कौन फूफा- मामा- ताया -ताई लगता है । &lt;br /&gt;बहुत चाहा था कि हमें भी हॉस्टल भेज दिया जाए लेकिन माँ-पिताजी ने साफ इनकार कर दिया -'हॉस्टल में लड़कियाँ बिगड़&lt;br /&gt; जाती हैं , और ज़रूरत भी क्या है हॉस्टल मे रहने की घर से कॉलेज एक घण्टा ही तो दूर है '।तो हमारा बस नही चला ,और कैसे कह देते कि बिगड़ना ही तो चाहते हैं हम भी , या हिम्मत नही हुई पूछ लें कि 'बिगड़ना क्या होता है '। तीखी प्रतिक्रिया के बाद खुद पर से ही विश्वास डगमगा गया और माता पिता का तो ज़रूर डगमगाया ही होगा यह सोच कर कि जाने क्यो अच्छी भली लड़की ऐसा कह रही है ,किसने सिखा -पढा दिया , गलत सोहबत मे तो नही पड गयी ।&lt;br /&gt;बहुत सालों तक युनिवर्सिटी आते जाते देखती रही इठलाती लड़कियों को जो पी जी विमेंस मे आकर ठहरती थीं । वे अपने कपड़े खुद खरीदने जातीं , भूख लगने पर और मेस का खाना पसन्द न आने पर अन्य इलाज क्या हो सकते थे वे जानती थीं ,तमाम प्रलोभन सामने होने पर भी वे परीक्षाओं के दिनों मे जम कर पढाई करती थीं ,शहर के किसी कोने मे अकेले आना जाना जानती थीं ।&lt;br /&gt;इधर हम फूहड़ता ही हद थे ।माँ के साथ ही हमेशा कपड़े जूते खरीदे । उन्हीं के साथ हमेशा घूमे । उन्हीं के साथ फिल्में देखीं ।कॉलेज हमेशा एल-स्पेशल से गये । कॉलेज भी एल-स्पेशल ही था । दिल्ली के पॉश इलाके का कॉंनवेंट  कॉलेज । सामने भी एल -स्पेशल कॉलेज। नॉन एल-स्पेशल कॉलेज हमारे इलाके से बहुत दूर हटके थे । कोने मे पड़ा हुआ एक ऊंची ठुड्डी वाला कॉलेज जिसमें पढ कर हमने टॉप तो किया पर दुनियादारी में सबसे नीचे रह गये ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस वक़त मे हम यह भी सुना करते थे कि हॉस्टल मे पढी लड़की की शादी मे भी अड़चन आती है।भावी ससुराल वाले समझते हैं कि ज़रूर तेज़ तर्रार होगी वर्ना इतनी दूर आकर हॉस्टल मे कैसे रह पाती?शादी के बाद सबको नाच नचा देगी।&lt;br /&gt;वह यही चाहते है कि लड़कियाँ दबें,वे झुकें,वे मिट जाएँ ॥ मै सोचती हूँ कि बिगड़ना लड़की के लिए कितना ज़रूरी है और तेज़ तर्रार होना भी।आत्मनिर्भरता की जो शिक्षा हॉस्टल मे रहते मिल जाती है वह झुकने और मिटने दबने नही देती।।माहौल थोड़ा बदला है शायद घर की घुटन और हॉस्टल की आज़ादी में अंतर कम हो गया है । पर अब भी बाहर से आयी लड़कियाँ यहाँ ज़िन्दगी के कड़े पाठ सीख रही हैं । उन सी आत्मनिर्भरता हममें अब जाकर आयी है , यह  देख ईर्ष्या होती है । घर से दूर अकेले ,अनजान शहर में रहना और आना-जाना जो विवेक पैदा करता है वह सीधे कॉलेज और कॉलेज से सीधे घर वाली लड़्कियाँ शायद ही वक़्त रहते सीख पाती हैं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज से दस साल पहले के मुकाबले आज दिल्ली जैसे शहर का वातावरण कहीं अधिक उन्मुक्त है।लेकिन इस उन्मुक्ति के आकाश में क्या वह आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान सच में दमक  पाया है जिसकी मुझे हरदम उम्मीद है? जो उन्मुक्त हैं वे बेहद हैं केवल वर्गीय अंतर के कारण।साथ ही इस स्वतंत्रता मे समझ और सोच भी शामिल है इसका मुझे कुछ सन्देह है।&lt;br /&gt;जो बन्धी थीं वे अब भी बन्धी हैं।रोज़ के समाचार उन्हें और डराते हैं।जो सचेत हुई हैं वे अब भी बहुत कम हैं!लड़की न जाने इस वंडरलैंड में कब तक भटकती रहेगी और अपनी पहचान खोज पाएगी !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-83264584049173108?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/83264584049173108/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=83264584049173108' title='19 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/83264584049173108'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/83264584049173108'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/04/blog-post_24.html' title='एलिस इन वंडरलैंड'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>19</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-8843413712525515450</id><published>2009-02-14T07:58:00.006+05:30</published><updated>2009-02-14T09:04:14.075+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्यार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वैलेंटाइंस डे'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रेम का स्वरूप valentines day'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आज़ादी'/><title type='text'>प्यार करने वाले कभी डरते नही,जो डरते हैं वो ...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SZYzSKlILrI/AAAAAAAAATI/tIcp8IDdsDc/s1600-h/rose"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 140px; height: 105px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SZYzSKlILrI/AAAAAAAAATI/tIcp8IDdsDc/s400/rose" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5302481998446079666" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जी हाँ , शायद वैलेंटाइंस डे का रंग है यह, मैने कभी नही मनाया, पर आज मनाने का मन है।जाती हूँ गुलाब खरीदने।पर पहले दो लाइने लिख दूँ।सोच रही हूँ,प्यार पर कुछ कहने का क्या हक बनता है जबकि इस एक नाम के मायने हर एक के लिए अलग अलग हो जातें हों।इसलिए प्यार क्या है पर नही कहना ही सब कुछ कह देने जैसा है।'ये भी नही,ये भी नही'करके शायद कोई उस तक पहुँच पाए।&lt;br /&gt;शायद यह आश्चर्य की बात नही कि समाज फिल्मों मे प्यार करने वालों को जुदा होते देख जितना रोता है उतना ही खफा होता है जब यह सीन अपने घर मे देखने को मिल जाए। कत्लो गारत मच जाती है,लड़के-लड़कियाँ सूली से लटका दिए जाते हैं,राजवंशों के प्रेम की बात तो बिलकुल ही नही करूंगी।ऑनर किलिंग्स और इमोशनल ब्लैकमेलिंग पर केन्द्रित है मेरी दृष्टि।&lt;br /&gt;ऐसा क्या है कि हमारा समाज प्यार का समर्थन नही करता लेकिन विवाह का पूरा पूरा समर्थन उसे प्राप्त है चाहे वह विवाह पीड़ादायक ही क्यो न हो, उसे निभाए चले जाना बहुत ज़रूरी बना दिया जाता है।अगर मै प्यार की फितरत पर जाऊँ तो बात कुछ समझ मे आती है।प्रेम अपने मूल स्वरूप मे आपको आज़ाद करता है, हिम्मत देता है,बहुत बार बागी बना देता है,अपनी ख्वाहिशों के प्रति सचेत करता है,और अकेलेपन की चाहत रखता है।&lt;br /&gt;इसके ठीक विपरीत विवाह बान्धता है,उलझाता है,सामाजिक सुरक्षा सबसे ऊपर होती है,घरबारी आदमी पंगा नही लेना चाहता,समाज की अपेक्षाओं पर खरा उतरना चाहता है,ख्वाहिशों का केन्द्र बदल कर "अन्य" हो जाताहै,और विवाह हमेशा सार्वजनिक उत्सव की तरह मनाया जाता है और यह दखलान्दाज़ी ताउम्र चलती रहती है।&lt;br /&gt;विवाह संस्थाबद्ध है तो प्रेम व्यवस्था-भंजक है।प्रेम एकांत है विवाह सामाजिक स्वीकृति है।शादी के नियम हो सकते हैं,प्यार का कोई रूल नही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेम और विवाह के इस मूल स्वरूप को समझ लेने के बाद साफ हो जाता है कि कोई भी मॉरल-सेना क्यों प्यार का विरोध करती है।प्यार आज़ाद करता है और हम आज़ाद ही तो नही होने देना चाह्ते।इसलिए आस पड़ोस ,घर परिवार नाते रिश्तेदारों से लेकर सभी प्यार के विरुद्ध अपने अपने बल्लम उठा कर खड़े दिखाई देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समाज और व्यक्ति का यह द्वन्द्व हमेशा चलता रहता है और समाज दण्ड और पुरसकार की नीति अपना कर हमेशा ही व्यक्ति को नियंत्रित करने के प्रयास मे रत रहता है।यह दण्ड कंट्रोल करने वाले ग्रुप की समझ के मुताबिक घर-&lt;br /&gt; निकाला भी हो सकता है,जायदाद से बेदखली भी हो सकती है,मौत भी हो सकती है या पार्क बेंच पर बैठा देख शादी करवा देना भी हो सकता है।&lt;br /&gt;मुझे यह कहने मे कतई शक नही कि हमारा समय और समाज प्रेम विरोधी है,इसलिए मुझे हैरानी नही कि बहुत से माता-पिता वैलेंटाइंस डे की खिलाफत से प्रसन्न दिखाई दे रहे हों और मन ही मन मे राम सेना की जयजयकार भी कर रहे हों।प्यार अच्छा है, पर कहानियों में.....जिन्हें पीढी दर पीढी सुनाया जाए हीर-रांझे, सोनी-महिवाल की दुखांत गाथा के रूप मे अवास्तविक स्वप्नलोक की सूरत देकर।और सीख दी जाए हमेशा राम-सीता के वैवाहिक प्रेम के आदर्श की,प्रेम निवेदन पर जहाँ काट दी जाए नाक किसी स्त्री की।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-8843413712525515450?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/8843413712525515450/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=8843413712525515450' title='167 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/8843413712525515450'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/8843413712525515450'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2009/02/blog-post_14.html' title='प्यार करने वाले कभी डरते नही,जो डरते हैं वो ...'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SZYzSKlILrI/AAAAAAAAATI/tIcp8IDdsDc/s72-c/rose' height='72' width='72'/><thr:total>167</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-3917884522108352622</id><published>2009-02-13T08:12:00.006+05:30</published><updated>2009-02-13T09:34:23.426+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बिन्दिया चमकेगी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बॉलीवुड मे स्त्री विमर्श'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दो रास्ते'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मुमताज़'/><title type='text'>यारी टुटदी है तो टुट जाए...</title><content type='html'>&lt;a href="http://tetalaa.blogspot.com/2009/02/blog-post.html"&gt;अशोक कुमार पाण्डेय said...&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अरे अविनाश जी &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;विगत दस पान्च सालो का एक गाना बताइये जो स्त्री विरोधी ना हो!&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;फ़िल्म अब बाज़ारू माध्यम है और बाज़ार के लिये औरत की देह एक सेलेबल कमोडिटी तो और उम्मीद क्या की जाये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;--------&lt;br /&gt; यूँ मै भी सहमत हूँ कि पंजाबी मे इस तरह की प्रेमभरी झिड़की लड़के लड़कियों को दी जाती है,मोए,मरजाणे,फिट्टे मूँ वगैरह वगैरह ....गाना लोकप्रिय हो रहा है...&lt;br /&gt; पर फिलहाल मै सोच रही हूँ कि एक गीत कम से कम बॉलीवुड मे ऐसा है जो स्त्री  विरोधी नही सुनाई देता, हालाँकि देखने से गीत मे हलकापन आता है पर सुनने पर यह किसी &lt;a href="http://chokherbali.in"&gt;चोखेरबाली&lt;/a&gt; के शब्द प्रतीत होते हैं।हमारी तो बिन्दिया चमकेगी और चूड़ी खनकेगी , आप दीवाने होंते हों तो होते रहिए हम अपना रूप कहाँ ले जाएँ भला!!हम तो नाचेंगे आप नाराज़ होते हों तो हों!जवानी पर किसी का ज़ोर नही,इसलिए लाख मना करे दुनिया पर मेरी तो पायल बजेगी,मन होगा तो मैं तो नाचूंगी, छत टूटती है तो टूट जाए।&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;और उस पर भी गज़ब लाइने यह कि - मैने तुझसे मोहब्बत की है, गुलामी नही की सजना ,दिल किसी का टूटे चाहे कोई मुझसे रूठे मै तो खेलूंगी , यारी टुटदी है तो टुट जाए।&lt;/span&gt;जिस रात तू बारात ले कर आएगा , मै बाबुल से कह दूंगी मै न जाऊंगी न मै डोली मे बैठूंगी , गड्डी जाती है तो जाए।फिल्म के सन्दर्भ से परे हटाकर ,एक प्रेमी को प्रेमिका की यह बातें कहते सुनें तो मुमताज़ चोखेरबाली ही नज़र आएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप  सुनिए और बताइए -&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/twZ5InZDdhg&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowscriptaccess" value="always"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/twZ5InZDdhg&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-3917884522108352622?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/3917884522108352622/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=3917884522108352622' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/3917884522108352622'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/3917884522108352622'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2009/02/blog-post_13.html' title='यारी टुटदी है तो टुट जाए...'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-7998356592081640346</id><published>2009-02-12T08:34:00.003+05:30</published><updated>2009-02-12T09:33:49.241+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैंगलोर  पब कांड'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='pink chaddi campaign'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='women liberation'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='निशा सूसन'/><title type='text'>पिंक चड्डी - बहस का फोकस तय कीजिए</title><content type='html'>पिंक चड्डी का आह्वान सैंकड़ों कमेंटस दिला सकता है खास तौर से जब आपका ध्यान &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पिंक चड्डी &lt;/span&gt;का आह्वान करने वाली एक स्त्री पर केन्द्रित हो।पितृसत्तात्मक मानसिकता के आगे क्या रोचक बिम्ब उजागर होता होगा यह कल्पना करके? इसलिए सूसन की हिमाकत  पर कीचड़ उछालना-उछलवाना ज़रूरी है जो  &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उस बिम्ब&lt;/span&gt; का इस्तेमाल आपको शर्मिन्दा करने के लिए कर रही है जिसकी कल्पनाओं मे कभी किसी पुरुष ने ब्रह्मानंद की प्राप्ति की हो।आफ़्टर आल रात के दो बजे किसी बार मे पिंक चड्डी पहन नाचने वाली लड़की को झेला (एंजॉय)किया जा सकता है, मुँह पर तमाचे की तरह आ पड़ने वाली पिंक चड्डी का सामूहिक विरोध स्वरूप उपहार भेजने वाली को कैसे सहा जा सकता है?मेरी दिली इच्छा है कि टिप्पणी कार वाला काम करके सभी कमेंट्स को यहाँ चेप दूँ पर वही जाकर पढ लें , मै अपनी बात कहूंगी,यह काम टिप्पणीकार के लिए ही छोड़ दूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/02/pink-chaddi-campaign-women-liberation.html"&gt; यह पोस्ट &lt;/a&gt;देखी और इस बात से कतई हैरान नही थी कि पिंक चड्डी आह्वान के पीछे की ऐतिहासिक गतिविधियों को किनारे पर धकेल कर भ्रष्ट होती स्त्रियाँ और भ्रष्ट होते स्त्री आन्दोलन पर ही बहस होने वाली है क्योंकि शायद वहाँ पोस्ट का फोकस ही यह था। &lt;br /&gt;मै समझना चाहती हूँ कि पिंक चड्डी की ज़रूरत क्यों आ पड़ी होगी? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिंक प्रतीक है - स्त्रैण का ।&lt;br /&gt;चड्डी और वह भी जनाना - प्रतीक है स्त्री की प्राइवेट स्पेस का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब देखिए -&lt;br /&gt;पब मे दिन दहाडे(रात के दो भी नही बजे थे)आप लड़कियों को खदेड़ खदेड़ कर मार मार कर चपत घूँसे लगा लगा कर और दुनिया भर के पत्रकार बुला कर उनके सामने अपने शौर्य का प्रदर्शन कर रहे हैं।किसी स्त्री के अंग को आपको हर्ट करने , छूने का अधिकार किसने दिया? उसके इस प्राइवेट स्पेस मे दखल देने का अधिकार आपको किसने दिया?उन लड़कों को मैने पिटते नही देखा जो उस वक़्त साथ थे।यह कितना अपमानजनक था किसी स्त्री के लिए एक सभ्य मनुष्य़ समझ सकता है।&lt;br /&gt;अगर दुनियावाले लड़कियों मे यह डर बैठाना चाहते हैं कि रात को दो बजे घूमोगी तो हम तो रेप ही करेंगे तो मुझे लगता है कि अहिंसात्मक विरोध के लिए प्राइवेट स्पेस के प्रतीक के रूप मे पिंक चड्डी से बेहतर विकल्प नही हो सकता,जबकि इस लोकतांत्रिक देश की सरकार मुतालिख जैसों को कानून के साथ खिलवाड़ करने की छूट दे रही हो और हर गली नुक्क्ड़ पर दो चार संस्कृति के स्वयमभू ठेकेदार लड़कियों का राह चलना दूभर कर दें और हम मे से कोई किसी एक स्त्री की फजीहत करते हुए उसके मोबाइल का नम्बर बांटने लगें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; कुछ लोग इंतज़ार मे है कि देखते हैं कौन शर्मिन्दा होता है - मुतालिख या निशा सूसन ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रश्न मे निहित है कि वे मान कर चल रहे हैं कि इस मुद्दे मे उनका कोई कंसर्न नही , वे तमाशबीन की तरह केवल और केवल सूसन के शर्मिन्दा होने की बाट जोह रहे हैं।भई, स्त्री अपनी चड्डी भेजेगी तो शर्मिन्दा उसे ही होना चाहिए न !!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो समाज जितना बन्द होगा और जिस समाज मे जितनी ज़्यादा विसंगतियाँ पाई जाएंगी वहाँ विरोध के तरीके और रूप भी उतने ही अतिवादी रूप मे सामने आएंगे।सूसन के यहाँ अश्लील कुछ नही, लेकिन टिप्पणियों मे जो भद्र जन सूसन पर व्यक्तिगत आक्षेप कर रहे हैं वे निश्चित ही अश्लील हैं।मुझे लगता है यह तय कर लेना चाहिये कि इस बहस का फोकस क्या है , सूसन या रामसेना या पिंक चड्डी या स्त्री के विरुद्ध बढती हुई पुलिसिंग और हिंसा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या चड्डी निर्माता और चड्डी विक्रेता या तहलका । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़ा मुद्दा क्या है ? असल मुद्दा क्या है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-7998356592081640346?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/7998356592081640346/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=7998356592081640346' title='24 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/7998356592081640346'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/7998356592081640346'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title='पिंक चड्डी - बहस का फोकस तय कीजिए'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>24</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-3963502536424702814</id><published>2009-01-20T10:00:00.007+05:30</published><updated>2009-01-20T22:35:28.503+05:30</updated><title type='text'>जो ब्लॉग तक मे नही है</title><content type='html'>प्रशांत की पोस्ट &lt;a href="http://prashant7aug.blogspot.com/2009/01/blog-post_19.html"&gt;"प्रेम करने वाली लड़की जिसके पास एक डायरी थी" &lt;/a&gt;पढकर सहसा मन मे आया कि वाकई हर लड़की के पास एक ऐसी लिखी-अनलिखी डायरी ज़रूर होती है जिसे वह अपने प्रेमी-पति-निकटस्थ से छिपाती है।यूँ यह व्यक्तिगत स्पेस का मामला माना जा सकता है क्योंकि यह कतई ज़रूरी नही कि हर व्यक्ति अपनी डायरी को सार्वजनिक करना,या कम से कम कुछ दोस्तो के साथ बांटना ही चाहे।यह उसका अपना इलाका है और मनोविज्ञान की माने तो मानव मन की कई ऐसी परते हैं जिसके बारे मे वह खुद भी बहुत नही जानता तो दूसरे तो क्या ही जानेंगे।मै क्या और कितना बताना चाहती हूँ यह तय करना मेरा अधिकार है ,सही है।  &lt;br /&gt;लेकिन बात मै कहीं और भी ले जाना चाह्ती हूँ। &lt;br /&gt;चूँकि "डायरी" हिन्दी लेखन की एक अलग विधा है सो इतना तो तय है कि किसी व्यक्ति की नितांत निजी अभिव्यक्तियों में कुछ ऐसा ज़रूर है जो डायरी लेखन को एक विधा का दर्जा दिलाता है।बाहर की दुनिया में देखे गए ,भोगे गए अनुभवों की कोई व्यक्ति कैसी व्याख्या करता है और उस व्याख्या मे उसके अपने जीवन के भोगे गए ,देखे गए यथार्थ क्या भूमिका अदा करते हैं यह जानना बहुत दिलचस्प हो सकता है।और अक्सर उपयोगी !&lt;br /&gt;वह डायरी जहाँ कोई लड़की अपने राज़ छिपाती है वह अप्रत्यक्षत: उसके समाज ,उसके परिवेश,उसके समय और उसकी मन:स्थिति की आलोचना के लिए पुष्ट आधार बन सकते हैं।ठीक वैसे ही जैसे &lt;a href="http://blog.chokherbali.in/search/label/सपना%20की%20डायरी"&gt;सपना की डायरी&lt;/a&gt; या आज से लगभग एक शताब्दी पूर्व लिखी गयी &lt;a href="http://blog.chokherbali.in/2009/01/blog-post_04.html"&gt;दुखिनी बाला की जीवनी।&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;अब मै यह सोचती हूँ कि हम जब खुद को छिपाना चाहते हैं तो उसके पीछे की मानसिकता क्या है ? क्या हम एक विशिष्ट छवि को बरकरार रखना चाहते हैं? और नितांत निजी डायरी शायद दुनिया की नज़रों मे आपको पतनशील ,बागी , बेवफा ,बे ईमान ,कायर ,पागल या ऐसा कुछ लेबल दिलवा सकती है जिसके कारण आपकी बनाई छवि , अपेक्षित छवि टूट सकती है और आपका सीधा सपाट चलता खुशहाल(जो शायद प्रतीत ही होता है)जीवन नष्ट हो सकता है। &lt;br /&gt;ऐसे मे भी मुझे लगता है कि बाहरी दबाव डायरी लिखने और फिर उसे छिपाने के पीछे काम करते हैं , ऐसा कतई नही है कि कोई व्यक्ति चूँकि एक निरपेक्ष जीव है इसलिए वह यह प्राइवेसी चाहता है।इस मायने मे पर्सनल जो भी है वह दर असल पॉलीटिकल है। &lt;br /&gt;इस या उस ब्लॉग पर लिखते हुए भी किसी का दिमाग यदि सावधान दिमाग है तो वह खुद ब खुद शब्दों,वाक्यों,घटनाओं मे एक ऐसा फिल्टर लगा देगा कि जो सामने आए वह वही हो जो वह चाहता है कि आए।शायद कुछ मानक हैं ,कुछ मापदण्ड जिसके अनुसार हम अपनी हर एक पोस्ट सम्पादित करते हैं और वही दिखाते हैं जो दिखाना ठीक हो मानको के अनुरूप।ये मानक कौन तय करता है? समाज !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मानव मन की यह चालाकी क्या हर बार काम करती है ? कहीं न कहीं लाइनों के बीच का अनलिखा दिख जाता है और ताड़ने वाला दिमाग उस महत्वपूर्ण अनलिखे को समझ कर नृतत्वशास्त्र ,समाज्रशास्त्र,साहित्यशास्त्र,सबॉल्टर्न इतिहास जैसे महत्वपूर्ण ज्ञान शाखाओं के लिए अमूल्य अवदान दे जाता है।&lt;br /&gt;मै सचमुच चाहती हूँ कि प्रेम करने वाली उस लड़की की डायरी मै पढ सकूँ और जान सकूँ कि वह सरल लड़की कैसे बनाई गयी थी,खुद को छिपाना उसे कैसे सिखाया गया था ,उसकी सामाजिक कंडीशनिंग किस तरह हुई थी और प्रेम को लेकर उसकी अवधारणा अपनी थी या समाज की दी हुई?जो भी हो मै उम्मीद करना चाहती हूँ कि प्रेम करने वाली लड़की अपने परिवेश परिवार और समाज के दबावों से मुक्त होकर प्रेम करे और उसकी डायरी सामाजिक लर्निंग के विखण्डन की प्रक्रिया की ओर उसे ले जाए ..इस तरह से डायरी लिख लिख कर छिपाने की उसे ज़रूरत न रह जाए और कभी अचानक हाथ लग जाने पर उसकी डायरी सपना की डायरी की तरह सन्न ,अवाक कर देने वाली न हो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-3963502536424702814?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/3963502536424702814/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=3963502536424702814' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/3963502536424702814'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/3963502536424702814'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2009/01/blog-post_20.html' title='जो ब्लॉग तक मे नही है'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-7393974773487883743</id><published>2009-01-09T15:34:00.005+05:30</published><updated>2009-01-09T19:56:22.957+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='परफ्यूम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फ़िल्म perfume'/><title type='text'>अस्तित्व की आत्मा है गन्ध</title><content type='html'>फिल्मों की समीक्षा कभी लिखी नही इसलिए ऐसा कोई अनुभव नही है (फिल्म समीक्षा यह है भी नही)पर आम भारतीय नागरिक होने के नाते आस-पास ,परिवार,राजनीति,कल्चर,इतिहास सभी पर छींटाकशी करने की अपनी भी कुछ आदत है ही :-)आप इसे व्यंग्य समझ सकते हैं पर यह सच बात है।&lt;br /&gt;खैर , &lt;br /&gt;आज की &lt;a href="http://chitthacharcha.blogspot.com/2009/01/blog-post_09.html"&gt;चिट्ठाचर्चा &lt;/a&gt;की शुरुआत मे एक फिल्म का ज़िक्र किया था मैने।"पर्फ्यूम : द स्टोरी ऑफ़् अ मर्डरर" जो साल 2006 मे आई थी।मूल रूप से यह फिल्म पैट्रिक ससकिंड के जर्मन मे लिखे गए उपन्यास "डास पर्फ्यूम"(1985)पर आधारित है।अठाहरवी शताब्दी के फ्रांस मे जन्मा जॉन बप्टीस ग्रैनुली जिसके पास सूँघने की अद्वितीय शक्ति है मछली बाज़ार मे मछली बेचने वाली एक स्त्री की पाँचवी संतान है जिसे अपनी अन्य संतानो की तरह माँ बाज़ार के बच जन्मते ही अपने शरीर से अलग कर देती है मरने के लिए और वापस खड़ी हो जाती है मछली खरीदने आए ग्राहकों के सामने।लेकिन वह बालक रो उठता है और आस पास वाले जान जाते है ,माँ को फाँसी पर लटकाया जाता है हत्या के जुर्म मे और ग्रेनुली अनाथालय भेजा जाता है।आठ नौ वर्ष की अवस्था मे उसे एक दास के रूप मे बेच दिया जाता है। इसी दासत्व के दौरान तरुण होने पर उसे काम के सिलसिले मे एक पर्फ्यूमर बाल्दिनि के घर जाने का मौका मिलता है।यहीं बाल्दिनी को उसकी अनोखी घ्राण शक्ति का पता चलता है और बाल्दिनि की शागिर्दी मे ग्रेनुली दुनिया की बेहतरीन सेंट बनाता है।लेकिन अब भी उसकी मुश्किल है कि इंसान की गन्ध को कैसे सुरक्षित किया जा सकता है।और खूबसूरती को संजोने  के लिए उसकी गन्ध को सहेज लेना ही सबसे अच्छा तरीका है ताकि वह कभी न मरे ।उसे वह लड़की नही भूलती जिसका पीछा वह उसके बदन से आती एक विचित्र खुशबू के कारण करता है और अनचाहे ही उस की जान ले लेता है।उसे अपने आस पास के मानवीय शरीरों की गन्ध एक दूसरे से अलहदा साफ पता चलती है।&lt;br /&gt;इसी बेचैनी मे एक गुफा मे सात साल के एकांतवास के बाद उसे अहसास होता है कि जहाँ हर इंसान के बदन मे एक गन्ध बसती है जो उनके अस्तित्व का प्रमाण है वहीं उसका अपना शरीर नितांत गन्धरहित है।&lt;br /&gt;अपने मास्टर बाल्दीनी के बताए एक ऐसे पर्फ्यूम को बनाना सीखने के लिए वह ग्रास Grasse की ओर निकल पड़ता है जिसे सूँघते ही मनुष्यों को अहसास हो कि वे स्वर्ग मे हैं और सभी के मन मे सात्विक , पवित्र भावनाएँ भर जाएँ।इस सेंट के लिए वह एक के बाद एक 25 कुमारी लड़कियों की क्रूरता से हत्या करता है और उनके बालों सहित पूरे शरीर की गन्ध को उनकी को निचोड- लेता है।अंतत: शहर के कोतवाल की खूबसूरत बेटी लौरा के बदन की गन्ध मिलाकर एक ज़रा से शीशी मे जो सेंट तैयार होता है उसे वह अपने पकड़े जाने के बाद सारे शहर के बीच ऊंचे मंच पर जल्लाद के सामने जब खोलता है और सिर्फ एक बूँद रुमाल पर रखकर उड़ा देता है ..तो आस पास सब बदल जाता है ..कसाई पैरों पर गिरकर उसे एंजल कहता है ,बिशप सहित शहर के सभी लोग रात भर प्यार ,स्नेह और मानवीय भावनाओं मे डूबे हिप्नोटाइज़ से रह जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर ग्रेनुली अपनी जन्म स्थली पर वापस जाता है और कसाइयों मच्छीमारों के हिंसक ,अशिक्षित ,अमानवीय लोगों के झुँड के बीच वह शीशी खुद पर ही डाल लेता है। देखते ही देखते इनसानो का वह झुँड उसे इस कदर लिपटता है कि अनतत: कुछ नही बचता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म एक थ्रिलिन्ग , भयमिश्रित , रहस्यमयी प्रभाव छोडती है। एक फिल्म के रूप मे बहुत प्रभावी है। माना जाता है कि उपन्यास के मुकाबले उसे कम क्रूर दिखाया गया है। कुल मिलाकर फिल्म शॉकिंग है।&lt;br /&gt;यदि उपन्यासकार की दृष्टि से देखा जाए तो यह मुझे ज़्यादा डराने वाली बात थी कि उपन्यास मे थ्रिल्ल , सनसनी , शॉक के प्रभाव को अतिशय बनाने के लिए खूबसूरत , वर्जिन लडकियों की सीरियल मर्डर की योजना बनाई गयी है। यूँ हैरान नही होना चाहिये क्योंकि कवाँरी लड़कियों के महत्व के साथ साथ इस तरह की अमानवीयता संसार भर की सभ्यताओं की विशेषता है। और यूँ भी यह इस विचार की अच्छी पोषक है कि मानवीय गुण और मानवीय सम्वेदों को प्रभावित करने वाली गन्ध केवल फीमेल मे होती है।शायद ब्यूटी,स्त्री,और सात्विकता को पर्याय बना दिया गया है।&lt;br /&gt;एक दूसरी बात जो मुझे समझ नही आती वह है फिल्म का ऐतिहासिक सन्दर्भ ।क्या यह कथा काल्पनिक है ? या इस तरह का कोई प्रमाण हमें अठाहरवीं शताब्दी के फ्रांस मे मिलता है?जैसा कि &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Perfume_(novel)"&gt;विकिपीडिया &lt;/a&gt;-इसे इतिहास और साहित्य का हाइब्रिड कह्ता है। &lt;br /&gt;जो भी है उपन्यास पढना वाकई एक अलग अनुभव होगा जब फिल्म ही तरह तरह की गन्धों का जीवंत अह्सास करवा देने मे सक्षम है तो उपन्यासकार की इस बेस्ट सेलर को पढना और भी रोमांचकारी होगा।&lt;br /&gt;फिलहाल यूट्यूब पर से एक क्लिपिंग दे रही हूँ -&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/c91f41NqCcU&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowscriptaccess" value="always"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/c91f41NqCcU&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-7393974773487883743?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/7393974773487883743/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=7393974773487883743' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/7393974773487883743'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/7393974773487883743'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='अस्तित्व की आत्मा है गन्ध'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-387792460328351312</id><published>2008-10-22T09:10:00.007+05:30</published><updated>2008-10-22T10:32:54.981+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बहस मे कुतर्क'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चोखेर बाली'/><title type='text'>आप भी लुत्फ लीजिये न ..बहस वहस जो भी...व्हाटेवर ... हो उसे छोड़िये !</title><content type='html'>"कोई फर्क नही अलबत्ता" या  कि आज के कुछेक खाते-पीते युवाओं की बेलौस वाणी की तर्ज़ पर कन्धे उचका कर मुँह बिचका कर  कहें "whatever !!" ...बहुत बार इस रवैये के साथ कुछ लोग किसी गम्भीर बह्स में कूद जाते हैं और अपने दो चार जाति भाइयों के साथ मिलकर ठिठोली का विषय बना लेते हैं सारे मुद्दे को । उस पर  अगर बहस किसी ऐसे मुद्दे पर हो जिसमें स्त्री की अस्मिता, मुक्ति या परम्परागत छवि के बरक्स नवीन छवि  की बात उठती हो ,स्त्री को प्रभावित करने वाले कानूनी संशोधनों की बात हो तो बहस की आग मे हाथ तापने वाले &lt;strong&gt;"व्हाटेवर"&lt;/strong&gt; वाले बेखयाल , बेपरवाह लोग निरंतर परम्परा और संसकृति की दुहाई देते हैं और तर्क के बदले &lt;strong&gt;"भावनाओ को समझने की बात भी करते &lt;/strong&gt;हैं " और उस पर तुर्रा यह कि  सामने वाला अतार्किक है ।भाई हम तार्किक हैं तभी शायद भावनाओं से आगे जाकर सोच रहे हैं,इसलिए भावनाएँ तो आप ही समझें कृपया !&lt;br /&gt;हम बड़े आराम से यह मुद्दा किसी मंच से उठा सकते थे पर क्या करें कि औरों को तो फर्क नही पड़ता होगा अपन को पड़ता है जब &lt;strong&gt;बहस&lt;/strong&gt;  व्यक्तियों के नामों के सहारे शीर्षक बना बना कर हिट्स लेने वाली मानसिकता से शिथिल और हास्यास्पद हो जाती है।&lt;strong&gt;"...वालियों"&lt;/strong&gt; को बदनाम करने मे मेरा भी पूरा हाथ होगा ही , इसलिए जब बात अपन के नाम से होने लगी है तो अच्छा है कि मंच का दुरुपयोग न करके मै अपने ब्लॉग से आवाज़ बुलन्द करूँ !18 अक्तूबर की बात और हम अब जाग रहे हैं तो भई क्या करें दुनियावी मानुषों की तरह अपने के जीवन के भी कुछ पचड़े हैं ही रोटी पानी कमाने के , सो तब देखा नही , और ऐसे हितैषी भी नही है ब्लॉगजगत मे अपने कि तुरंत फोन की घण्टी घुमा दें -कि भई आपकी पोस्ट या कमेंट से बवाल हुआ ...आप जल्द जवाब दें ....{अच्छा ही है कि हमारा साबका समझदारों और सयाने ब्लॉगरों से है}&lt;br /&gt;जिनकी सोच किसी खास दायरे मे कैद हो वे बहस नही केवल कुतर्क ..या कहें प्रलाप कर सकते हैं ,और जो अपने तर्क {?} के समर्थन में गवाहों को पेश करने लगे तो अपन को बिलकुल भी सन्देह नहीं कि यह .....वालियों का भय है और खाली दिमाग वाली कहावत चरितार्थ हो रही है ....और कविता मे कहें तो यह सोच कुछ ऐसी है कि ---&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद है ,&lt;br /&gt;सूरत बदले न बदले &lt;br /&gt;ब्लॉग हिट होना ही चाहिये &lt;br /&gt;...&lt;br /&gt;व्यक्तिगत हमले बाज़ी न माना जाए इसलिए अपन ने लिंक नहीं दिये हैं ,ब्लॉगजगत मे बेशक दो चार मूढ होंगे ही पर बाकी बहुत समझ दार भी हैं सो वे लिंक स्वयम खोज लेंगे ।जिन खोजाँ तिन .....&lt;br /&gt;और जब आप भी लुत्फ ही उठा रहे थे "....वालियों" को उकसा कर ,नाम ले लेके आमंत्रित कर कर के तो अपना उद्देश्य भी &lt;strong&gt;कोई फर्क नही अलबत्ता वाले &lt;/strong&gt;अन्दाज़ मे मज़े लेने का हो आया है जी :-) सो यह पोस्ट नमूदार हुई है आपकी जानिब । &lt;br /&gt;आप सब सुधीजन मज़े लें क्योंकि हिन्दी ब्लॉगजगत हो या हिन्दी पत्रकार या बाकी  हिन्दी वाले सब अबही तक टुच्चेपन मे ब्रह्मानन्द खोज रहे हैं ।सो ये हमरी ओर से टुच्चेपन के महायज्ञ मे एक छोटी सी अतार्किक आहुति !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-387792460328351312?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/387792460328351312/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=387792460328351312' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/387792460328351312'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/387792460328351312'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='आप भी लुत्फ लीजिये न ..बहस वहस जो भी...व्हाटेवर ... हो उसे छोड़िये !'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-1177543589800590908</id><published>2008-09-05T14:15:00.004+05:30</published><updated>2008-09-05T14:23:59.540+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लव दुआ'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बचपन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नटखट'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शिक्षक दिवस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शिक्षा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टैगोर इंटरनेशनल स्कूल'/><title type='text'>बचपन के हत्यारे स्कूल</title><content type='html'>वह 6 साल का नटखट बालक नही जानता था कि “सस्पेंडिड” के मायने क्या होते हैं| स्कूल से सस्पेंशन और वह भी उस काम के लिए जो उसकी उम्र में नीन्द और भूख जैसी ज़रूरत है , स्वभाव है ।इसलिए बहुत सम्भव है उसके लिए “नॉटी”होने की सज़ा स्वरूप मिला स्कूल से 6 दिन का सस्पेंशन अचानक मिली छुट्टियों से कम मज़ेदार न हो। लेकिन उसका यह भोलापन कुठाराघात का शिकार हो गया है और बचपन की मौज मस्ती काफूर हो गयी है। वह स्थान जिसे अब तक परिवार और मन्दिर की तरह एक पवित्र संस्था मानने की परम्परा है ,जहाँ हम अपने बच्चों को मानवीयता, शिष्टाचार और जीने की तमीज़ सीखने भेजते हैं वही स्थान उस बचपन के लिए  कितना खतरनाक और अमानवीय हो सकता है इसके साक्षात उदाहरण हम कई बार देख चुके हैं। टैगोर इंटरनेशनल स्कूल के पहली कक्षा के छात्र लव दुआ के साथ जो हुआ वह एक और घण्टी है उस खतरे की जो स्कूलों मे जाने वाली हमारी नन्ही जानों पर आन पड़ा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्कूल में जब बच्चा पहला कदम रखता है तो उसकी आयु मात्र 3 साल होती है ,वह परिवार माँ-दादी –दादा के संरक्षण और दुलार से पहली बार बाहर निकलता है , उसके लिए सारी दुनिया वयस्कों का बनाया एक ऐसा तिलिस्म होती है जिसमें कब कहाँ हाथ रख देने पर कौन सा खज़ाना खुल जाएगा या कब कौन सी दीवार ढह पड़ेगी या ज्वाला मुखी फट पड़ेगा वह नही जानता । उसके लिए खेल , आनंद ,और शरारत के साथ साथ एक सहज प्रश्नाकुल जिज्ञासा के अतिरिक्त और कुछ समझ आने वाला नही होता। ऐसे में जब स्कूल उस नन्हे जीव को  भावनात्मक सुरक्षा देने के स्थान पर दुत्कार , प्रताड़ना और उलाहने देता है तो स्कूल का मतलब ही बदल जाता है।वहाँ जाना भय का पर्याय हो जाता है और छुट्टी आनन्द का।&lt;br /&gt;अभी “तारे ज़मीन पर ” जैसी फिल्में बहुत पुरानी नहीं हुईं जिसे सराह सराह कर अभिभावक-शिक्षक थक नही रहे थे। शारीरिक दण्ड जाने कब से स्कूलों मे प्रतिबन्धित &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं समझने की कोशिश करना चाहती हूँ उस मनस्थिति को ,उस वातावरण को जिसमें अध्यापक एक दरिन्दे मे तब्दील होता है और स्कूल जेलखाने में।प्रबन्धकों का दबाव, कार्यभार की अधिकता, वेतन की कमियाँ वगैरह । लेकिन किसी भी तरह यह बात समझ नही आ रही कि किसी 6 साल के बच्चे का “नटखट” होना असहज , अस्वाभाविक बात कैसे है।क्या बालपन अपराध है ? दिल्ली और एन सी आर के बहुत से मान्यता प्राप्त स्कूल हमारे अधिकांश बच्चों के साथ यही सुलूक कर रहे हैं। वे न केवल उनके बचपन की हत्या कर रहे हैं वरन उनकी समझ की भी हत्या करके उन्हें वह समझा रहे हैं जो वे  समझते हैं कि ठीक है।स्कूल के पहले ही दो-तीन दिनों में नन्हे बच्चे को , जो शिक्षक को अभिभावक से भी बड़ा दर्जा देता है उन्हें समझा दिया जाता है कि तुम मूर्ख हो – कुछ नही जानते – इसलिए चुपचाप सुनना तुम्हारा परम कर्तव्य है।अधिकांश अध्यापक इस समझ के साथ आते हैं कि बच्चा कोरा कागज़ है। शुरुआती दिनों में ही उन पर “स्लो”, “नॉटी”,”सुस्त” “स्मार्ट””डिसलेक्सिक” जैसे लेबल चिपका दिये जाते हैं और बारहवीं कक्षा तक वे अध्यापकों के कवच की तरह काम करते हैं।और हद है कि 12 साल मे बालक की उस प्रवृत्ति मे कोई बदलाव नही होता ।प्रतिस्पर्द्धा की अन्धी दौड़ मे अपने बच्चों को आगे रहने काबिल बनाने के लिए अभिभावक स्कूल के इस व्यवहार से निभाने की भरपूर कोशिश करते हैं।अधिकांश स्थितियों में तो वे इस बात से परिचित भी नही होते कि जो शिक्षण पद्धतियाँ उसके बच्चे के स्कूल में अपनाई जा रही हैं उनमें कहीं गड़बड़ है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें कोई शंका नही कि छोटे बच्चे के लिए स्कूल का सबसे बड़ा उद्देश्य होना चाहिये कि बच्चे का स्कूल जाने का मन करे लेकिन अफसोस कि उसी को हासिल करने मे स्कूल असफल हैं । इसके लिए सबसे ज़रूरी है कि स्कूल में पहुँचते ही बच्चे को भावनात्मक और शारीरिक सुरक्षा का आश्वासन मिले और वह भरोसा करना सीखे । गिजुभाई ने प्राथमिक शिक्षा पर अपनी प्रसिद्ध पुस्तक का नाम ‘दिवास्वप्न’ क्यों रखा था यह कुछ कुछ अनुमान होने लगा है।दिनदहाड़े ,खुली आँखों से सपना देखने की हिमाकत करना असम्भव को साकार होते देखने के बराबर है।प्राथमिक शिक्षा को लेकर वे जैसे सम्वेदनशील थे वह अध्यापकों,अभिभावकों व स्कूल प्रबन्धनों के लिए मिसाल होना चाहिये ।पर अफसोस कि शिक्षा जगत प्राथमिक शिक्षा में बच्चे के प्रति सम्वेदनशील होना शायद कभी नही सीख पाया। शिक्षक-प्रशिक्षण के विभिन्न कोर्सों की यह सबसे बड़ी कमी है कि वे अध्यापकों को बालमन और बाल प्रवृत्तियों को समझना ही नही सिखा पा रहे।वे नही सिखा पा रहे कि नटखट होना बच्चे का स्वभाव है, नैसर्गिक प्रवृत्ति है।वे उन्हें पहले दिन से ही प्रौढ बना देना चाहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्कूलों को पहले दिन से ही ट्रेंड बच्चे चाहिये जो अपना काम समय पर पूरा करने , टेस्ट में नम्बर लाने , कक्षा मे चुप बैठने, अध्यापक के कहे को पत्थर की लकीर मानने , और अपनी समझ –सहजता-बालपन का त्याग करके इस दोहे का गूढार्थ समझ लें ।6-7 साल का बच्चा बाहर खुले-खिले बड़े मैदान में तितली को उड़ता देख उसे पकड़ने की बजाए श्याम पट्ट पर लिखी पढाई को टीपे ।जब बच्चे का व्यवहार अध्यापक के अनुरूप नही होता तो उसे अनेक तरीकों से हतोत्साहित किया जाता है।ऐसे में लीक से हटकर चलने वाले बच्चे या तो हतोत्सहित और असहाय महसूस करते हैं या बागी हो जाते हैं ; और उनके बागी स्वभाव को स्कूल व अध्यापक तरह तरह के अपराधों की श्रेणी मे रखकर विचित्र प्रकार के दण्ड की व्यवस्था करता है । &lt;br /&gt;अब तक की हमारी समाजिक -शैक्षिक अधिगम ने यही सिखाया है कि जो बच्चा जितनी जल्दी व्यवस्था से समझौता कर ले ,अपनी वैयक्तिक विशिष्टताओं को छोड़ एक “यूनिफॉर्मिटी” के तहत भीड़ बन जाए ,उतना ही सफल और सुखी होगा ।“खेलोगे कूदोगे होगे खराब..” जैसी कहावतें सुना सुना कर हमें और हमारे बच्चों को ऐसा भीरू,चुप्पीपसन्द ,कायर और रीढविहीन बना दिया गया है कि हम खुद सवाल उठाए बिना स्कूल के कायदों पर चलने लगते हैं।  “करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान” ने घिस-घिस और रट-रट की मानसिकता को बुद्धिमता का पर्याय बना दिया।सवाल उठाने की संस्कृति न हमें मिली , न हमारे बच्चों को मिल रही है। ऐसे में लव दुआ का केस और डराता है कि हर दिन अपने बच्चे को स्कूल भेजते हुए अनजाने भय से रूह काँपती है कि कहीं हमारे दिल का टुकड़ा कैसी कैसी छींटाकशी , पिटाई ,अपमान , भेदभाव और भेद-भाव को सह रह होगा या ईश्वर न करे किसी दिन जीवन भर के लिए किसी भयंकर मानसिक-शारीरिक क्षति का शिकार न हो जाए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-1177543589800590908?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/1177543589800590908/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=1177543589800590908' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/1177543589800590908'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/1177543589800590908'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/09/blog-post_05.html' title='बचपन के हत्यारे स्कूल'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-6095300635244953011</id><published>2008-09-03T18:59:00.006+05:30</published><updated>2008-09-04T09:04:11.397+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बुर्का'/><title type='text'>आओ बहनो , पहनो बुर्खा</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SL6TXydAZQI/AAAAAAAAANU/iD8fLCuH5So/s1600-h/BURKADM_228x371.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SL6TXydAZQI/AAAAAAAAANU/iD8fLCuH5So/s400/BURKADM_228x371.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5241789053195543810" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;स्त्री जाति हृदयहीन नही है। माँ , बहन ,बेटी,पत्नी,सखी ,साथिन - सभी रूपों में उसने अपने साथी पुरुष को हमेशा सम्बल दिया ,उसके हितों को सर्वोपरि रखा। लेकिन आज के युग मे वह पुरुष पर अत्याचार करने लगी,&lt;a href="http://sarathi.info/archives/1368#comment-3709"&gt;बलात्कार करने लगी ,कलहकारिणी हो गयी, अर्द्धनग्न हो गयी &lt;/a&gt;,कामिनी बन बन जवान पुरुषों को कामोन्मत्त करने लगीं ऐसा कि वे प्रताड़ित ,शोषित महसूस करने लगे।इतनी अर्द्धनग्न बालाएँ देख आज का जवान {प्रौढ और बूढा भी}अपने मन को कैसे काबू में रखे।खूंटे से बान्धे रहे ?आज तक बन्धा है कभी ? बान्ध लेंगे तो जैसे ही किसी दिन रस्से खुली या टूटी सब्र ढह जाएगा और अनर्थ हो जाएगा। सब इन नारीवादी ,आधुनिकाओं ,नये ज़माने की औरतों के कारण जो अपना तन ठीक से ढंकती नही।&lt;br /&gt;बहनो, &lt;br /&gt;ऐसा अत्याचार देख मेरा मन द्रवित हो रहा है। &lt;a href="http://sarathi.info/archives/1368#comment-3709"&gt;साड़ी में नाभि दिख जाती है , &lt;/a&gt;कमर दिखती है ,पीठ भी दिख जाती है ,ऑफिस में पुरुष कैसे काम करेगा ? बस में बिना चिपके कैसे खड़ा रह सकेगा?&lt;br /&gt;जींस में फिगर दिखती है । कामिनी की कल्पना कर कर साथी पुरुष कैसे काम -पीड़ित हो रह पाएगा?बताइये भला ?क्या आप उन्हें बलात्कार या छेड़खानी की मानसिक ग्लानि से आज़ादी नही दिलवाना चाहतीं ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्लाउस में भी क्लीवेज दिख जाती है ।सलवार-कमीज़ पर दुपट्टा न डालो तो उभरे उरोज़ देख बेचारा पुरुष पटखनियाँ खा खाकर बेहाल हो जाता है।&lt;br /&gt;क्या आप वाकई पुरुष समाज को इतना दुख देना चाहती हैं ?अधिकांश अच्छी बहनें "नहीं" में उत्तर देंगी। और उपाय खोजना चाहेंगी ।&lt;br /&gt;मेरे पास एक बढिया उपाय है । क्यों न हम सभी आज से बुर्खा पहनने का प्रण लें और बढते बलात्कारों और बदतमीज़ियों को होने से रोकें। साथ ही हमारे पुरुष साथियों का भी भला होगा। न नाभि ,पीठ,कमर ,यहँ तक कि चेहरा{कटीले नैन ,रसीले होंठ}&lt;a href="http://sarathi.info/archives/1368#comment-3709"&gt;दिखेंगे न ही वे मानसिक रूप से बलत्कृत होंगे।&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;और यूँ भी पुरुषों से अधिक स्त्रियां बलात्कार करती हैं, लेकिन वे मानसिक सतह पर करती हैं इस कारण बच जाती हैं. समाज में जहां भी देखें आज अधनंगी स्त्रियां दिखती हैं. &lt;a href="http://sarathi.info/archives/1368#comment-3709"&gt;पुरुष की वासना को भडका कर स्त्रियां जिस तरह से उनका मानसिक शोषण करती हैं वह पुरुषों का सामूहिक बलात्कार ही है. &lt;/a&gt;किसी जवान पुरुष से पूछ कर देखें.  पुरुष को सजा हो जाती है, लेकिन किसी स्त्री को कभी इस मामले में सजा होते आपने देखा है क्या. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमें अपनी नैतिक ज़िम्मेदारियों को समझना चाहिये। समाज पतन की ओर जा रहा है ।हम उसे बचा सकते हैं।आइये अपने भाइयों , मित्रों , ब्लॉगर बन्धुओं ,पिताओं , दूसरों के पतियों , अपने बेटों को बचायें ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-6095300635244953011?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/6095300635244953011/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=6095300635244953011' title='24 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/6095300635244953011'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/6095300635244953011'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='आओ बहनो , पहनो बुर्खा'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SL6TXydAZQI/AAAAAAAAANU/iD8fLCuH5So/s72-c/BURKADM_228x371.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>24</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-7490042400736943262</id><published>2008-08-20T09:50:00.000+05:30</published><updated>2008-08-20T09:53:34.246+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='sahitya akademi'/><title type='text'>साहित्य अकादमी मे बे-कार जाने का अंजाम</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuYrft8feI/AAAAAAAAANM/DKMS7NSYbeM/s1600-h/sahitya+akademi.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuYrft8feI/AAAAAAAAANM/DKMS7NSYbeM/s320/sahitya+akademi.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5236446864764337634" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कभी कभी कुछ घटनाएँ या समान्य सी लगने वाली बात-चीत पर भी ज़रा ध्यान दिया जाए तो विचित्र और अक्सर महत्वपूर्ण तथ्य ,अनुभव या समझ प्राप्त होती है।यूँ ही कल हमारे साथ हुआ।सहित्य अकादमी, मण्डी हाउस ,में एक कार्यक्रम के लिए गये थे।विश्विद्यालय के छात्रों के प्रयासों से छपने वाली पत्रिका सामयिक मीमांसा के लोकार्पण का अवसर था।अभी कार्यक्रम ख्त्म नही हुआ था ,पर मुझे जाना था सो मै उठकर चली आयी।गेट के भीतर ही खड़ी मै अपनी एक मित्र की प्रतीक्षा कर रही थी कि गार्ड को न जाने कैसे हमारी फजीहत करने की सूझी।वह कुर्सी से खड़ा हुआ और एक गत्ते से सीट झाड़ता हुआ बोला -"मैडम बैठ जाएँ,गाड़ी आएगी तब आ जाएगी"&lt;br /&gt;मुझे तत्काल कुछ न सूझा ,क्या कहूँ ,मेरे होंठ बस फड़क रहे थे कुछ उगलते नही बन रहा था।अब वह फिर बोला&lt;br /&gt;"बैठिये मैडम , गाड़ी आती होगी "&lt;br /&gt;मैने कहा-"नही ठीक है , आप ही बैठिये"&lt;br /&gt;"हम तो दिन भर बैठते ही हैं मैड्म आप बैठिये खड़ी क्यों रहेंगी जब तक गाड़ी आती है" उसने जिस भी अन्दाज़ मे यह कहा मुझे ऐसा लगा कि मेरा उपहास उड़ाया है।मै लाल-पीली हो रही थी,मन मे आया एक अच्छी सी गाली उस पर पटक के मारूँ । हद है !एक तो गाड़ी , वह भी ड्राइवर वाली !!मैं बस या मेट्रो से नही जा सकती।&lt;br /&gt;तभी गुस्सा काफूर हुआ ,गार्ड की इस बात से एकाएक लगा कि क्या साहित्य अकादमी में ऐसी ही महिलाएँ आती हैं जिनके पास ड्राइवर वाली गाड़ी होती है? मेरे इस अभाव{?}की बात रहने दें तो सोचती हूँ कि साहित्य अकादमी आते जाते रहना अफोर्ड करने के लिए एक खास वर्गीय चरित्र की मांग करता है क्या? वह भी एक स्त्री से ?बहुत सम्भव है कि एक मध्यवर्गीय नौकरीपेशा स्त्री के पास साहित्य अकादमी के लिए न तो वक़्त बचता होगा न ही ज़रूरत। यह बौद्द्धिक अय्याशी वह अफोर्ड नही कर सकती होगी।बौद्द्धिक अय्याशी न भी कहूँ तो यह भटकना , आवारगी उसके लिए कहाँ !!मैं भी तो यही सोच कर भागी थी घर कि 8 बज रहे हैं रात के , कल का दिन चौपट हो जाएगा।बेटे का यूनिट टेस्ट है कल। पति को पढाने को कह तो दिया है पर एक घण्टा और यहाँ रुकने का मतलब है कि खाना आज भी बाहर् से आयेगा।वे भी थके होंगे, अभी घर पहुँचे होंगे ।यहाँ न आती तो दिन भर की थकान उतारने के बाद खाना बनाने के अलावा भी समय बच जाता {ब्लॉगिंग के लिए}।उस पर अभी बाहर सड़क पर जाकर औटो या बस या मेट्रो में धक्के खाने थे।शोफर ड्रिवेन कार !! आह !यह दुनिया मेरे लिए नही है!नही है!मेरे लिए नही है तो ,किसी स्कूल टीचर ,क्लर्क के लिए या किसी भी सर्वहारा के लिए तो कैसे ही हो पाएगी।उस गार्ड के लिए भी नही जो रोज़ वहाँ गेट पर चौकी दारी करता है। इसलिए बौद्धिक अय्याशी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर एकाएक दूसरी बात सोची , गार्ड ने कहा था -हम तो बैठते ही हैं दिन भर । गार्ड दिन भर बैठता ही है तो .....!खैर , वह गार्ड कितनी तंख्वाह पाता होगा कि दिन भर वह "खड़ा" रहे और मैडमों व सरों को सल्यूट मारे या तमाम तहज़ीब व आदर सहित उन्हें गाड़ी का इंतज़ार बैठ कर करने को कहे।&lt;br /&gt;बहुत साधारण सी बातें और हमारा मन भी उन्हें कहाँ कहाँ ले जाता है।सब ठीक है।सब ऐसा ही है। ऐसा ही चलता रहेगा।क्या सच ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-7490042400736943262?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/7490042400736943262/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=7490042400736943262' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/7490042400736943262'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/7490042400736943262'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='साहित्य अकादमी मे बे-कार जाने का अंजाम'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuYrft8feI/AAAAAAAAANM/DKMS7NSYbeM/s72-c/sahitya+akademi.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-6366605970070452085</id><published>2008-06-26T12:20:00.000+05:30</published><updated>2008-06-26T12:12:54.720+05:30</updated><title type='text'>जहाँपनाह खुश हुए ......</title><content type='html'>कभी पढा था जो राष्ट्र विद्वानों ,कलाकारों और साहित्य कारों को सम्मान नही देता उसका पतन नज़दीक होता है ।बहुत सही बात है । आजकल अकादमियाँ , संस्थाएँ ,चयन समितियाँ ,यही करती हैं । राजा-महाराजा युग में इसका तरीका कुछ और था । मैं कल्पना कर रही हूँ  किसी दरबारी सीन की। घनानन्द ने छन्द पढा और राजा ने खुश हो कर सोने के सिक्कों  की थैली उछाल दी । महाराज प्रसन्न हुए !! या मुगले-आज़म का सीन । अनारकली ने नृत्य पेश किया और बादशाह सलामत ने खुश होकर बेशकीमती हार उछाल दिया । &lt;br /&gt;कहने को सामंतवाद देश से जा चुका है । लोकतंत्र है । शासक नही हैं हमारे प्रतिनिधि हैं । ऐसे में आप यदि राष्ट्र के सर्वोच्च  पद पर हैं और समृद्ध व सम्मानित व्यक्ति हैं और आपको कोई कविता भावविभोर कर जाती है तो आप उस अति भावुक क्षण में क्या करेंगे ?&lt;br /&gt;कवि को गले से लगा लेंगे ?आपकी आंखें नम हो जाएंगी ? अब भी सुनते हैं लता मंगेशकर को 'ए मेरे वतन के लोगों....' गाते सुन पंडित नेहरू की आंखें भीग गयी थीं ।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;ऐसा ही भावुक क्षण तब आया जब सुलभ शौचालय की 30 महिला कर्मचारियों का एक दल जो यू एन रवाना होने वाला है , राष्ट्रपति  से मिलने पहुँचा और उनमें से एक लक्षमी नन्दा ने अपनी एक कविता 'पतन से उड़ान की तरफ' का पाठ किया । कविता एक महिला सफाई कर्मचारी के उत्थान की बात कहती थी जिसे सुनकर राष्ट्रपति इतनी भावविभोर हुईं कि तत्काल 500 रुपए का नोट निकाल कर लक्ष्मी को थमा दिया ।लक्ष्मी अति प्रसन्न थी । यह उसके लिए एक बेशकीमती नोट था जिसे वह कभी खर्च नही करेगी । निश्चित रूप से वह 500 का नोट एक टोकन था ,कोई बहुत बड़ी राशि नही थी । और लक्ष्मी भी उसे किसी स्मृति चिह्न की तरह ही सम्भाल कर रखेगी । पर मुझे अब भी यह सामंती अदा परेशान कर रही है । राष्ट्रपति उठ कर सफाई कर्मचारी लक्षमी को गले से लगा लेतीं तो उनका सम्मान मेरे मन में कई गुना बढ जाता । पर खुश होकर या भावुकता के क्षण में जब आपके विशिष्ट ,ज़िम्मेदार हाथ जेब से कुछ निकालने को आतुर हो जाएँ तो मेरे लिए यह निश्चित ही -जहाँपनाह खुश हुए ....! वाला सामंती अन्दाज़ ही है   ..&lt;a href="http://www.hindustantimes.com/storypage/storypage.aspx?id=c7d916d4-9e26-4b3b-b656-db1695b38144&amp;&amp;Headline=Scavenger+woman%e2%80%99s+poem+moves+Prez"&gt;अखबार जिसे अनबिलीवेबल , हार्ट्वार्मिंग ,ब्रेथ टेकिंग घटना कह रहे हैं .... &lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-6366605970070452085?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/6366605970070452085/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=6366605970070452085' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/6366605970070452085'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/6366605970070452085'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/06/blog-post_26.html' title='जहाँपनाह खुश हुए ......'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' 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href="http://3.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SEp1Yf8B8oI/AAAAAAAAALs/BYK4pmglWfc/s1600-h/DSCN1828.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SEp1Yf8B8oI/AAAAAAAAALs/BYK4pmglWfc/s400/DSCN1828.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5209104982757995138" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-6706748913931091383?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/6706748913931091383/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=6706748913931091383' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/6706748913931091383'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/6706748913931091383'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/06/blog-post.html' title='कहाँ से आए बदरा ..'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SEp1rXg_CqI/AAAAAAAAAL8/6MiEAtEon1Q/s72-c/DSCN1820.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-4380348844784712688</id><published>2008-04-23T11:12:00.006+05:30</published><updated>2008-04-23T11:55:20.855+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सीरियल विश्लेषण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='kyunki saas bhi kabhi bahu thee  तुलसी'/><title type='text'>सास बहू को विमल जी की नज़र लगी</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SA7O6mISxzI/AAAAAAAAALQ/FKN-tfZjkY4/s1600-h/saas+bahoo.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SA7O6mISxzI/AAAAAAAAALQ/FKN-tfZjkY4/s320/saas+bahoo.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5192314926467827506" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;आखिर&lt;a href="http://thumri.blogspot.com/2008/04/blog-post_20.html"&gt; विमल जी ने अपनी ठुमरी मे सास -बहू मेलोड्रामा &lt;/a&gt;और स्त्री के कामिनित्व व दुष्टता को नज़र लगा ही दी । उस दिन वे बड़े चिंतित थे इस पोस्ट में और हम भी टिप्पणी मे चिंता ज़ाहिर कर आए थे । पर सच कहें तो जाने कितने साल से इस चिंता मे हैं कि आखिर सीरियल क्यों हमारे समाज को और खासकर औरत को सदियों पीछे धकेल रहे हैं ? एकता कपूर को कई गालियाँ भी दे डाली मन ही मन ।&lt;br /&gt; आज अखबार देखा तो पता लगा कि अफगानिस्तान की सरकार ने तुलसी और कसौटी जैसे सीरियलों पर रोक लगा दी है । ताली बजाने को मन हुआ ।पर पूरी खबर पढ कर खुशी को जंग लग गया । &lt;strong&gt;एक बन्द समाज की सुन्दर पैकेज में से उठती सड़ान्ध को माने दूसरे बन्द समाज ने नकार दिया हो &lt;/strong&gt;।यदि काबुल वालों ने ‘&lt;a href="http://starplus.indya.com/serials/kyunki/photogallery/photo1.html"&gt;सास भी कभी बहू...&lt;/a&gt;’ को इसलिए नकारा होता कि ये कहानियाँ हमारे नागरिकों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए बिल्कुल भी ठीक नही हैं ,और ये साज़िश ,रंजिश ,हिंसा , विकृत -घिनौने चरित्रों व गलत सदेशों के इर्द गिर्द घूमती हैं ...तो अच्छा होता । लेकिन काबुलीसरकार ने कारण दिया तो केवल “विवाहेतर सम्बन्ध व टूटती शादियाँ ” । मुस्लिम समाज में बेहद लोकप्रिय होने पर भी ये सीरियल इन दो कारणों से कठमुलाओं को रास नही आये । साज़िश और बदले की भावनाओं से भरे हुए किरदार और कहानियाँ तो ठीक हैं पर शादी का टूटना और विवाहेतर सम्बन्ध कतई स्वीकार नही किये जा सकते ।आखिर अफगानी समाज पर इसका क्या असर होगा ?&lt;br /&gt;शादी एक ऐसा बेसिक रिश्ता है जिसका टूटना किसी बन्द समाज को बर्दाश्त नही । और उसकी पवित्रता {?} को बचाए रखने के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं ।इन कहानियों में समाज के असली परेशानियाँ और स्त्री की मूलभूत समस्याएम कहाँ खो गयी हैं । घर को जोड़े रखना ,सत्य और त्याग की मूर्ति बनना ,करवाचौथ मनाना ,पति को देवता मानना । क्या यही हैं आज की स्त्री के जीवन की ज़रूरतें ?विमल जी ने जिन सीरियलों के नाम गिनाए वे साफ दिखा रहे हैं कि स्त्री की एक ट्रेडीशनल छवि को ही प्रोत्साहित किया जा रहा है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्टार प्लस में एक खबर है “सास बहू और साज़िश ”जिसके पीछे का नारा है कि “क्योंकि सीरियल भी खबर हैं ” । इतना महत्व इन घटिया कहानियो को ? तो मुझे सबसे बड़ी आपत्ति है इस सीरियलों मे दिखाई जाने वाली साज़िशें और बदले और षडयंत्र और तानाकशी और सभी बुराइयों के बीच एक दिये सी खुद जलती और दूसरों को रोशनी देती अकेली सीता पार्वती सी नायिका से । &lt;a href="http://creepsterinc.wordpress.com/2007/09/14/kahani-kis-ghar-ki/#comment-373"&gt;जाने किस घर की कहनियाँ हैं ये &lt;/a&gt;।गलतफहमियाँ पैदा करती हुई खलनायिकाएँ और रोती बिसूरती सावित्रियाँ जो सक्षम समर्थ हैं । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज़रूरत है इन सीरियल्स के पूरे बहिष्कार की । &lt;br /&gt;लेकिन मेरे या एक दो और लोगों के बहिष्कार से क्या होगा । जनता इन्हें लोकप्रिय बना रही है ,चैनल पैसे भुना रहा है ,सरकार हाथ पर हाथ रखे बैठी है । &lt;br /&gt;कहाँ से नियंत्रण स्थापित होगा । सरकार के हाथ मे हमेशा कैंची देना क्या सही होगा ? जनता क्या इतनी शिक्षित और समझदार है कि खुद ही इन्हे देखना बन्द कर दे ? क्या एक सेंसर बोर्ड होना चाहिये सीरियल्स के लिए ? या कि खुद निर्माता को जनता के प्रति यह ज़िम्म्मेदारी समझते हुए कहानियों का चयन ध्यान से करना होगा ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-4380348844784712688?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/4380348844784712688/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=4380348844784712688' title='19 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/4380348844784712688'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/4380348844784712688'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/04/blog-post_23.html' title='सास बहू को विमल जी की नज़र लगी'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SA7O6mISxzI/AAAAAAAAALQ/FKN-tfZjkY4/s72-c/saas+bahoo.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>19</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-2869002768854638736</id><published>2008-04-15T09:53:00.008+05:30</published><updated>2008-04-15T12:51:22.200+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दलित विमर्श Free Tibet'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='महात्मा गांधी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्त्री'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चीन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अस्मिता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तिब्बत'/><title type='text'>IBRT -"पहले वे उपेक्षा करेंगे ,फिर वे हसेंगे ,फिर वे लड़ेंगे ...और फिर हम जीत जायेंगे ...."</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SARWLA6n9MI/AAAAAAAAALI/9VuASig6i88/s1600-h/363_Dalai_Lama_tweaked.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SARWLA6n9MI/AAAAAAAAALI/9VuASig6i88/s200/363_Dalai_Lama_tweaked.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5189367417862091970" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बहुत छोटी थी जब एक बार धर्मशाला गयी थी ।बहुत हैरानी होती थी वहाँ बसे एक छोटे तिब्बत को देख कर ।अपने मे खुश ,बुद्ध के अहिंसक श्रद्धालु ,शरणार्थी और अति साधारण मानव । लेकिन दिल्ली के बस अड्डा के पास की मोनास्ट्री से निकल ये जीव अचानक सड़कों पर कैसे उतर आये हैं ये देख अब हैरानी नही हो रही ,स्वातंत्रय किसी भी जाति की सबसे बड़ी चाह है ।एक भारतीय शायद इस बात को बहुत बेहतर समझ सकता है । लेकिन क्या वह देश भी इसे समझ पाएगा जिसने दमित होने का , जिसने शासित और शोषित होने का दंश नही सहा ?क्या मुख्य धारा का आदमी कभी हाशिये के दर्द और विमर्श को समझ सकता है ?या उसके विद्रोह को अपने विद्रूप से सदैव झुठलाने की कोशिश करता है ?और जब हाशिये के पक्ष मे बोलता है तो हमेशा उसकी शक्ति का ह्रास करने के लिए ? &lt;br /&gt;बड़ी हैरानी होती है जब हम विद्रोह और विरोध के कारणो पर न जाकर विद्रोह और विमर्श के तरीकों पर ही बहस करने बैठ जाते हैं ?&lt;br /&gt;तिब्बती आज भड़क उठे हैं । क्या हम उनका शोर सुन पा रहे हैं ? या शोर पर सवाल उठा रहे हैं ? &lt;a href="http://aquadreamer.blogspot.com/2008/04/images-of-angry-seething-lhasa-flashed.html"&gt;भारत मे जन्मी एक बेचैन तिब्बती आत्मा &lt;/a&gt; कह रही है कि हम वह शोर सुनें ।इस बेचैन आत्मा के सवाल हैं -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“Please relieve us from the expectations of a community which is non-violent in nature. Buddhism preaches non-violence, but which religion doesn’t? Isn’t it human to shout and protest if your country is suppressed for decades, despite attempts of peaceful dialogue? We are just humans, not Buddha”.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज़ादी के साथ साथ यह सवाल है अस्मिता का । और किसी भी दमित जाति की अस्मिता का सवाल शक्ति ,सत्ता के नियंत्रण से टकराता है ।इस मायने में मैं स्त्री ,दलित या किसी भी दमित अस्मिता के सवाल को भी साथ ही जोड़कर देखूंगी ।&lt;br /&gt; कोई भी अस्मिता जब मुखर होती है उसके पीछे कुछ ऐतिहासिक ,राजनीतिक ,सामाजिक करण होते हैं । स्त्री ,दलित अस्मिताओं के मुखर होने के पीछे भी रहे हैं । या सबसे सही यह है कि इतिहास अपने आप मे एक बड़ा कारण हो जाता है ।वर्ना कोई दमित अस्मिता अचानक एक ही दिन अत्याचार सह कर लड़ने को आतुर नही हो जाती ।40-50 साल के अहिंसक विरोध के बाद ही आज तिब्बत भड़क उठा है । सदियों के अन्याय सहने के बाद और अपनी लॉयल्टी {?}दिखाने के बाद ही स्त्री-दलित अस्मिताएँ अब जब तब भड़क उठती हैं ।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखा जाए तो किसी अस्मिता के मुखर होने के पीछे कुछ अनिवार्य तत्व होते हैं जैसे -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1.उस समुदाय या जाति द्वारा एक समान इतिहास शेयर करना ।&lt;br /&gt;2. समान संस्कृति और परम्परा को शेयर करना &lt;br /&gt;3. उस समुदाय के उद्गम सम्बन्धी समान धारणाएँ और मिथक -परमपरा से समान रूप से सम्बद्ध होना ।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक समान इतिहास है जो एक स्त्री होने के नाते मुझे हर स्त्री से ही नही जोड़ता बल्कि हर स्त्री को उसके अतीत के साथ निरंतरता में खड़ा करता है। यहीं से उसे बल मिलता है ।दलित अस्मिता के साथ भी ये सभी घटक लागू होते हैं और तिब्बती लोगो के साथ भी । ये सभी अस्मिताएँ एक ऐतिहासिक प्रक्रिया के तहत आगे आई हैं ।और एक समान वर्तमान भी शेयर कर रही हैं ।केन्द्रीय शक्ति सत्ता और ज्ञान की मुख्यधारा से एक समान उपेक्षा और दमन भी शेयर कर रही हैं । &lt;br /&gt;कहने वाले अभी कह रहे हैं कि दलित बार-बार वही बात करते हैं उनके पास कहने को कुछ नया नही माना कभी अन्याय हुआ था पर अब भी क्यो रो रहे हैं ,स्त्री विमर्शकारों के भी सिर पैर नही और उनकी दलीलों मे कुछ नया नही ये सुघड़ औरतो की आत्ममुग्धता के अलावा कुछ और नही ,तिब्बती भी बुद्ध के अनुयायी होकर भी हिंसा पर उतारू हैं और इसलिए खोखले हैं वे इतनी जल्दी अहिंसा से हिन्सा पर उतर आये ? इतना ही सब्र था ? &lt;br /&gt;माने यह कि हर बार की तरह विरोध के कारणो पर विचार न कर के हम सब विरोध के तरीकों पर बहस कर के इधर उधर खिसक ले रहे हैं ।सवाल पुराने होते जा रहे हैं और सच ये है कि वे बढते जा रहे हैं लेकिन उनके जवाब की जगह उपेक्षा मिल रही है ।  और सबसे बड़ा सच यह है कि  ओलम्पिक की मशाल के साथ हर देश की सरकार खड़ी है ...........&lt;br /&gt; मुख्यधारा की यह उपेक्षा और यह उपहास क्या वाकई इन अस्मिताओं को उभरने से रोक लेगा ?क्या हम भड़के हुए तिब्बत पर पानी डालकर उसकी आग बुझा देंगे  .....?  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;a href="http://aquadreamer.blogspot.com/2008/04/images-of-angry-seething-lhasa-flashed.html"&gt;बेचैन आत्मा का{जाने कितनी आत्माओं का}यह विश्वास &lt;/a&gt;है  कि उपेक्षा और उपहास का यह सिलसिला थमेगा ।-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"Mahatma Gandhi has said "First they ignore you, then they laugh at you, then they fight you. And then... you win." I hope to God it’s true for Tibet!" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;" &lt;strong&gt;पहले वे उपेक्षा करेंगे ,फिर हसेंगे ...हाशिये के पूरे पन्ने पर बिखर जाने वाला हास्य ...{या कहें अट्टहास } , फिर वे लड़ेंगे .....और तब हम जीत जायेंगे &lt;/strong&gt;।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आमीन !!&lt;br /&gt;&lt;em&gt;IBRT -India born restless tibetan&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-2869002768854638736?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/2869002768854638736/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=2869002768854638736' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/2869002768854638736'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/2869002768854638736'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/04/blog-post_15.html' title='IBRT -&quot;पहले वे उपेक्षा करेंगे ,फिर वे हसेंगे ,फिर वे लड़ेंगे ...और फिर हम जीत जायेंगे ....&quot;'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SARWLA6n9MI/AAAAAAAAALI/9VuASig6i88/s72-c/363_Dalai_Lama_tweaked.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-2354624666264775640</id><published>2008-04-07T19:45:00.005+05:30</published><updated>2008-04-09T09:00:37.093+05:30</updated><title type='text'>औरतों ! तुम तलाक क्यों नहीं ले लेतीं ?</title><content type='html'>अब   तो हद है ।मैं बार बार इस टॉपिक से पीछा छुड़ाने की कोशिश करती हूँ , ये भूत की तरह मेरे पीछे लगा रहता है । माजरा क्या है ? आज क्यो न इसे चुका दूँ , पीछा छूटे !एक बार ! आर या पार ! बस इतना सा झेलना और बच जायेगा कि जब तक फैसले न ले लूँ अपने दम पर !कोई नही बदलेगा तुम्हारे लिए । तुम खुद को बदल डालो । एक दम ! कईं सदियों के कष्ट का हल एक पल दूर है । ले डालो तलाक ! या कर दो इनकार ! नही करनी शादी ! नही बनना मुझे पत्नी !नही होना मुझे गुलाम !मैं अपनी शर्तों पे जिउंगी !&lt;a href="http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/04/blog-post.html"&gt;ये अनाम &lt;/a&gt;मुझे सोच के रास्तों पर से गुज़रने के पहले ही भड़का दे रहे हैं ।मुझे एकदम से कोई हल नही सूझ रहा । बस एक झटका और सालों के नरक से निजात ! कितना सरल है न !आखिर अपने आप समाज सुधर जायेगा जब हम सब एक स्वर में खड़ी होकर कह देंगी कि जाओ हम तुम्हारे बिना रह लेंगे { क्या सचमुच ? }और जो कहे के बिन तुम्हारे रह भी नही सकती और इस तरह साथ रह भी नही सकती ,अपना चेहरा देखो कि कितने अमानवीय हो और अहसास हो जाए तो खुद को बदलो ,लेकिन वो तो नही बदलेगा ,तो मैं मुँह बन्द करके पड़ी क्यों नही रहती ,अपनी घुटन से औरों को रसातल का रास्ता दिखाने का कलंक तो न मिलेगा ?&lt;br /&gt;लेकिन हद है कि कोई पत्नी साथ खडी नही होगी जब मैं कहूंगी-आर या पार ।क्योंकि कुछ मामलों में नही होता आर या पार । जब होता है तो सिखाना नही पड़ता ।वो चिंतन का एक सिलसिला होता है जो आर या पार के प्रश्न का उत्तर बन जाता है ।सोच के वो स्फुलिंग जगाना या जागना ज़रूरी है,वर्ना आर- पार के क्षण में भी तुम हार का रास्ता चुनोगी ।पार चुनने की हिम्मत  स्वचेतना से आती है ,अस्मिता से मिलती है ,मैं क्या हूँ ? मैं ऐसी क्यों हूँ ? किसने किया ऐसा ? यह व्यवस्था क्या है ? किसके हित मे बनाई गयी ? किसने बनाई ? इसमे मेरी जगह क्या है ? ऐसी जगह क्यों है ? क्या मैं वाकई क्षीण हूँ ? तुच्छ हूँ ? क्या मेरे प्रति किये जाने वाले कुछ सांसारिक कार्य मेरा अपमान हैं जिन्हें मैं दुनिया की रीति माने बैठी हूँ ?&lt;br /&gt;"जीव क्या है ? क्यों है ? जगत क्या है ?ईश्वर क्या है ? मैं संसार में क्यों हूँ ?"ये भारतीय अध्यात्म के आदि प्रश्न हैं जिनके जवाब खोजता हुआ मानव अपनी अस्मिता और अस्तित्व के प्रति सचेत होता है ।जब तक अस्मिता के सवाल ही मन में न उठें कोई भी फैसला हमारा कैसे होप सकता है ? कहाँ से आयेगी वह ऊर्जा जो किसी निर्णय के बाद के आने वाले परिणामों को झेलने के लिए हमारा मन तैयार करेगी ? और क्या हमारे निर्णय निरपेक्ष हो सकते हैं ?जिससे मैं प्यार करती हूँ , उसे उठा के पटक दूँ ,क्योंकि वह एक व्यवस्था के तहत् पला है? या धीम धीमे चोट करूँ ?&lt;br /&gt;मेरी माँ के मन में नही उठे कभी सवाल !वह ज़्यादा पढी नही थी ! उसका ज़माना भी ऐसा था जब स्त्री आज के मुकाबले ज़्यादा बन्धन में थी !मैं ,उसकी अगली पीढी ,जाने कितने सवाल उठा रही हूँ , जाने कितने फैसले खुद ले पा रही हूँ ! मेरा समाज और परिवेश उसकी अपेक्षा में थोड़ा खुला है । मैं उससे ज़्याद पढी लिखी हूँ ।&lt;br /&gt;सोचती हूँ अगर मैं 9-10 क्लास पढी होती ,क्या मैं इतने सवाल उठा पाती ? क्या मैं समझ पाती कि पितृसत्ता क्या है ? वो क्यों खतरनाक है मेरे अस्तित्व के लिए ?मुझे आएना कौन दिखाता रहा ? किताबें ? टी वी ? अखबार ? कॉलेज ?कैम्पस?बहन ? या कोई मित्र?कोई तो होगा !!स्वचेतना का उत्प्रेरक !  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं कमज़ोर हूँ !मैं उठा के पटक नही सकती अपने पिता को ! अपने पति को ! मैं उन्हे प्यार करती हूँ !इसलिए मुझे वक़्त लग रहा है !वे मेरे असली कष्टॉ को पहचान रहे हैं । वे मेरा साथ देने की कोशिश कर रहे हैं । वे खुद को बदल रहे हैं ।बेशक धीमे धीमे । उठा के पटक सकती हूँ पर ऐसा नही करूंगी ।उनकी कोशिश बेकार हो जायेगी । मुझे उनका साथ चाहिये । मुझे मातृत्व सुख भी चाहिये ।मेरी संतान को भी माता पिता दोनो चाहिये &lt;a href="http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/04/blog-post.html"&gt;।बटन न लगाने वाली चिड़चिड़ि पत्नियाँ &lt;/a&gt;मेरे आस पास हैं ।उन्हें सोचने की सही दिशा चाहिये ।&lt;br /&gt;आइना दिखाने से बेहतर क्या हो सकता है ? &lt;br /&gt;डॉ. अम्बेदकर ने एक बार कहा था &lt;strong&gt;-"गुलाम को यह दिखा दो ,अहसास करा दो कि वह गुलाम है , और वह विद्रोह कर देगा !!"&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-2354624666264775640?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/2354624666264775640/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=2354624666264775640' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/2354624666264775640'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/2354624666264775640'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/04/blog-post_07.html' title='औरतों ! तुम तलाक क्यों नहीं ले लेतीं ?'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-1375382495023632247</id><published>2008-04-07T14:01:00.005+05:30</published><updated>2008-04-07T14:29:08.973+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पतित पत्नी के नोट्स'/><title type='text'>चिड़चिड़ी पत्नी</title><content type='html'>झल्लाई औरत सुबह सुबह चकरघिन्नी सी भाग रही थी । सब ठीक ठाक निबट जाए यही सोच रही थी । रोज़ यही सोचती है ।कल जो कमीज़ बटन लगाने को दी गयी थी वह उसे भूल ही गयी थी । आदमी ने उसे लाकर रोटी बेलती औरत के मुँह पर पटका ।"तुमसे एक बटन नही लगाया जाता ,मेरे ही काम नही याद रहते !"औरत की आँख से झर् झर आँसू बहने लगे ।वह रोटी छोड़ कमरे की ओर लपकी तो आदमी बोला "अब कोई ज़रूरत नही है । मैने दूसरी कमीज़ पहन ली है ।"वह मुँह झुकाए वापस बच्चों के टिफिन पैक़ करने लगी ।सबके चले जाने के बाद उसे सुकून मिला । पर अभी और बहुत् से काम निबटाने थे । दिन कटा । पता नही चला ।रात को छोटा बिस्टर मे कुनमुना रहा था । आदमी झल्ला रहा था । "उँह ! आराम से सो भी नही सकते !"&lt;br /&gt;औरत ने मन ही मन गाली दी "कमबख्त आदमी ! हरामी ,कुत्ता !इसे सबसे चिढ है । बच्चा क्या मैं दहेज में लायी थी ?रंजना पागल है । पति को रिझा कर बस में रखने के टिप्स मुझे नही चाहिये । पागल समझ रखा है ।बनावटी मुस्कान ला लाकर रोज़ बात करना मेरे बस का नही । थक जाती हूँ ।रोज़ बिस्तर गर्म कर सकूँ इतनी हालत नही बचती ।भाड़ मे जाए ।"और औरत दिन पर दिन ढीठ होती जा रही थी । वह चिड़चिड़ी थी । लड़ाक थी । आए दिन रिक्शेवलो ,औटोवालों ,धोबी से झगड़ती थी ।उसे झगड़ कर चैन मिलता ।आदमी भी यही कहता था "बस ! तुमसे तो झगड़ा करवा लो जितना मर्ज़ी !हर बात पे लड़ने को तैयार । बात करना ही गुनाह है । क्या करूँ ऐसे घर पर रहकर " और वह निकल गया संडे का दिन दोसतों के साथ बिताने ।झगड़ैल बीवी से तो निजात मिलेगी ।झक्की औरत संडे के दिन बड़े का प्रोजेक्ट बनवाती रही और पाव भाजी बनाकर बच्चों को खिलाती रही ।संडे की शाम आदमी लौटा तो औरत अगले दिन बच्चों के स्कूल के कपड़े इस्त्री कर रही थी । वह बटन लगाना संडे को भी भूल गयी थी ।क्या जानबूझकर !!?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-1375382495023632247?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/1375382495023632247/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=1375382495023632247' title='17 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/1375382495023632247'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/1375382495023632247'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/04/blog-post.html' title='चिड़चिड़ी पत्नी'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-8973283569301552679</id><published>2008-03-28T12:01:00.008+05:30</published><updated>2008-03-28T21:06:16.595+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='घर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मनुष्य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कबाड़'/><title type='text'>मनुष्य़ मूलत: कबाड़ी है ..</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/R-0ORwW2e-I/AAAAAAAAAK4/W8A4s6wXTk8/s1600-h/basement-junk.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/R-0ORwW2e-I/AAAAAAAAAK4/W8A4s6wXTk8/s200/basement-junk.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5182814444374621154" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जहाँ भी निकल जाए इनसान ..एक आशियाना साधारण ,छोटा ,जैसा भी , बनाता है उसमें रमता जाता है और धीरे धीरे एक गृहस्थी एक साम्राज्य खडा कर लेता है अपने आस- पास । फिर वक़्त गुज़रने के साथ उसमें से बहुत कुछ कबाड बनता जाता है ।फिर दिक्कत आती है उस कबाड़ के मैनैजमेंट की । &lt;br /&gt;{साफ कर दूँ कि यह कबाड़ वह &lt;a href="http://kabaadkhaana.blogspot.com"&gt;कबाड़खाने&lt;/a&gt; वाला नही है ।}&lt;br /&gt;कुछ  दिन तक अनदेखा करते रहो घर को , रसोई को ,पढने की मेज़ को , किताबों-कपडों की अलमारी को और अचानक एक दिन घर कबाड़ खाना लगने लगता है और हम सब उसके कबाड़प्रिय कबाड़ी ।  4-5 साल पहले दीवाली पर मन कर के खरीदा हुआ सुन्दर लैम्प शेड कब आँखों को खटकने लग जाता है पता ही नही चलता । पहले बडे मन से हम चीज़ें यहाँ-वहाँ  से इकट्ठा करते हैं और वक़्त बीतते बीतते वे कबाड में तब्दील होने लगती हैं । पर मोह उन्हें फेंकने से रोके रखता है । जब बच्चे थे , घर में एक कोना ऐसा था जिसे हम खड्डा कहा करते थे ।वहाँ हर वह चीज़ जो काम की नही थी आँख मून्दकर फेंक दी जाती थी । कुछ पुराने जूते-चप्पल, एक-दो बाल्टियाँ ,पुराना हीटर ,एक खराब प्रेस ,पुराने अखबार ,मैगज़ींस ,स्पेयर बर्तन जिनकी कब ज़रूरत पडने वाली है पता नही ,सब कुछ उस अन्धे कुएँ में चला जाता था अनंत काल के लिए ।धीरे-धीरे नया सामान आता और पहले का नया सामान पुराना पड़ जाता । और खड्डा फैलता जाता था ।छतों पर पुराने ज़माने के ब्लैक एण्ड वाइट टीवी और कुछ लकडियाँ बारिशों में भीगते रहें और उसकी लकड़ी फूलती रही ।बहुत् साल बाद उससे छुटकारा पाया । अब भी यही हाल है ।फर्क यह है कि अब कोई खड्डा नही । इस छोटे से तीन कमरों के घर में कबाड़खाना बनाने लायक जगह नही है । इसलिए कबाड़ और असल सामान में फर्क धीरे-धीरे मिटता जा रहा है । जो आज नया है कल कबाड हो जाता है ।समेटे नही सिमटता । फिर भी नए कपडे खरीदे जाते हैं , पुराने फट नही रहे पर फेड तो हो रहे हैं ;अलमारी को साँस नही आ रहा । धुले कपडे -मैले कपड़े -घर आकर उतारे गये कपड़े ,धोबन दे गयी जो कपड़ॆ ,ऑल्ट्रेशन को जाने वाले कपड़े , ड्राईक्लीनिंग से आये कपड़ॆ बच्चे के छोटे हो गये कपड़े ,सब जहाँ जगह मिलती है पसर जाते हैं ।एक टेबल है । उस पर किसका सामान हो यह लड़ाई रहती है । श्रीमान जी मेरा सामान शिफ्ट करते हैं ,पीछे से मैं उनका कर देती हूँ । बच्चे का कहाँ जाएगा अभी कैसे सोचें ।अपने से फुरसत नही ।रसोई कभी कभी ज्वालमुखी सी बाहर फट पड़्ने वाली सी दिखाई देती है ।झल्लाहट होती है ।सामान ही सामान है इस घर में । सदियों से पड़ी सड़ती एक चीज़ जैसे ही ठिकाने लगाओ दूसरे तीसरे दिन कोई पूछ लेता है उसके बारे में ।&lt;br /&gt;बिल आते हैं ,चिट्ठियाँ आती हैं , बैंक वालों के नितनये चिट्ठे आते हैं ,कुछ ज़रूरी खत भी आते हैं । सब इकट्ठे होते हैं ,एक दिन ढेर बन जाने के लिए ,जिसमें से किसी दिन अचानक अड्रेस प्रूफ के तौर पर ढूंढना पड़ जाता है कोई बिल ,या कुछ और । और नही मिलता । पुरानी किताबें पढी नही जातीं नयी आ जाती हैं हर बुक फेयर से ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक वक़्त ऐसा भी शादी के बाद कि घर से खाली हाथ निकले थे ,साल भर के अन्दर बहुत बड़ी चीज़े न सही पर बहुतेरा सामान इकट्ठा कर लिया था । सिर्फ गृहस्थों का यह हाल नही ।एक मित्र अकेली रहती थीं । उन्होने भी धीरे-धीरे एक साम्राज्य खड़ा कर लिया था अपने आस-पास । लगभग हर घर में अब देखती हूँ एक स्टोर रूम है जहाँ कुछ भी लाकर पटका जा सकता है । किसी के आने की खबर पर जहाँ बहुत कुछ ठूंसा जा सकता हो । कबाडखाना अलग न हो तो सारा घर ही कबाड़ी की दुकान में तब्दील हो जाता है । &lt;br /&gt;कभी कभी सोचती हूँ एक आदमी हर वक़्त तैनात चाहिये घर को कबाड बनने से बचाने के लिए । पुराने सामान को झड़्ने पोंछने के लिए । रद्दी की सॉर्टिंग के लिए । उतारे गये जूतों और इस्तेमाल न होने वाले चप्पलों को सहेज कर रखने के लिए । गर्मियों के आने पर स्वेटर कम्बल पलंगों और अलमारियों में धँसाने के लिए, कोट -शॉलें ड्राइक्लीन कराकर सम्भालने के लिए ।जूठे बर्तनों को उठा कर रसोई में पहुँचाने के लिए ,चादरें और तकिये के लिहाफ बदलने के लिए ,रैक से बाहर टपकती किताबों को बार बार रैक में पहुँचाने ले लिए, अलमारियों में कपड़े लगातार ठिकाने पर रखते रहने के लिए .............खपते रहने के लिए .....कबाड़ सहेजते समेटते हुए .....कबाड़ बनते रहने के लिए ......&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-8973283569301552679?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/8973283569301552679/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=8973283569301552679' title='21 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/8973283569301552679'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/8973283569301552679'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/03/blog-post_28.html' title='मनुष्य़ मूलत: कबाड़ी है ..'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/R-0ORwW2e-I/AAAAAAAAAK4/W8A4s6wXTk8/s72-c/basement-junk.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>21</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-6265405975177997087</id><published>2008-03-13T11:15:00.005+05:30</published><updated>2008-03-13T12:08:41.871+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नींद'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सोना'/><title type='text'>अहा ! सोना !! कितना आह्लादकारी !!</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/R9jKC0cespI/AAAAAAAAAKg/qgTQyWeYNlg/s1600-h/%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/R9jKC0cespI/AAAAAAAAAKg/qgTQyWeYNlg/s400/%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5177109921449030290" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अहा ! सोना !! कितना आह्लादकारी है !!बरसों से सोच रही हूँ जैसे द्विवेदीयुगीन {ठीक से याद नही आ रहा नाम }एक लेखक के लेख है -"दाँत", "हाथ","नाक""कान" ...... या शुक्ल जी के ही "लोभ और प्रीति" "भक्ति -श्रद्धा" वैसे ही मै अपने प्रिय विषय "नींद" पर लिख डालूँ कुछ तडकता -फडकता । जैसा कि मेरा ब्लॉगर प्रोफाइल कहता है - &lt;strong&gt;सोना मेरा एक शौक है &lt;/strong&gt;।जब और कोई काम न हो मुझे सिर्फ और सिर्फ सोना पसन्द है {वैसे जब बहुत काम हो तब भी मेरा यही मन होता है कि सो जाऊँ } खैर ,मैं ऐसी बडी सुआड {लिक्खाड की तर्ज पर} हूँ  यह मैने औरों से ही जाना है । होश सम्भालते -सम्भालते यह मेरे बारे मे प्रसिद्ध हो चुका था कि मुझे जब भी जहाँ भी कहा जाये कि -चलो सो ओ । तो मै बिना एक पल भी देर किये सो जाऊंगी । एग्ज़ाम के दिनों जब तपस्या कर रहे होते थे एक आसन पर विराज कर, झाड -झंखाड की भांति आस-पास पुस्तकें फैला कर ,तो बडी कोफ्त होती थी रात में सबके सो जाने के बाद । मन से गालियाँ फूट पडती थी हर एक व्यक्ति के प्रति जो कहता था - "हम सोने जा रहे हैं ,गुडनाइट ! ठीक से पढना ।" रात के एक डेढ बजते बजते किसी के उठने की आहट होती तो बरबस मन चिल्ला पडता था ---"अरे ! कोई तो आकर कह दो ,बेटा अब सो जा बहुत पढ लिया ।" हँह !!  एम. ए. मे लेकचर अटेंड नही कर पाती थी {ये और बात है कि अब लेक्चर देने में बडा आनन्द आता है}। हद तो यह थी कि मुझे अपने बस्ते में टॉफी , काजू . मिसरी ,इलायची वगैरह रख कर ले जाना पडता था कि जब भी लेक्चर सुनते- सुनते नीन्द अने लगे मुँह चलाना शुरु कर दूँ । जैसे मच्छर "ऑल-आउट " के आदि हो जाते हैं और ऑल -आउट के सर पर ही मंडराने लगते हैं , मेरे ऊपर मंचिंग का उपाय बेअसर होने लगा । मैने क्लास करना बहुत कम कर दिया ।यूं ही पढाई की । टॉप-शॉप भी किया पर सोने की ललक मन में हर पल मचलती  थी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर नीन्द को करारा झटका लगा जब संतान ने जीवन में प्रवेश किया । यह मेरी नीन्द पर कुठाराघात था । जब नन्हा शिशु दुनिया में आया मैने उस पर एक नज़र डाली । बस!! काम खत्म !! और सुख की लम्बी नीन्द में कई दिन के लिए एक साथ डूब जाना चाहा । {एक माँ की ऐसी स्वीकारोक्ति बडी पतनशील है न! } मुझे बहुत दिन तक बच्चा अपना प्रतिद्वन्द्वी लगता रहा । कमबख्त सारी रात जगता और सुबह जब घर के सारे काम मुँह बाये खडे होते वह चैन की नीन्द सोता और हम काम करते । क्या कहूँ ,मेरी नीन्द पर किसी और की नीन्द भारी पडने लगी । किसी भी और माँ की तरह मुझे भी यह स्वीकार कर लेना &lt;strong&gt;पडा&lt;/strong&gt; कि मेरे "मैं" से ऊपर किसी और का "उँए -उँए... " है । &lt;br /&gt;नौकरी करते ,सुबह तडके उठ रसोई निबटाते ,तीन बार बस बदल कर हाँफते-हाँफते ऑफिस पहुँचते , पढाई भी साथ -साथ करते ,यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी से लौटते लौटते ,शाम को खाना बनाते और सबको खिलाते ,बच्चे को सुलाने के लिए बिस्तर पर धम्म से लेटते -लेटते यह हालत हो जाती कि अनायास मुख से निकलता था कि -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ओह ! मैं कितनी खुशनसीब हूँ कि मुझे सोने को मेरा बिस्तर मिला और अटूट गहरी  नीन्द !!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दो-तीन दिन से एक प्रोजेक्ट के चलते नीन्द की शामत आ गयी थी । कल दिन भर से सर भन्ना रहा था और आँखों के आगे बस बिस्तर घूम रहा था । लोक-लाज का भय मिटाकर एक झपकी मैने कल के सेमिनार में कुर्सी पर बैठे -बैठे ले डाली । पर "ऊँट के मुँह में जीरा "साबित हुई। एक घटिया ,लकडी के फट्टे वाली कुर्सी पर भला क्या आराम मिलता । उलटा हाड-गोड दुख गये ।&lt;br /&gt;घर पहुँच कर देखा सासू माँ ऑलरेडी थकान के कारण बीमार- सी पडी थीं । सर बस अब ज्यूँ फटा चाहता था ,आँखे बस अब बन्द हुआ चाह्ती थीं ,मन चीत्कार करना चाह्ता था ,लेकिन बेटे का स्कूल का होमवर्क कराना था ,सबको खाना खिलाना था । बहुत कर्म निबटाने थे । अंतत: डिस्प्रिन खा कर ,सर पर दुपट्टा बान्ध कर जब लेटी तो फिर मुँह से यही निकला -&lt;br /&gt;"आह !! नीन्द कितनी आह्लादकारी है । कितनी अपनी है । कितनी सच्ची है । कितनी ज़रूरी है । मुझे दुनिया से छीन ले जाती है ,कहीं दूर ......परे ....बस मैं होती हूँ .....और नींद ...मेरे भीतर चुपचाप बहती सलिला सी ......जिसके किनारे पाँव डुबाये ,अकेली बैठ मैं जाने कितनी सदियों के लिए ऊर्जा समेट लेती हूँ ........."&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-6265405975177997087?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/6265405975177997087/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=6265405975177997087' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/6265405975177997087'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/6265405975177997087'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/03/blog-post_13.html' title='अहा ! सोना !! कितना आह्लादकारी !!'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/R9jKC0cespI/AAAAAAAAAKg/qgTQyWeYNlg/s72-c/%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-8053539595999946742</id><published>2008-03-04T11:06:00.004+05:30</published><updated>2008-03-04T11:52:10.946+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यंग्य'/><title type='text'>कॉक्रोचों पर अत्याचार क्यों ?</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/R8zqIdQFX0I/AAAAAAAAAKY/zG_36djwMeA/s1600-h/%E0%A4%95%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%9A%E0%A5%8D.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/R8zqIdQFX0I/AAAAAAAAAKY/zG_36djwMeA/s400/%E0%A4%95%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%9A%E0%A5%8D.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5173767502953799490" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नोट &lt;/strong&gt;--&lt;em&gt;ये एक अत्यंत गम्भीर पोस्ट है जो बहुत बडे प्रश्नों को उठाती है , कृपया इसे हास्य-व्यंग्य समझ कर अनदेखा न करें &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई हमें निहायत असम्वेदनशील कहेगा अगर हम कॉक्रोचों का पक्ष लेने वालों पर हँसने लगें । आखिर वे भी इस जगत के जीव हैं और उन्हें भी किसी मच्छर मक्षिका की तरह जीने का हक है । और ब्लॉग बनाने का भी है । जब &lt;a href="http://azdak.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html"&gt;बैलों का हो सकता &lt;/a&gt;है तो कॉक्रोचेज़ का क्यो नही । हर जीव की अपनी उपयोगिता है । जीवन चक्र में से एक को भी माइनस कर दो तो सबै ब्योबस्था गडबडा जायेगी ।{खिचरी भाषा के लिये मुआफ करें , स्पॉंटेनिअस विचार ऐसी ही भाषा मे आते है :-)}आखिर कॉक्रोचेज़ कितने ज़हीन प्राणी होते हैं । और उतने ही सम्वेदनशील । जब हम लोग खा पी कर रात को चैन की बंसी वगैरह बजा रहे होते हैं तभी ये लोग दबे पाँव रसोई के &lt;strong&gt;अन्धेरे में&lt;/strong&gt; उजागर होते हैं ,किसी देवदूत की तरह और सुनसान पडी रसोई को अपनी धमाचौकडी से गुलज़ार करते हैं । बेलन- कलछी -चम्मच के ये उजाड के साथी हैं ।ये न हों तो छिपकलियाँ क्या खाकर जियेंगी :-( पुरुषॉ को इनका विशेष आभारी होना चाहिये । ये विपदा बन कर स्त्री के सामने खडे हो जाते हैं और कामिनी को उनके नज़दीक लाते हैं । ये अपनी जनसंख्या को तेज़ी से बढाने मे माहिर है इस मायने में विशुद्ध भरतीय हैं । यूँ ही नही &lt;a href="http://www.google.com/search?sourceid=navclient&amp;aq=t&amp;ie=UTF-8&amp;rlz=1T4SKPB_enIN258IN259&amp;q=cockroaches"&gt;गूगल पर कॉकरोचेज़ के इतने &lt;/a&gt;सारे पेज दर्ज हैं ।वैसे आप सोच रहे होंगे कि इस कॉक्रोच - गुण -कथन का उद्देश्य क्या है । यूँ तो मानने को बहुतेरे हैं । न मानने को एक भी नही । पर फिलहाल एक सॉलिड कारण बता देते हैं । &lt;br /&gt;कॉक्रोचेज़ के प्रति हमारे मन में जो पूर्वाग्रह थे वे पिछले 15 दिन के मंथन के बाद दूर हुए । मंथन तब चालू हुआ जब हमने एक प्रेमी , अजी जीव-प्रेमी और कौन का प्रेमी ?, का "हिन्दुस्तान " में { हिन्दुस्तान दैनिक अखबार को कह रहे हैं , वैसे यह हिन्दुस्तान नामधारी  राष्ट्र के नाम भी एक सन्देश ही समझा जाये } खेदजनक पत्र पढा जो उन्होने सम्पादक के नाम लिखा है । सम्पादक भी बडे रसिया हैं , मनबसिया हैं जो ऐसा पत्र छाप के होली की छेडछाड अडभांस में कर दिये हैं । &lt;br /&gt;पेश है पत्र -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;क्या कोई और जीव भी ?&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;कॉलेजों में डिसेक्शन की प्रक्रिया के लिए महाराष्ट्र सहित देश भर के कॉक्रोचेज़ का प्रयोग हो रहा है । पहले मेंढक ,फिर चूहा और अब कॉकरोच ,विज्ञान के प्रयोगों के बलि चढते जा रहे हैं । कॉकरोच जैसे बेज़ुबान प्राणी पर यह अत्याचार ही तो है ।इस समाज में कॉकरोच गन्दगी का सूचक है तो क्या इनसान किसी से कम है ? महाराष्ट्र में क़ोलेज की डिसेक्शन प्रक्रिया के लिए एक -एक छात्र को असली आठ-आठ कॉकरोच चाहिये । यह कहाँ का इंसाफ है ? क्या पूरी कक्षा ही एक कॉकरोच से अपना प्रेक्टिकल पूरा नही कर सकती । पर्यावरण में कॉकरोचों का भी योगदान है । बच्चे कॉकरोचों से डरते नही । बल्कि इनकी मातारँ इनको दूध पिलाने के लिए कॉकरोचों से डराती हैं ।&lt;/em&gt;राजेन्द्र कुमार सिंह &lt;br /&gt;से-15&lt;br /&gt;रोहिणी &lt;br /&gt;दिल्ली ।&lt;br /&gt;{मुझे पूरा विश्वास है कि इस पत्र को सम्पादक ने एडिट किया है । जिस कारण हम कॉकरोच सम्बंन्धी अन्य कई महत्वपूर्ण जानकारियों से वंचित रह गये हैं । कोई भला मानस इस पत्र के लेखक को ब्ळॉग बनाकर अपनी बात कहने का लोकतांत्रिक माध्यम दिखाये ।}&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो दुनिया के कॉक्रोचेज़ एक हो जाओ ! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम बुद्धिजीवियों ने तुम्हारे लिये आवज़ बुलन्द की है । यूँ भी &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Gayatri_Chakravorty_Spivak"&gt;गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक &lt;/a&gt;कहती हैं न "कैन दि सबॉल्टर्न स्पीक ?" और ये भी कि बुद्धिजीवियों का कर्तव्य है कि वे निम्नवर्ग , दलित , शोषित के लिये आवाज़ उठायें क्योंकि वे खुद नही उठा सकते । &lt;br /&gt;एक विपरीत मत ये भी है कि - &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;खुदी को कर बुलन्द इतना कि हर स्प्रे से पहले , घर का मालिक तुझसे खुद पूछे -बता तरी रज़ा क्या है !&lt;/strong&gt;वाह ! वाह! &lt;br /&gt;अब ये कॉक्रोचेज़ का निजी मसला नही रहा । ये समाज का प्रश्न है जैसा कि राजेन्द्र जी ने अपने पत्र में कहा है । कृपया उदारता पूर्वक इस पर विचार करें । &lt;br /&gt;।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-8053539595999946742?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/8053539595999946742/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=8053539595999946742' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/8053539595999946742'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/8053539595999946742'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/03/blog-post.html' title='कॉक्रोचों पर अत्याचार क्यों ?'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/R8zqIdQFX0I/AAAAAAAAAKY/zG_36djwMeA/s72-c/%E0%A4%95%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%9A%E0%A5%8D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-3053991282763729516</id><published>2008-02-16T10:25:00.011+05:30</published><updated>2008-02-16T11:38:01.501+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अज़दक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पतनशीला पोस्ट'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='...'/><title type='text'>पतनशीला  पोस्ट ........</title><content type='html'>कितनी तल्खियाँ ,बेचैनियाँ हैं ...&lt;a href="http://diaryofanindian.blogspot.com/2008/02/blog-post_16.html"&gt;अतृप्त आत्माओं का संलाप- विलाप &lt;/a&gt;है ...व्यंग्य के माने समझने मे भी दिमाग में दर्द होने लगा .....दर्द अनरगल होने लगा....झरने लगा ....फेनिल दर्द !!  बेदर्दी । &lt;em&gt;हर्ट होने लगा । यू नो व्हेयर ? जस्ट हेयर !! दिल में &lt;/em&gt;।&lt;a href="http://hgdp.blogspot.com/2008/02/blog-post_16.html"&gt;प्लेन वनीला आइसक्रीम नही &lt;/a&gt;। झागदार आइसक्रीम ! ऐसे में &lt;a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=390"&gt;हडबडिया पोस्ट &lt;/a&gt;ही आयेगी न !बूढे भंगड समझते क्यो नही ![या सब समझ जाते हैं...होपलेसली पतनशील बूढाज़ !!] जलेबी सी बात करते हैं । व्यंग्य का बडा शौक है ? &lt;a href="http://azdak.blogspot.com"&gt;पतन नज़दीक है &lt;/a&gt;, देख रखना ।आखिर क्या ज़रूरत थी ? कहना नही आता तो चुप क्यो नही रहते । व्यक्ति और विचार में फर्क नही कर सकते ?गॉन आर द डेयज़ ...जब तुमहारा ज़िक्र था ...पर ...&lt;br /&gt;पर हमसे मतलब ? हमें क्यूँ बहस में कूद फान्द करने की पडी है । अब्बी , बस अब्बी कोई गरिया जाएगा ।आखिर क्या ज़रूरत थी ? कहना नही आता तो चुप क्यो नही रहते ।  डैम्म.....!! आये मेरी बला से । पर फेनिल दर्द रिस क्यूँ रहा है ? बेतरह !! कब तक ? &lt;br /&gt;खैर छोडो । अपनी पोस्ट ठेलो । शांति से खेलो , खेल जो खेलना है । उबलो नही वर्ना गिर पडोगे । &lt;br /&gt;अपना तो राजनीति में विश्वास नही । सीधे सीधे लिखे जायेंगे ।आप्को लगती हो राजनीति तो लगा करे । हमसे मतलब ?&lt;br /&gt;ऐसा नही कि नाम लेते डरते हैं हम । पर ये अपना इश्टाइल है । और नाम भी कितने लें । एक हो तो लें भी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://masijeevi.blogspot.com/2008/02/blog-post_14.html"&gt;कुछ सवाल अब भी मुँह बाए खडे हैं &lt;/a&gt; लाजवाब हैं । लाइलाज हैं । संगत कुसंगत हो गयी । । पर सवाल अब भी लाइलाज़ !! ।हम नही देखेंगे उन्हें ।कौन क्या है ? हमे क्या ? हमारी बला से। पर अतृप्त आत्माएँ अब भी रुदाली बनी हैं ...और उस पर फेनिल झरझराता , झबराया ,गदराया,फुँफकारता  दर्द !!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नोट&lt;/strong&gt;-- &lt;em&gt;इस पोस्ट का कोई अर्थ नही है । यदि किसी को लगता हो तो लगे , हमारी बला से !!!&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-3053991282763729516?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/3053991282763729516/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=3053991282763729516' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/3053991282763729516'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/3053991282763729516'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/02/blog-post_16.html' title='पतनशीला  पोस्ट ........'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-4910992434055335384</id><published>2008-02-08T09:18:00.000+05:30</published><updated>2008-02-08T10:01:51.511+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यंग्य'/><title type='text'>स्‍त्री एक पज़लिंग, अनरेलायबल मिस्‍ट्री है?</title><content type='html'>बिलाग के &lt;a href="http://azdak.blogspot.com/2008/02/blog-post_08.html"&gt;बाबा लोग &lt;/a&gt;और बडका लोग &lt;a href="http://sandoftheeye.blogspot.com"&gt;चोखेर बाली &lt;/a&gt;को समझ नही पा रहे । यू नो वाय ? अबे ,तिरिया चलित्तर को जब भगवान नही समझ सका तो तू तो आदमी है ; गलतियों का पिटारा , बेचारा । औरत को समझने में पूरी ज़िन्दगी इहाँ उँहा झक मारता रह जाता है ।कमबख्त ! समझ नही आता आखिर चाहती क्या है । पाँयचा दो गिरेबाँ पकडती है । देखो शर्त मानी शांतनु ने और उल्लू बना । बाबा लोग को उनसे बडा हमदर्दी है । क्या है कि एक उत्पीडित मेने सेल बानाय का है अबी , इसी टाइम । बहुत हुआ !पत्नी खाना नही बनाती ? ब्लॉगिंग करती है ? फेमिनिस्म का डर दिखाती है ? एकजुट होकर झण्डा उठाती है ? सम्वाद चाहती है ?? मिस्ट्री बनती जा रही है ? तो उत्पीडित पति मिलें ---- &lt;em&gt;&lt;strong&gt;अध्यक्ष ,मेन सेल &lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;। ब्लॉग पर आ रही हैं ,चलो आने दिया । जाने इनके पति क्या खाकर जीते होंगे [ब्लॉगिंग से फुर्सत हो तो खाना बनाएँ ! उँह! ] कविता लिखी , लिखने दी ।हमने वाह वाह ही की । विमर्श करने लगी , हमने कहा लगे रहो अच्छा लिख लेती हो । विवाद में पडना चाहा , सो हमने रोका । माने नही , बुरी-भली सुन के मानीं । पाब्लो फाब्लो पढने लगीं । चलो वह भी कर लेने दिया । अब ई का बला है ?? &lt;strong&gt;ओह मैन ! विमेन विल बी विमेन आल्वेज़ !&lt;/strong&gt; &lt;strong&gt;सैड्ड्ड !&lt;/strong&gt;इतनी आवाज़ उठाकर भी कहती है आवाज़ बुलन्द् करो !&lt;br /&gt;देखो , सीधी बात है ।इतना टाइम नही , सम्वाद फम्वाद , मवाद ,विवाद करने को । शुरु से यही सिखाया गया है - औरत एक मिस्ट्री है , कोई समझ न पाया , ऐसी ही इसकी हिस्ट्री है । इसलिए चाह कर भी इसके पास नही गये कभी डर से । हनुमान जी को याद किया । जब पास आये तो मुकाबला कर लेंगे इस मर्दानगी के अहसास से आये । वह कभी नही बोली ।खुल के बोलती ही नही हमारी तरह ;कैसे समझें । बोलने का कल्चर ही नही मिला ! तो टाइम बर्बाद करने का नही ।&lt;br /&gt;वैसे भी इन्हें कभी संतोष नही होने का ।ये नया शगल कर देखने दो । स्त्रियाँ ही पढें , वे ही लिखें । उनकी दुनिया उन्हें मुबारक।तुम वहाँ मत जाना । जाने क्या चक्रव्यूह रचा है । एक बार कह दिया , हम साथ हैं सार्थक सम्वाद चाहते हैं तो गला पकड लेंगी । करना रोज़ सम्वाद । हम ताली बजाएँगे, तुम गाल बजाना । ओके ।&lt;br /&gt;कबीर ने भी कह दिया है वही जो हम कह रहे हैं &lt;br /&gt;"नारी की झाँई परत अन्धा होत भुजंग "  साँप तक अन्धा हो जाता है हम तो....&lt;br /&gt;वह महाठगिनी है । हमसे पूछो &lt;a href="http://www.askmen.com/dating/doclove/index.html"&gt;।आस्क मेन &lt;/a&gt;।जाना ही है पास तो सचेत जाओ । एजेन्डा साफ हो ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-4910992434055335384?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/4910992434055335384/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=4910992434055335384' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/4910992434055335384'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/4910992434055335384'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/02/blog-post_08.html' title='स्‍त्री एक पज़लिंग, अनरेलायबल मिस्‍ट्री है?'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-157742124837477935</id><published>2008-02-05T10:41:00.000+05:30</published><updated>2008-02-05T11:18:38.373+05:30</updated><title type='text'>ब्लॉगिंग और पाब्लो नेरुदा पढने में कोई फर्क नही है ....</title><content type='html'>शॉपिंग के लिए जाती औरतें ,करवाचौथ का व्रत करती औरतें , सोलह सोमवार का उपास करती औरतें , होली पर गुझियाँ बनाती औरतें , पडोसिन से गपियाती औरतें -- अजीब नही लगतीं । बहुत सामान्य से चित्र हैं । लेकिन व्रत ,रसोई,और शॉपिंग छोड कर ब्लॉगिंग करती या पाब्लो नेरुदा पढती औरतें सामान्य बात नही । यह समाजिक अपेक्षा के प्रतिकूल आचरण है। आपात स्थिति है यह । ब्लॉगिंग और नेरुदा पति ही नही बच्चों के लिए भी रक़ीब हैं । यह डरने की बात है । अनहोनी होने वाली है । सुविधाओं की वाट लगने वाली है । स्त्री क्यो इतना डराती है ? पहले ही समाज  कितना डरता है ?यदि उसने अपनी असंख्य सम्भावनाओं को एक्स्प्लोर कर लिया फिर क्या वो बन्ध कर रहेगी एक परिवार ,पति  प्रेमी से ? फिर क्यों पकवान बना बना तुम्हें पेट के रास्ते रिझाएगी ?उसने आइना ढूंढ लिया तो अनर्थ हो जाएगा । डरो ,डरो ,स्त्री से । उसका डर ही तुम्हे हिंसक बनाएगा । क्योंकि तुम उसे नही बान्ध पाए तो तुम्हे बन्धना होगा ;वह तुमसे ऊंचा उडने लगेगी ।उसे अपनी जगह ,अपना कमरा , अपना आउटलेट मत दो । अपना कुछ मत दो । सम्पत्ति भी नही ,संतति भी नही । एक म्यान में दो तलवारें कैसे भी नही रह पाएँगी । सृष्टि का आधार नष्ट हो जाएगा ।&lt;br /&gt; उसे समझाओं ....ब्लॉगिंग सिर्फ कृष्ण प्रेम की कविताएँ चेपने के लिए है ,रेसिपी लिखने के लिए है ,विमर्श करने के लिए नही । किताबें सिर्फ पढने के लिए हैं ,उनसे ज़िन्दगी नही चलती । इसके लिए किताबी दुनिया और असल दुनिया में अन्तर बढाओ , फासले पटने मत दो । तुम समझते नही हो , दिस इज़ अ सीरियस मैटर ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-157742124837477935?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/157742124837477935/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=157742124837477935' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/157742124837477935'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/157742124837477935'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/02/blog-post_05.html' title='ब्लॉगिंग और पाब्लो नेरुदा पढने में कोई फर्क नही है ....'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-654011165678500130</id><published>2008-02-04T10:40:00.000+05:30</published><updated>2008-02-04T10:57:52.331+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामिका'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='किश्वर नाहिद पाकिस्तानी कवयित्री'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहती हैं औरते'/><title type='text'>घास बस मेरी तरह है...</title><content type='html'>बहुत कुछ अलग है हर स्त्री में । फिर भी अनुभवों का एक अन्धेरा कोना सभी का एक सा है।इसलिए तो सीमाओं के पार भी एक संसार है जो सीमातीत है ।पाकिस्तानी कवयित्री - &lt;strong&gt;किश्वर नाहिद &lt;/strong&gt;की यह कविता बहुत प्रभावित कर गयी । सोचा क्यो न आप लोगो से इसे बाँटा जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घास भी मेरी तरह है-&lt;br /&gt;पैरों तले बिछ कर ही पूरी होती है &lt;br /&gt;इच्छा इसके जीवन की ।&lt;br /&gt;गीली होने पर, क्या होता है इसका अर्थ?&lt;br /&gt;लज्जित होने की जलन ?&lt;br /&gt;या आग वासना की?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घास भी मेरी तरह है-&lt;br /&gt;जैसे ही यह होती है सिर उठाने योग्य&lt;br /&gt;आ पहुँचता है कटाई करने वाला,&lt;br /&gt;उन्मत्त ,बना देने को इसे मुलायम मखमल&lt;br /&gt;और कर देता है इसे चौरस।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह मेहनत करते हो तुम &lt;br /&gt;औरत को भी चौरस करने की ।&lt;br /&gt;न तो खिलने की इच्छा पृथ्वी की,&lt;br /&gt;न ही औरत की ,मरती है कभी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी बात पर ध्यान तो,वह विचार &lt;br /&gt;रास्ता बनाने का ठीक ही था।&lt;br /&gt;जो लोग सह नही पाते हैं बिगाड &lt;br /&gt;किसी परास्त मन का&lt;br /&gt;वे बन जाते हैं पृथ्वी पर एक धब्बा&lt;br /&gt;और तैयार करते हैं रास्ता दमदारों के लिए-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भूसी होते हैं वे &lt;br /&gt;घास नही ।&lt;br /&gt;घास बस मेरी तरह है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुवाद-मोज़ेज़ माइकेल &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहती हैं औरते -सं -अनामिका ,साहित्य उपक्रम ,इतिहास बोध प्रकाशन ,2003&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-654011165678500130?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/654011165678500130/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=654011165678500130' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/654011165678500130'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/654011165678500130'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/02/blog-post.html' title='घास बस मेरी तरह है...'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-2219452444025918038</id><published>2008-01-29T10:00:00.000+05:30</published><updated>2008-01-29T10:54:15.419+05:30</updated><title type='text'>जादा तकलीफ है तो ऑटो में जाया करो ना ....यहाँ तो ऐसे ही होता है</title><content type='html'>वह जितनी जगह छोड रही थी,वो उतनी जगह घेरता जा रहा था । वह सिमट रही थी। वो फैल रहा था ।कुछ नया नही हो रहा था।हमेशा से ऐसा ही चला आ रहा था ।अपनी जगह न छोडने का मतलब था अनचाहे ,बेढंगे ,बेहूदे स्पर्श को झेलना । डटे रहना सही है या सिमटना । खिडकी के पास वाली सीट पर एक हद के बाद सिमटने को जगह ही कहाँ बची थी । उसने झटके से सीट से उठते हुए मन में कुछ गालियाँ बकी और खडी हो गयी । उस आदमी ने  और बाकी औरतों-मर्दों ने उसे विचित्र दृष्टि से देखा मानो कहते हों- बडी सनकी है ,स्टाइल मार रही है, हुँह !!। ये उसकी बेवकूफी थी । इतनी मुश्किल से तो ब्लूलाइन बस में जगह मिलती है , देखो पगली उसे छोड तन कर खडी हो गयी ।अब खाओ आजू- बाजू वालों के धक्के । उसने घूरा ।"क्या मैडम ! अपन को मत घूरो , बस में साला भीड ही इतनी ऐ, तिल धरने की जगह नही ऐ, जादा तकलीफ होती है तो औटो में जाया करो ना ,और वैसे भी अपन को शौक नई है तुम्हारे ऊपर गिरने का...[धीमे से कहा ]वैसे भी इतनी खूबसूरत नही है स्स्सा#@ंं"बस में कुछ घट गया था । शायद किसी का बटुआ मारा गया था , आंटी चिल्ला रही थी ।अफरा-तफरी मची हुई थी, वो तीन लौंडे बस के ठीक पीछे से भीड को कुचलते हुए आगे के दरवाज़े तक पहुँच रहे थे चोर को स्टॉप पर उतरने न देने के लिए। "अबे , पकडो साले को भैंन की .. साले ...कमीन ..साले " वे दबादब गालियाँ दे रहे थे एकाएक जैसे भीड पागल हो गयी थी। महिलाएँ महिलाओं की सीट पर चुप पडी थीं । लौंडे और बाकी आदमी सबको धकियाते , किसी का जूता,किसी का पैर ,किसी का सर कुचलते हुए आगे जा रहे थे । आपात स्थिति थी । कुछ पलों की इस धकम पेल में दम घुटने को आया ।पैर कुचला गया था । दुपट्टा भीड में जाने कहाँ खिंच गया था । आगे से बचने की कोशिश में पीठ पर कन्धे पर  निरंतर थापें पडी थीं । बस रोकी गयी थी । नीचे वो चोर् पिट रहा था और उसकी माँ- बहन एक कर दी गयी थी । अब सब शांत था , लौंडे वापस सवार हुए । बस चल पडी । लौंडे पीछे खडे अपनी मर्दानगी का हुल्लास प्रकट कर रहे थे और सगर्व उसकी ओर देख रहे थे । अधेड पुरुष धूर्त मुस्कान के साथ उनके समर्थन में थे ।' भैय्या तैने सई करी , वाकी खाल उधेर दी साला चो..'अगले स्टॉप पर बस रुकी । उसने निश्चय किया । उतरना आसान नही था । आगे निकलने के लिए जगह आसानी से नही बनाते दोनो ओर की सीटों पर लटकी सवारियाँ। मन कडा किया आंखें बन्द की तीर सी सीधी बाहर । नीचे उतरी .राहत तो थी । दूसरी बस का इंतज़ार करने लगी । पन्द्रह मिनट बीते पर एक बस आ पहुँची ; दरवाज़ों से लटकते शोहदे । वो उतरेंगे । फिर तुम्हें चढाएंगे । फिर यथास्थान आ जाएंगे । हँसती -खिलखिलाती वे पाँचों लडकियाँ उसके देखते देखते समा गयीं । बस के भीतर कहाँ । नही पता । उनके पास कोई समाधान न था । उसकी हिम्मत नही हुई ।पहले सीट छोडी, फिर बस । अब क्या ?एक दिन औटो , दो दिन तीन दिन ।नही । सम्भव नही । उसे याद आया । उस दिन औटो वाला  50 रु में माना था । &lt;br /&gt;उसने कहा 'मीटर से तो 35 ही आते है' &lt;br /&gt;'तो मीटर वाला ढूंढ लो '&lt;br /&gt;मजबूरी थी । आस पास कुछ और नही था । देर अलग हो रही थी।&lt;br /&gt;10 मीटर चल कर पान के खोके पर लाकर रोक दिया । &lt;br /&gt;'क्या हुआ भैय्या'&lt;br /&gt;'...'&lt;br /&gt;'क्या हुआ ?'&lt;br /&gt;'..'&lt;br /&gt;वह चला गया । पान मसाला लिया । पैकेट खोला ,बडे अन्दाज़ से खडा होकर मुँह में भरा । पानवाडी से बतियाने लगा । उसका गुस्सा पार हो चुका था । वह उतरी और चिल्लाई ।&lt;br /&gt;'ये क्या बकवास है ; पागल दिखती हूँ जो यहाँ लाकर खडा कर दिया है ? चलता क्यो नही है '&lt;br /&gt;बिना विचलित हुए उसने कहा' अरे मैडम , अभी तो गैस भी भ्ररवानी है आगे वाले पम्प से , आप बैठो आराम से ज़रा '&lt;br /&gt;वह उबल पडी 'बदतमीज़ आदमी ! पहले नही बोल सकता था गैस भरवानी है पान खाना है,पेशाब करना है। आराम से बैठो ?? आराम से बैठ्ने का टाइम होता तो ऑटो लेती मैं ?'मन हुआ एक झापड धर दे मुँह पर । &lt;br /&gt;वह अविचलित । बुडबुडा रहा था । उसे समझ आ गया था । यहाँ बेकार है गुस्सा करना भी ।नम्बर नोट किया । कम्पलेंट करने को ।&lt;br /&gt;वापस चल पडी , जहाँ से चली थी ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-2219452444025918038?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/2219452444025918038/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=2219452444025918038' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/2219452444025918038'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/2219452444025918038'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/01/blog-post_29.html' title='जादा तकलीफ है तो ऑटो में जाया करो ना ....यहाँ तो ऐसे ही होता है'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-1970389215537295341</id><published>2008-01-16T10:46:00.000+05:30</published><updated>2008-01-16T12:44:42.505+05:30</updated><title type='text'>..बराबरी मत माँगो वर्ना सम्मान नही मिलेगा .</title><content type='html'>बात ज़रा कठिन अन्दाज़ से शुरु कर रही हूँ पर है उतनी ही आसान । &lt;em&gt;टॉमस एस कुह्न &lt;/em&gt;ने अपनी किताब &lt;strong&gt;वैज्ञानिक क्रांतियों की संरचना&lt;/strong&gt; में प्रतिमान -परिवर्तन का नियम देते हुए कहा - &lt;em&gt;प्रतिमान परिवर्तन का तरीका यह नही है कि विरोधियों को कनविंस किया जाएगा बल्कि यह है कि विरोधी अंत में मारे जाते हैं &lt;/em&gt;। &lt;br /&gt;बेशक सचमुच में नही । मारे जाने का अर्थ प्रतीकात्मक है :)। &lt;a href="http://kakesh.com/?p=249#comment-1403"&gt;काकेश के ब्लॉग &lt;/a&gt;पर जो विमर्श  हुआ  &lt;a href="http://maeriawaaj.blogspot.com/2008/01/blog-post_16.html"&gt;बिना लाग लपेट के कहा गया &lt;/a&gt;और &lt;a href="http://tippanikar.blogspot.com/2008/01/blog-post_09.html"&gt;टिप्पणियाँ &lt;/a&gt;भी अलग से दर्ज की गयीं । घुघुती जी ने करारे और कडे जवाब दिए । बहुत से मेरे मन की बातें कह दीं । &lt;br /&gt;महिलाओ से सम्बन्धित बातें उठाने और विमर्श करने पर फेमिनिस्ट तो करार दे ही दिया गया है पर इतना समझ आ गया है कि मेरे ,घुघुती जी ,नीलिमा, रंजना ,रचना ,स्वप्नदर्शी व अन्यों को केवल उस पल का इंतज़ार करना है जब स्त्री को देखने के नज़रियों [स्त्री के खुद को देखने और दूसरो की नज़र में भी]में परिवर्तन आने से विरोधियों का नाश हो जाएगा क्योंकि काकेश के यहाँ टिप्पणियाँ दिखा रही हैं कि वे कनविंस होने की स्थिति में तो बिलकुल नही हैं ।&lt;br /&gt;कमाल कर दिया है &lt;strong&gt;आदम &lt;/strong&gt;जी ने तो -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;इन बैवकुफ समाज वादी औरतो को भी नहीं पता ये समाज का कितना अहित कर रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक औरत अपने स्त्री होने का फायदा उठा कर पुरूष से ज्यदा माल बेचती है तब उसे याद नही आती बराबरी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई बस में सफर कर रहे हो या ट्रैन के टिकट की लाईन हो क्यों इन्हें बराबर नही रखा जाता वास्तव में प्रकृति ने हम सभी को अलग अलग रोल दिये हैं और हमें ये करने होंगे। क्यों बराबर धरती नहीं है कही पहाड तो कही तलाब, क्यों बराबर ऋतु नही हैं। आखिर पुरूष तो बराबरी कर 9 मास तक बच्चे को पेट में नहीं रख सकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर स्त्रियाँ सम्मान चाहती है तो मेरी राय में रात को 2 बजे शराब पीकर समुद्र पर धुमना सम्मान नहीं दिला सकता इस दौड में कई आज कल धुम्रपान मदिरा पान कर रही है कल क्या वो बराबर होकर पुरूष की तरह बलात्कार करना पसंद करेंगी &lt;/blockquote&gt;।&lt;br /&gt;----&lt;br /&gt;इस समझ का कोई जवाब दिया जा सकता है ? इस तरह की सोच का केवल संहार किया जा सकता है ।&lt;br /&gt;इन्हें कोई बराबरी , खासतौर से स्त्री-पुरुष की बराबरी का मतलब समझा सकता है ? &lt;br /&gt;मैने बार बार कहा है कि बाज़ारवाद ने पितृसत्ता के औजारों और शोषण के तरीकों को और भी महीन और बारीक बनाया है । कुछ ऐसा कि शोषित को खुद पता नही चलता कि उसका शोषण हो रहा है ।वह उसे आत्मसात कर लेता है ।सो , जब औटो एक्स्पो में कारों के साथ खडी हॉट माडलों की खटाखट तस्वीरें पुरुष भीड उतार रही थी , उस समय वह मॉडल खुद को गौरवान्वित महसूस कर रही थी ।क्यों ? स्त्री के सेक्सी और हॉट होने का पैमाना कौन तय करता है  ? कौन तय करता है कि उसका मुख्य काम पुरुष की दृष्टि में सुन्दर और उपयोगी साबित होना है ? &lt;br /&gt;और बराबरी की बात ? वह भी तो पुरुष का ही मान दण्ड है । कैसा धोखा है देखिये । अच्छा , शोर मचा रही हैं बेवकूफ समाजवादी औरतें ,चलो , सोचते हैं ,पर पहले हमारी बराबरी हर फील्ड में कर के दिखाओ । तब हम तुम्हे स्वतंत्रता दे देंगे ।मान लेंगे कि तुम स्वतंत्रता के काबिल हो ।चक दे इंडिया इसलिए बार बार याद आती है । लडकियों की टीम को विश्व कप हॉकी में भाग लेने से पहले अपनी योग्यता साबित करने के लिए पुरुषों की टीम से लडने के लिए कहा जाता है । पुरुष आइना बना खडा है हर ओर । उसी में झाँक कर अपना अस्तित्व साबित करना है । क्यों ?&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आदम &lt;/strong&gt;ने साफ कहा ,&lt;em&gt; बराबरी मत माँगो वर्ना सम्मान नही मिलेगा &lt;/em&gt;। यह चेतावनी है । यह अन्डरटोन है। और हम अब पढ सकते है अनलिखा, सुन सकते हैं अनलिखा , देख सकते हैं छिपा हुआ । यही तो डर है आदम को भी आदमी को भी पितृसत्ता को भी ।  &lt;br /&gt;मैने &lt;&lt;a href="http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/09/blog-post_07.html"&gt;पहले भी लिखा था&lt;/a&gt; कि बराबरी का मतलब यह नही कि हम एक दूसरे के प्रति असम्वेदन शील हो जाएँ इस तरह कि  बस ,रेल,मेट्रो में किसी महिला को असुविधाजनक स्थिति में खडे देख बैठे बैठे यह सोचें कि -हुँह , बराबरी चाहिये थी न ,लो अब खडी रहो और हो जाओ बराबर , हमने तो कहा था कि घर बैठो आराम से। रेप होते चुपचाप देखेंगे या सहयोग देंगे क्योंकि उकसाया तो तुम्ही ने था न ....&lt;br /&gt;भई हमारी बराबरी करने निकलोगी तो सडक पर छेडेंगे,&lt;br /&gt;ऑफिस में फब्तियाँ कसेंगे, &lt;br /&gt;घर में ताने देंगे, &lt;br /&gt;मीडिया मे चरित्र पर लांछन लगायेंगे ,&lt;br /&gt;पुरुष मित्रों को एकत्र कर जीना मुहाल कर देंगे,&lt;br /&gt;फिर भी न मानी तो रेप करेंगे ,&lt;br /&gt; तब तक जब तक कि खुद ही हमारे पहलू में आ कर न गिर जाओं ......और &lt;br /&gt;तब भी बख्शा नही जाएगा , आखिर कैसे बराबरी करने निकलीं । घर में सम्मानित माँ ,बेटी, पत्नी बहन बन कर रहने में क्या बुराई थी ? पर तुम खुद ही चाहती हो कि पुरुष तुम्हें देखें, तुम्हारे पीछे पडें ....तिरिया चरित्र ... भगवान भी नही समझ सका .... पहेली बना देंगे तुम्हे.. अबूझ ... ताकि तुम्हे समझने का दुस्साहस ही न करे कोई ...स्त्रियां सम्मान चाहती हैं तो परिवार के बीच सुरक्षित रहें ..... और वेश्यालयों में जाने वाले ? &lt;br /&gt;पिता ,भाई, बेटे ,पति को अब भी यह मानने में संकोच है कि स्त्री परिवार संरचना के भीतर भी उतनी ही प्रताडित है जितनी कि परिवार संरचना से बाहर । अविवाहित स्त्री को भी नही बख्शते ,विधवा को भी नही, वेश्यालयो को भी नही और पत्नियों को भी नही ।&lt;br /&gt;इसलिए बदलते प्रतिमानों के इस युग में स्त्री-विरोधी समझाने से नही मानने वाले , वे मारे जाने वाले हैं । चाहे इसमें 100 साल और लग जाएँ ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-1970389215537295341?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/1970389215537295341/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=1970389215537295341' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/1970389215537295341'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/1970389215537295341'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/01/blog-post_16.html' title='..बराबरी मत माँगो वर्ना सम्मान नही मिलेगा .'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-5618374296921769945</id><published>2008-01-08T19:14:00.000+05:30</published><updated>2008-01-08T19:16:36.022+05:30</updated><title type='text'>बूझो तो जानें ..</title><content type='html'>क्या आप बता सकते हैं कि यह क्या है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/R4N-aoFYwkI/AAAAAAAAAKA/x3qQB1y-beE/s1600-h/DSCN1373.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/R4N-aoFYwkI/AAAAAAAAAKA/x3qQB1y-beE/s400/DSCN1373.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5153101394543690306" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-5618374296921769945?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/5618374296921769945/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=5618374296921769945' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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/&gt;मैं बंगाली भाषा नही जानता.इसलिए मैं हिन्दी में पत्र लिख रहा हूँ. इस विवशता को क्षमा करने की कृपा करें.&lt;br /&gt;मैं हिन्दी का कवि,उपन्यासकार,नाटककार हूँ,रायबरेली का मूलनिवासी .रायबरेली में कहीं भी आजतक एक भी,अपवाद के रूप में भी,साम्प्रदायिक दंगे फसाद नही हुए हैं न कभी हों.1984 में एक भी सिख नही मारा गया.हिन्दू-मुस्लिम-सिख यहां सभी एक होकर रहते हैं.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मेरा घर काफी बडा बना हुआ है,एक कोठी बंगले की तरह&lt;/strong&gt;.मैं आपको अपने घर में स्थायी सदस्य के रूप में आने का निमंत्रण देता हूँ. मेरे घर में आप आजीवन रहें.जैसे मैं घर का मालिक, वैसे आप भी मेरे घर की मालिक.&lt;br /&gt;इस्लाम में कोई भी दूसरे की सज़ा अपने ऊपर ले सकता है.जो सज़ा अपको कठमुल्लों ने दी है वह मुझे दे दें.&lt;strong&gt;आपको माफ कर &lt;/strong&gt;दें. &lt;strong&gt;मैं आपके लिए &lt;/strong&gt;मौत का फतवा झेलने को तैयार हूँ.कठमुल्ले मेरी जान ले लें और &lt;strong&gt;आपको क्षमा कर दें&lt;/strong&gt;. मैं आपको अपना मित्र मानता हूँ. कृपया मेरे घर शीघ्र पधारें. सद्भावना सहित ...&lt;br /&gt;आचार्य रजनीकांत ,रायबरेली &lt;br /&gt; यह पत्र मैने जस का तस छाप दिया है । जहाँ शब्दों को बोल्ड किया गया है वहाँ ध्यान दें ।घर छोटा भी हो तो क्या ? मित्र मानते हैं तो अपनी गरीबी में भी उसका साथ दे सकते हैं । &lt;strong&gt;माफ करें &lt;/strong&gt;और &lt;strong&gt;क्षमा करें&lt;/strong&gt;जैसी बाते  ये सिद्ध कर रहीं हैं कि  महाशय शायद तस्लीमा को समझे ही नही । कठमुल्लों से क्षमा की अपील ? क्या कहना चाह्ते हैं ये ? ये प्रेम-निमंत्रण है क्या ? महाशय खुद को हिन्दी के कवि लेखक वगैरह कह रहे  हैं ,क्या यही है उनकी समझ ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-7240502820949973778?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/7240502820949973778/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=7240502820949973778' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/7240502820949973778'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/7240502820949973778'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2008/01/blog-post.html' title='तस्लीमा के नाम एक पाती यह भी ....'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-1092754531715230636</id><published>2007-12-31T18:54:00.000+05:30</published><updated>2007-12-31T19:55:38.501+05:30</updated><title type='text'>ब्लॉग में क्या रखा है ?</title><content type='html'>साल खत्म होने को है और सब बधाइयाँ भेज रहे हैं । ब्लॉगिंग का यह साल कैसा रहा इस पर निश्चित ही किसी हम जैसे ठाले बैठे ने ज़रूर विचार किया होगा  हम सुबह से आज की तिथि में दर्ज हो जाने भर के लिए एक पोस्ट डालने के इंतज़ार में थे।सुअवसर अब जाकर मिला है । सुबह से कडक धूप में खेलते बच्चों और मटर छीलती,स्वेटर बुनती खुश मम्मियाँ देख देख कर यह सोच रहे हैं मरी पोस्ट आज न डली तो क्या गज़ब हो जाएगा ?कई दिन से नही लिखा गया कुछ । मनीषा जी ने कुछ सवाल भेजे थे जिनमें पहला था कि -आपने ब्लॉगिंग कब और कैसे शुरु की ? फिलहाल उन्ही का उत्तर दे रही थी और सोच रही थी कि एक सवाल अपने तरफ से भी लिख दूँ कि- आपने ब्लॉगिंग कब और क्यों छोडी ?कभी-कभी बहुत दिन बीत जाते हैं कुछ लिखते नही बनता और उस र्रिदम   के टूटते ही उत्साह क्षीण होने लगता है । लगता है -बेकार का काम है , टाइम खोटी होता है , इतने हम मटर् छील लेंगे ,बथुआ तोड लेंगे ,साग छाँट लेंगे ,राजमा तडक लेंगे ,इसी बहाने धूप सेक लेंगे ।कुछ नही होता । पर एक हुडक बनी ही रहती है कि ब्लॉग झाँक आयें ? कोई टिप्पणी नयी तो नही आयी ? किसी ने कुछ धाँसू लिखा? कोई विवाद तो नही हुआ ? हमारी विशेषज्ञ टिप्पणियों के बिना कोई सफल मुद्दा निबटा तो नही दिया गया ?नीचे ,बाहर ,हर जगह गाना-बजाना हो रहा है और हम परेशान आत्माओं की तरह ब्लॉग लिख रहे हैं ।सुबह से सोच रहे है -क्या बकवास काम है !पर यहाँ आज की तारीख मे दर्ज होना ज़रूरी है कि हमने साल भर लिखा और सक्रिय लेखक हैं ।दिल्ली का आज हाल बुरा है \कल राम सेतु वाली रैली ने अव्यवस्था फैलाई और आज नये साल के शौकीनों ने ट्रैफिक जाम किया हुआ हैऔर हम हारकर पोस्ट डाल रहे हैं । पतिदेव ने जवानी के दिनों की पहली पहली मूँछें उडाकर अभी अभी आयें हैं, नये साल में कुछ नया तो होना चाहिये ।यहाँ क्या नया होने वाला है?आज अज़दक की तरह इसे पतनशील पोस्ट कहने का मन हो रहा है ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-1092754531715230636?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/1092754531715230636/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=1092754531715230636' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/1092754531715230636'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/1092754531715230636'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/12/blog-post_31.html' title='ब्लॉग में क्या रखा है ?'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-3340664353320255785</id><published>2007-12-26T09:53:00.000+05:30</published><updated>2007-12-26T10:06:08.118+05:30</updated><title type='text'>जलते हुए बगदाद की कहानी, एक समानांतर इतिहास  |</title><content type='html'>हम अक्सर ब्लॉग के माध्यम को लेकर बडी बडी बातें करते हैं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अस्मिता ,पहचान , मुखौटे ,नेक्सस और पता नही क्या क्या ? लेकिन ब्लॉगिंग को कितने लोग गम्भीर माध्यम के रूप में ले रहे हैं ? क्या वाकई हमने इस माध्यम की शक्ति की पहचान कर ली है ? अभी हिन्दी ब्लॉगर्स में परिपक्वता बहुत दूर की स्थिति लग रही है ,जहाँ हम अपने छोटे हितों और दोस्तियों से ऊपर उठकर वाकई गम्भीर लेखन और अभिव्यक्ति कर पाएंगे । हमारे पास अपना क्या है जो हम अपने ब्लॉग पर दे रहे हैं जो विशिष्ट है और जैसा किसी और के पास नही ? ब्लॉगर्स के सामने अभी हिट होने और टिप्पणी पाने की समस्या ही ज़्यादा गम्भीर है ।&lt;br /&gt;लेकिन  बगदाद की एक 27 वर्षीया चिट्ठाकार के पास युद्धभूमि के बीच बनते हुए ताज़े अनुभवों की ऐसी थाती है जो एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बन चुकी है । रिवर बेन्ड के छ्द्मनाम से लिखने वाली यह चिट्ठाकार अपने ब्लॉग &lt;a href="http://riverbendblog.blogspot.com/"&gt;बगदाद बर्निंग  &lt;/a&gt;में बहुत से सवाल उठाती है । वह दर्ज करती है कि कैसा था युद्ध से पहले का बगदाद और सरकार की नीतियों को प्रश्न चिह्नित करती है । &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Riverbend_(blogger)"&gt;अपने बगदाद छोडने के प्रकरण पर वह तफसील से लिखती है ।&lt;/a&gt;हैरानी होती है तो केवल यह कि युद्ध की आग में जलते हुए अपने देश की यह लडकी कैसे बिन्दास कहानी अपनी तरह से कहती है । स्त्री की अभिव्यक्ति , ब्लोग के माध्यम की ताकत और प्रामाणिक अनुभवों ने ही  निर्देशक कीर्ति जैन को आकर्षित किया कि वे इस ब्लॉग का नाट्य रूपांतर कर एन.एस.डी में प्रदर्शित करें । &lt;br /&gt;रिवरबेंड ने बेस्ट मिडल ईस्ट और अफ्रीका का ब्लॉगी अवार्ड भी पाया है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास के समापन की घोषणा जब हो चुकी ऐसे में यह ब्लॉग और ऐसे अन्य ब्ळोग  एक समानांतर इतिहास  रच रहे हैं । यह वैकल्पिक इतिहास है उनका जिन्हे इतिहास की प्रक्रिया में अनदेखा किया गया है क्योंकि इतिहास वस्तुत: लिखने की प्रक्रिया में ही बनता है ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-3340664353320255785?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/3340664353320255785/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=3340664353320255785' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/3340664353320255785'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/3340664353320255785'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/12/blog-post_26.html' title='जलते हुए बगदाद की कहानी, एक समानांतर इतिहास  |'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-4384788174360834859</id><published>2007-12-20T11:08:00.000+05:30</published><updated>2007-12-20T11:38:55.831+05:30</updated><title type='text'>अध्यापक हमारे देश में मज़दूर है ....</title><content type='html'>जब कहानी की बात होती है अंतोन चेखव की कहानियों की सहजता, क्षिप्रता ,और गहराई याद हो आती है । यह वो कहानी है जहाँ कहानी अपने विकास के चरम पर पहुँच जाती है ।बहुत विचित्र लगता है कि हिन्दी उपन्यास ने जो मकाम 30 साल में हासिल किया उसे हिन्दी कहानी ने एक दशक में पा लिया । खैर , अंतोन चेखव की याद आज यूँ आयी कि शिक्षक की स्थिति पर विचार करते हुए उन्होने कुछ महत्वपूर्ण बातें कह दीं थीं जो इस चाण्क्य भूमि में बडी प्रासंगिक लगीं । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अध्यापक को तो कलाकार होना चाहिए,अपने काम से उसे गहरा अनुराग होना चाहिए ,और हमारे देश में तो वह मज़दूर ही है.... वह भूखा है, दबा हुआ है,दो जून की रोटी खाने के डर से भयभीत है,अल्पशिक्षित व्यक्ति है।.....जबकि उसे गाँव में सबसे प्रमुख व्यक्ति होना चाहिए,ताकि वह सब सवालो का जवाब दे सके, ताकि किसान उसे आदर्णीय व्यक्ति समझें, कोई भी उस पर चीखने -चिल्लाने की जुर्रत न करे ...उसका अपमान न कर सके, जैसा कि हमारे यहाँ आएदिन सभी करते हैं- थाने दार ,दरोगा,दुकानदार,पादरी,स्कूल का प्रिंसिपल और वह बाबू जो स्कूलों का इंस्पेक्टर कहलाता हैपर जिसे शिक्षा में सुधार की नही बल्कि इस बात की हीचिंता होती है कि आदेशों के पालन में कोई कमी न रह जाए । आखिर यह बात बेतुकी है कि जिसे जनता को शिक्षित करने का,सभ्य बनाने का काम सौंपा गया हो उसे दो कौडियाँ मिलें !"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत कुछ यही हालात हमारे देश में शिक्षा और अध्यापक के भी हैं । पब्लिक स्कूलों और बडी संख्या में महिला अध्यापकों को छोड दिया जाए तो सरकारी स्कूलों और नुक्कड के छुटभैय्ये स्कूलों की बहुत सी अध्यापिकाएँ इसी तरह की ज़िल्लत और शर्मिन्दगी उठाती हैं । खुद स्कूलों में काम करके देख चुकी हूँ । बहुतों के अनुभव सुन चुकी हूँ । प्रिंसिपलों और स्कूल के बाबू और यहाँ तक कि चपरासी  भी उससे कई गुना हैसियत रखते हैं । सम्पन्न परिवारों की स्त्रियों के लिए यह काम पॉकेट मनी और बच्चॉं को उसी प्रतिष्ठत स्कूल में मुफ्त पढा लेने का सवाल है ।वहीं पुरुषों के लिए यह घर चलाने का सवाल होता है ।एक स्कूल मैनेजमेंट के एक सदस्य को कहते सुना था - 'कितने टीचर चाहियें? अभी ट्रक भर कर मंगवा सकता हूँ । और वह भी 1500 रु. में । यह मेरे लिए कोई समस्या नही । ' हैरानी न हों लेकिन यह सच है । समस्या बहुत जटिल है । कई मुह वाली ।जिसके कई पहलू हैं । एक पोस्ट में समे पाना सम्भव नही ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-4384788174360834859?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/4384788174360834859/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=4384788174360834859' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/4384788174360834859'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/4384788174360834859'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/12/blog-post_20.html' title='अध्यापक हमारे देश में मज़दूर है ....'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-9125510256248570373</id><published>2007-12-19T10:54:00.000+05:30</published><updated>2007-12-19T11:31:42.546+05:30</updated><title type='text'>सेल.सेल सेल ..लूटो लूटो लूटो....उर्फ एक बकवास पोस्ट</title><content type='html'>अपटू 50% पढ्ते ही क्या आपका दिल मचला है कभी ? हमारा तो डोलता है जी । बडे बडे ब्रांड्स पर जब 2000 का कपडा 1000 में और 800 की जुत्ती 400 में मिलती है तो सबका मन डोलता है । ये ब्रांडस का चक्कर क्या है समझ नही आता ।जब कुर्ते के साइद कट से &lt;strong&gt;डब्ल्यू&lt;/strong&gt; का लाल तमगा झाँकता है या कमीज़ की जेब के कोने में &lt;strong&gt;एरो &lt;/strong&gt;या स्वेटर के सीने पर &lt;strong&gt;मॉंटे कार्लो &lt;/strong&gt;धडकता है तो क्या कुछ अलग लगता है ? अगर लगता है तो क्यों ? कीमत की वजह से ?माने ब्रांड का मतलब है ऊंची कीमत ।खास । विशिष्ट । जो सब जैसा नही । कुछ सुघड लोग वैसा ही माल गैर ब्रांड दूकानों से आधी कीमत पर लाते हैं और हमें उनसे सबक लेने को दिल होता है ।पर सच कहें तो मोंटे कार्लों से कहीं बेहतर रेहडी पर से 150-200 रुपए का स्वेटर खरीदना जेब को भी माफिक पडता है ।ब्रांड के एक स्वेटर की कीमत में चार-पाँच आ जाते हैं । आप इसे चीपनेस भी कह सकते हो, चीप चीज़ें खरीदना ।पर मॉल के भीतर चकाचक दूकान में 1000 का पत्ता देते जी काँप उठता है ।एक बार लाल बत्ती पर अगर्बत्ती को बेचने वाला बहुत रिरियाया तो हमने 20 रु देकर खरीद ली । औटो वाला बोला -मत दो जी ये ऐसे ही मूर्ख बानाते हैं । तब सोचा कि मॉल के भीतर बडे ब्रान्ड के शोरूम में खडे हो कर अगर हम यह नही सोचते कि यह बेवकूफ बन रहा है तो अगर्बत्ती बेचने के लिए ट्रैफिक सिग्नलों पर दौड- धूप करते आदमी से बेवकूफ बनने से क्यो डरते हैं जो अकेला किसी की रोटी नही छीन रहा ,न किसी का हक मार रहा है,न चकाचौन्ध दिखा रहा है , जो ज़मीनों के बडे -बडे सौदे करते हुए झोपडियों को नही तुडवा रहा ।जो निरीह शायद उस 5-10 रुपए के फायदे में उस दिन अच्छा खाना खा -खिला सकेगा अपने परिवार को ।&lt;br /&gt;खैर यह अवांतर कथा है , मुख्य प्रसंग है लूटो की मानसिकता में बेवकूफ बनना । ऐसा कई बार हुआ कि जो पसन्द आया वह सेल में नही था ,फ्रेश अर्राइवल था ।या जो पसन्द आया उस पर 15% ही छूट थी बाकि पर 50 या 70।&lt;br /&gt;जो भी हो पर सेल हर आम को खास बनने का ,विशिष्ट होने का मौका देती है । सेल का चरित्र  जनहितवादी होता है।जो यूँ न खरीदे &lt;strong&gt;सेल&lt;/strong&gt; पढकर ज़रूर मुँह की खाता है सेल में दरबारे खास दरबारे आम के लिए खुल जाते हैं ।यह अवसरों की समानता का अच्छा उदाहरण् है । सेल में भी जो खरीदारी न कर सके ,ब्रान्ड न ले सके वह इस जगत में निश्चय ही झख मार रहा है ।दर असल सवाल मूर्ख बनने न बनने का नही है । बल्कि किससे मूर्ख बनें का है । यह चॉयस क सवाल है । क्योंकि मूर्ख बने बिना अब गुज़ारा नही । आप किससे मूर्ख बनकर आनन्दित होना चाहते हैं ?फटीचर से या करोडपति से ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-9125510256248570373?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/9125510256248570373/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=9125510256248570373' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/9125510256248570373'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/9125510256248570373'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/12/blog-post_19.html' title='सेल.सेल सेल ..लूटो लूटो लूटो....उर्फ एक बकवास पोस्ट'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-4053230524171069754</id><published>2007-12-17T08:31:00.000+05:30</published><updated>2007-12-17T09:01:23.057+05:30</updated><title type='text'>आप कितने खाली, बेकार,आवारा, बेचैन और दीवाने हैं..?</title><content type='html'>आप कितने खाली, बेकार,आवारा, बेचैन और दीवाने हैं..? वक्ट काटना आपके लिए एक बडा प्रश्न है ?&lt;br /&gt;तारे गिन गिन कर रात गुज़ारने वाला मुहावरा सुना ही होगा ? क्या ऐसी नौबत आई है आपकी ज़िन्दगी में कि कुछ करणीय न बचा हो और आपको सही सलामत पायजामा फाड कर फिर से सिलना पडा हो या घर आंगन में ज़ूँ-ज़ूँ करती मक्खियाँ मारनी ,उडानी पडी हों ?या फिर क्राइम रिपोर्ट देती क्रिमिनल looks वाली या वाले प्रेज़ेंटर को देखना पडा हो ? या वक्त का गला घोंटने के लिए कुचक्री सीरियल देखने पडे हों? &lt;br /&gt; अगर आप वाकई इतने खाली, वेले टाएप इनसान हो तो आपके लिए टाइम किल्लिंग का एक नया आइडिया इन दिनों टीवी पर आ रहा है जो केवल टाइम ही नही धन की भी हत्या करेगा और यह भी साबित कर देगा कि इस दुनिया में सबसे ज़्यादा खाली,बेकार,आवारा,पागल,दीवाना ....कौन है ? सबसे पहले 50 रुपए का &lt;a href="http://www.colgate.co.in/app/Colgate/IN/OralCare/ToothPastes/ColgateMaxFreshGel/HomePage.cvsp"&gt;कोलगेट मैक्स फ्रेश &lt;/a&gt;लें और फिर उसके ट्रांसपेरेंट ट्यूब में से यह गिनें कि कितने कूलिंग क्रिस्टल्स हैं .... इनाम क्या है नही सुन सके क्योंकि यह &lt;a href="http://alokpuranik.com"&gt;धाँसू च फाँसू &lt;/a&gt;[आलोक जी की भाषा में] आइडिया सुनने के बाद इन कानों मे कुछ और सुनने की शक्ति न बची । ज़ाहिर है कि ट्यूब के अन्दर से ही क्रिस्टल्स नही गिने जा सकते भले ही वह पारदर्शी ट्यूब हो [एक भी गिनती गलत तो इनाम नही] तो गिनने वाला पहले बडी सावधानी से ट्यूब खाली करेगा और फिर ...... वैसे मेरी चिंता यह है कि पेस्ट को वापिस तो ट्यूब मॆं डाला नही जा सकता [वैसे एक ट्रिक मै ऐसा जानती हूँ] तो क्या निकाला गया पेस्ट किसी कटोरी, डब्बे इत्यादि में रखा जाएगा ? जो भी हो,, टी वी और बाज़ार ने समझ लिया है कि उसके सामने बैठा व्यक्ति निठल्लों की प्रजाति का है जिससे कुछ भी अगडम बगडम अपेक्षा की जा सकती है ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-4053230524171069754?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/4053230524171069754/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=4053230524171069754' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/4053230524171069754'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/4053230524171069754'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/12/blog-post_17.html' title='आप कितने खाली, बेकार,आवारा, बेचैन और दीवाने हैं..?'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-7916037454867988099</id><published>2007-12-14T08:18:00.000+05:30</published><updated>2007-12-14T10:35:43.689+05:30</updated><title type='text'>वे दिन,चाँद का टेढा मुँह और मस्ती बचपन की....</title><content type='html'>कभी दिन थे ... गर्मियों के मौसम में ,जब मकान एक मंज़िल से ऊपर नही थे ,छतों पर सोया करते थे चारपाइयाँ बिछा कर और नीन्द आने तक चाँद को घूरते रहते थे कल्पना करते हुए कि उसका टेढा मुँह कैसा लगता होगा वहाँ पहुँचने वाले अंतरिक्ष यात्रियों को ।&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/R2HxTNq-ghI/AAAAAAAAAJo/CrZJvzTluKE/s1600-h/space.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/R2HxTNq-ghI/AAAAAAAAAJo/CrZJvzTluKE/s400/space.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5143657561823543826" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हवा की लहर चलती थी तो चेहरों पर गर्मी से खिंचा तनाव पुँछ जाता था ।बच्चे थे । नीन्द से फासला रखते थे ।जब तक कि वह पस्त न कर दे । ऊपर आँख उठाओ तो काला रहस्यमय अनंत संसार पलकें झपकाने नही देता था – क्या पता अन्धेरे में हमारे जगते-जगते तैयार हो रहा हो कोई कृष्ण छिद्र ।ब्लैक होल । भौतिकी की कक्षा में पढा हुआ सब दिमाग में कौतूहल पैदा करता था । कहीं कोई तारा गिन रहा होगा अपनी अंतिम साँसें । नक्षत्र दिशाएँ बदल रहे होंगे । खत्म होता विशाल तारा ,सूर्य से भी कई गुना बडा , जब खाली करेगा अपनी जगह अंतरिक्ष में तो उस कालिमा में अनायास ही खिंच जाएँगे आस पास के सभी पिण्ड और धीरे धीरे बहुत कुछ जब तक कि समाने को कुछ न बचे । सप्तर्षि ढूंढते थे कभी और खुश होते थे । कभी कोई हवाई जहाज़ लाल बत्तियाँ टिमकाता गुज़रता था कछुए सा । हम सोचते थे कहाँ जाता होगा ? किन्हे ले जाता होगा ? क्या उन्हें हम दिखते होंगे ?क्या हम जहाज़ में बैठ कर अपना घर पहचान पाँएंगे ?&lt;br /&gt; दिन भर के रोटी-पानी की दौड-धूप से हारे माता-पिता ज्यूँ ही बिस्तर पर लेटते ,निन्दाई बेहोशी उन्हे घेर लेती थी ।टेबल फैन के आगे लेटने के लिए बच्चों में दबी अवाज़ में हुई लडाई या घमासान वे नही देख पाते थे । सुन पाते थे तो एक झिडकी ज़ोर से आ गिरती थी और ताकतवाला ,रुबाब वाला बच्चा बाज़ी मार लेता था । लातें चलती रहती थीं इस चारपाई से उस चारपाई । हम छुटकों को एक ही चारपाई पर साथ में सुलाए जाने का बडा कष्ट था ।चारपाइयाँ कम थीं । रात भर हममें धींगा-मुश्ती होती ।कभी अचानक नन्हीं बूंदे पडने लगतीं तो सोते हुए लोग हडबडा कर ,चारपाइयाँ,गद्दे ,चादरें उठा कर भागते ।  सूरज बडी जल्दी में रहता था उन दिनों। इधर अभी  नीन्द आना शुरु होती और उधर वे खुले आकाश के नीचे सोते बेसुधे बच्चों पर किरणों के कोडे बरसाना शुरु कर देते ।रात भर लडे हम छुटकों को कोडों की  यह मार भी बेअसर थी । माता कब नीचे जाकर रसोई में जुटी पिता कब बाज़ार से दूध ,भाजी-तरकारी ले आए कभी पता नही लगा । हमें अभी बहुत काम था । दिन भर खेलना था ,लडना था, कूद-फान्द करनी थी ,पेन-पेंसिल ,कॉपी,बिस्तर और फ्रॉक-रूमाल  के झगडे सुलटाने  थे । होमवर्क भी करना था । सो  देर तक सो कर इन कामों के लिए ऊर्जा का संचय करते थे । &lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/R2HxTdq-gjI/AAAAAAAAAJ4/TmCE1qAWa9o/s1600-h/star.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/R2HxTdq-gjI/AAAAAAAAAJ4/TmCE1qAWa9o/s400/star.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5143657566118511154" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;सोचती हूँ तीस साल बाद हमारी संतानें “वे दिन ”किस तरह याद करेंगी ! खैर फिलहाल तो न छत नसीब है[जिन्हे नसीब है वे मच्छरों से आतंकित हैं] न आंगन नसीब है न ही वह निश्चिंतता । पर आज भी मन हो आता है खुले काले चमकते तारों भरे रहस्यमय आकाश के नीचे लेटे रहें ।पहाडों पर पहुँच कर यह सम्मोहन और भी बढ जाता है ,जब आकाश में तारे ज़मीन पर किसी बच्चे के हाथ से बिखर गये सितारों की तरह लगते है जिन्हे वह स्कूल में दिया या राखी सजाने को लाया था और जिन्हे बुहारती हुई माँ उन्हे कूडा कह दे।ऊँचाई से आसमान तारों से बेतरतीबी से अटा पडा दिखाई देता है । दिमाग में अजीब सी खुजली मचती है उन्हे देखते ,आँखें और भी गडी जाती हैं ।शायद यह सम्मोहन है ही इसलिए कि रहस्य है ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-7916037454867988099?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/7916037454867988099/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=7916037454867988099' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/7916037454867988099'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/7916037454867988099'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/12/blog-post_14.html' title='वे दिन,चाँद का टेढा मुँह और मस्ती बचपन की....'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/R2HxTNq-ghI/AAAAAAAAAJo/CrZJvzTluKE/s72-c/space.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-690854658155220226</id><published>2007-12-13T09:10:00.000+05:30</published><updated>2007-12-13T09:14:32.587+05:30</updated><title type='text'>मरने के अलग-अलग स्टैंडर्डस्</title><content type='html'>“हम न मरै मरिहै संसारा हमको मिला जियावन हारा” ये कबीर का कॉंन्फिडेंस है अपनी भक्ति और ईश्वर के प्यार में ।पर अपन पिछले कई दिनों से ,जब से मृत्यु के शाश्वत प्रश्न पर विचार कर रहे हैं , बडे परेशान हैं ।परेशानी का कारण वाकई बडा है । खुद मृत्यु से भी बडा ।न भक्ति की है न ईश्वर से प्यार । परलोक के लिए कुछ योजना नही बनाई । सच कहें त इहलोक की भी अभी तक कोई योजना बनाई नही जा सकी । इसलिए जब आस-पास वालों को बीमा एजेंटों से बात करते मृत्यु के बाद के जीवन पर चिंतित देखा तो होश फाख्ता हो गए ,यह सोच कर कि अपन तो अभी तक खाक ही छान रहे थे मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया .... वाले अन्दाज़ में और दुनिया बीमा करा करा कर कबीर का वही दोहा गुनगुना रही है –हम न मरैं....... पर हम तो अवश्येअ ही मरिहैं और फोकटी का मरिहैं और तिस पर भी सब स्टैंडर्ड मौत मरिहैं ,हमार का होई ?? बाज़ार देवता ने जियावन हारा का रूप धर लीन्हा है । उनके पास नई नई स्कीम है । बीमा एजेंट ने चिढते हुए कहा –“लोग कडवा सच नही सुनना चाहते ,हम मरने की बात करते हैं तो बुरा मानते हैं , मरना तो सच्चाई है ,कब मौत आ जाए क्या पता । इसलिए मौत के बाद की प्लानिंग करनी चाहिए ” मैक्स या फैक्स जाने वे कहाँ से जियावन हारा की फरिश्ता बन कर आयी थीं ।उदाहरण देने लगीं – एक व्यक्ति ने एक ही प्रीमियम भरा था और कलटी हो लिए दुनिया से ,हमने सारा पैसा दिया । हम ज़्यादातर को सारा पैसा देते हैं ।बस सामान्य ,प्राकृतिक मृत्यु नही होनी चाहिये ।एक्सीडेंट में फायदा है । वह भी विमान से हो तो और अच्छा !! –वे मुस्कराईं। ट्रेन, बसों में सफर करने वाले चिरकुट चिर्कुटई मौत मरते हैं और उसी हिसाब से उनका क्लेम बनता है ।देखा जाए तो ट्रेन बस से मरना ज़्यादा कष्टकर है ।और आएदिन ये दुर्घटनाएँ होती ही रहती हैं ।हो सकता है इसीलिए बीमा वालों की नज़र में यह घाटे का सौदा हो । हवा में मृत्यु के आसार भी कम होते हैं और यह शानदार भी है !! ऊपर से ऊपर ही हो लिए !! कोई कष्ट नही । न आत्मा को न परमात्मा को न यमदूत को। न मरने वाले के परिवार को ।खबर बन जाते हैं यह फायदा अलग से । &lt;br /&gt;अब हमारी चिंता का एही कारन है । निचले दर्जे का मौत नही न चाहिए और हवा में उडने  के अभी तक कोई आसार नहीं । अभी तक की जिनगानी में एअरपोर्ट का दर्शन केवल् टी वी में ही किया है । अपनी-अपनी मौत –अपनी अपनी किस्मत । ज़िन्दगी के स्टैंडर्ड  से ही मौत का स्टैंडर्ड तय होता है । हम समझ गये हैं ज़मीन पर मरने में कोई फायदा नही । जिनगी की खींचतान मौत के बाद भी बनी रहती है । सो पोलिसी अब तभी लेंगे जब हवाई सफर का कुछ जुगाड हो जाए । वर्ना तो क्या फर्क पडता है कैसे जिए और क्यूँ मरे ।जियावनहारा न हमारी भक्ति से प्रसन्न होगा न योग से न ज्ञान से । उसे धन चाहिये ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-690854658155220226?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/690854658155220226/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=690854658155220226' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/690854658155220226'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/690854658155220226'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/12/blog-post_13.html' title='मरने के अलग-अलग स्टैंडर्डस्'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-2641086343859086250</id><published>2007-12-03T11:30:00.000+05:30</published><updated>2007-12-03T11:49:10.618+05:30</updated><title type='text'>आप स्त्री और बच्चों के अलावा कुछ और नही लिख सकतीं</title><content type='html'>किसी ने पिछले दिनों चिढते से स्वर में कहा “ आप स्त्री और बच्चों के अलावा कुछ और नही लिख सकतीं ” एकबारगी मुझे बडी अटपटी और बेहूदा बात लगी । पर तभी समझ आया कि मुख्यधारा हमेशा से हाशिए के विमर्शों का उपहास करती रही है या इस्तेमाल करती रही है या अपने अनुरूप उन बातों का अर्थ बदलती रही है । बात भारी हो जाती है तो यह टिप्पणी भी मिल जाती है – क्या इससे गम्भीर नही लिख सकती थीं ? । खैर ,कुल मिला कर यहाँ कि मै क्या लिखूँ और कैसे लिखूँ का सवाल मेरे तईं है ।यह हक़ किसी और का नही । राय का और असहमति का स्वागत है सदैव ही । पर बात की उपरोक्त शैली निहायत अलोकतांत्रिक है ।लोकतंत्र सबके समान हितों , समान अवसरों , अभिव्यक्ति के समान आज़ादी और समान सम्मान की बात करता है । ऊपर की दो बातों का विश्लेषण करते हुए दो स्थितियाँ और मंतव्य साफ नज़र आते हैं । &lt;br /&gt;पहला , निहायत अलोकतांत्रिक देश और समाज में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के दुष्परिणाम । &lt;br /&gt;और दूसरा , हाशिए के विमर्शों के खिलाफ तैयार मुख्यधारा का अवचेतन ।  &lt;br /&gt;भरतीय समाज की नींव में ही भेद-भाव ,श्रेणी विभाजन , ऊँच-नीच की पुरातन [पौराणिक कहा जाए तो भी गलत न होगा ] धारणाएँ बसी हैं जो गाहे बगाहे हमारा सब पढे-लिखों के व्यवहार –वार्ता में सामने आती हैं । जिस देश में अभी तक जातीय ,लैंगिक , वर्गीय भेद-भाव और हिंसा के नमूने रोज़-बरोज़ अखबारों में सामने आते हो वहाँ मेरा लोकतांत्रिक होने और लोकतंत्र को जीने की बात करना वायवीय ही हो सकता है और अपेक्षा करना तो और भी गलत होगा । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्त्री और बच्चे ,दोनो समाज के हाशिए पर जीते हैं । एक बाल-उद्यान ब्लॉग से और चन्द स्त्रियों के ब्लॉगिंग करने से वे मुख्यधारा नही हो जाते । क्या स्त्री की सीमांतीयता का मुद्दा चुक गया है ?, क्या वह वैध आधार नही रखता ? जब स्त्री स्वयम स्त्री की समस्याओं पर बात करती है तो वह उपहास का विषय हो जाता है या केवल सहमति का और मुख्यधारा जैसे तैसे इसे निपटा देना चाहती है ब्लॉगिंग करती हूँ, समर्थ –शिक्षित हूँ रोना रोती हूँ स्त्रियों का । यह छवि है । उँह ! मुह बनाते आगे चल देना । या फिर चलताऊ फैशन है स्त्री-विमर्श तो पुरुष उस पर बात करके ज़माने के साथ हो लेता है । यूँ हर बार ही बहस को ठंडा कर दिया जाता है ।ब्लॉग-जगत के पुरुषों के लिए भी या तो स्त्री विमर्श चुका हुआ, घिसा हुआ मुद्दा है या लोकतांत्रिक दिखने भारत का ड्रामा ।  मित्रों के बीच चाय-पानी आने पर यदि तथाकथित स्त्री समानता और स्वतंत्रता के पैरोकार  स्त्री मित्र से ही अपेक्षा रखते हैं कि वे सर्व करें क्योंकि वे यहाँ काम बेहतर तरीके से कर सकती हैं, तो उनसे दोगला कोई नही ।  मैं सिमोन कही जाऊँ या सरफिरी ,हाथ में तलवार लिए लडाकी आधुनिक महिला , या और कुछ लिखना नही आता तो स्त्री पर ही कलम चलाती हूँ टाइप बात क्योंकि स्त्री पर तो कोई भी लिख सकता है ; मै बुरा नही मानती क्योंकि समझती हूँ कि यहाँ मुद्दा निपटाया जा रहा है । जो हाशिये की ज़िन्दगी नही जिया ,जिसने हाशिए पर होने का  दर्द नही भोगा ,अपमान नही झेला ,दमित नही हुआ ,शासित नही हुआ , शोषित नही हुआ    ----- जब उस वर्ग में आ जाऊंगी तब आपको कहना न पडेगा कि स्त्री के अलावा कुछ और लिखिये ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-2641086343859086250?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/2641086343859086250/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=2641086343859086250' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/2641086343859086250'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/2641086343859086250'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/12/blog-post.html' title='आप स्त्री और बच्चों के अलावा कुछ और नही लिख सकतीं'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-211736562214151663</id><published>2007-11-27T10:13:00.000+05:30</published><updated>2007-11-27T10:20:56.062+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तसलीमा नसरीन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नंदीग्राम लोकतंत्र'/><title type='text'>पधारो म्हारे देस ......तस्लीमा !!</title><content type='html'>अचानक यह देश लेखकों ,बुद्धिजीवियों ,कलाकारों के प्रति सम्वेदनशील् हो गया है ।बंगाल में सी पी एम की करतूतों के चलते मार्क्सवाद  को गालियाँ पडने लगी हैं [ मार्क्स होते तो बडे शर्मसार होते ] ।नन्दीग्राम में वामपंथियों का बावरापन समझ नही आ रहा । पर ऐसे में भाजपा और संघ को बडा अच्छा अवसर मिला है सेकुलर और पाक दामन साबित होंने का । एम एफ हुसैन पता नही कहा हैं पर तस्लीमा ज़रूर यहाँ दिल्ली में राजस्थानी आवभगत पा रही हैं । मनमोहन और बुद्धदेव के बीच क्या चल रहा है ? शायद समझ आ रहा है । पर जब मोदी भी तस्लीमा को गुजरात मे न्योता दे रहे हों तो लगता है कि तीनों विचारधाराएँ मिलकर लोकतंत्र का बैंड बजा रही हैं । सारे राजनीतिक मुहावरे पिट चुके और परिभाषाएँ झूठी साबित हो चुकी हैं ।&lt;br /&gt;लोकतंत्र एक शासन पद्धति होने से पहले एक जीवन शैली है । लोकतंत्र को जिये बिना चलाया नही जा सकता ।अधकचरी मानसिकता और उपचेतन समाज में दो-चार बुद्धिजीवी नन्दीग्राम को सेज़ बनने या युद्धभूमि बनने  और तस्लीमा को निशाना बनाने से रोक पाएँगे ?वह जन जिसके हित मे यह शासन व्यवस्था तथाकथित रूप से काम करती है क्या जनमत -निर्माण के बेहतरीन माध्यमों के उपलब्ध होने के बावजूद जनमत सुनना चाहती है ? क्या यहाँ जन इतना सचेत और प्रबुद्ध है कि वह राजनीतिक क्रीडाओं को समझ सके और निरपेक्ष फैसला दे ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-211736562214151663?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/211736562214151663/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=211736562214151663' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/211736562214151663'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/211736562214151663'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/11/blog-post.html' title='पधारो म्हारे देस ......तस्लीमा !!'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-5300241581146924404</id><published>2007-10-25T10:54:00.000+05:30</published><updated>2007-10-25T11:00:25.920+05:30</updated><title type='text'>अब तक उनसठ .....| मैं क्या समझूँ !!</title><content type='html'>“मैं बेकसूर हूँ जज साहब , मैने कुछ नही किया, मेरा यकीन कीजिये, मुझे फँसाया गया है .......” इस तरह की रिरियाहटें और “मैं जो कहूंगा सच कहूंगा ,सच के अलावा कुछ नही कहूंगा ”  जैसे पिटे हुए वाक्य अक्सर हिन्दी फिल्मों के अदालती दृश्यों में सुन-दिख जाते हैं ।और नीर-क्षीर-विवेक सा न्याय का न्याय और अन्याय का अन्याय [दूध का दूध और पानी का पानी भी कह सकते है ] हो जाता है । खलनायक और उसके साथी सलाखों के पीछे जाते हैं ।अगर यह फिल्म का अंत हो तो दयनीय भाव के साथ अगर फिल्म का मध्य हो तो गर्दन झटकते हुए ‘&lt;strong&gt;तुझे तो मै देख लूंगा’ &lt;/strong&gt;वाले अन्दाज़ में ।शुरु में भी और मध्य में भी हम जानते हैं अपराधी-दोषी कौन है;यह भी जानते हैं कि उसे सज़ा मिलेगी अवश्य । लेकिन वस्तुजगत में क्या न्याय की प्रक्रिया इतनी ही त्वरित और सजग है ? क्या हम  &lt;strong&gt;न्यायालय में इंसाफ के अलावा कुछ नही मिलेगा&lt;/strong&gt; पर यकीन कर सकते हैं ?शायद उत्तर नकारात्मक है । वकालत एक बदनाम पेशा है और असली गुंडों के साथ साथ वर्दीधारी ,कुर्सीधारी,उद्योगपति गुंडे भी हैं ।ऐसे में न्यायालय  की सक्रियता और सज़ाओं का दौर चौकाने वाला है ।&lt;strong&gt;जनसत्ता &lt;/strong&gt;का आज का मुखपृष्ठ अलग अलग चार खबरों में 59 लोगों को[गिनती गलत हो तो माफ़ करे‍ हमारा गणित बहुत कमज़ोर और गरीब है] विभिन्न केसों में उम्रकैद के फरमान की तफ़सील दे रहा है ।दस साल पहले दिल्ली के कनॉट प्लेस में फर्जी मुठ्भेड कर के दो व्यापारियों की हत्या करने वाले दस पुलिसवालों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई गयी है ।फरवरी 1998 यानी 9 साल पहले कोयम्बटूर में लालकृष्ण आडवाणी की हत्या की साज़िश रचने और सिलसिलेवार बम विस्फोटों के लिए 31 दोषियों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गयी है ।वहीं नेता भी इस से नही बचे। 2003 में चर्चित् मधुमिता हत्याकांड में अमरमणि को सपत्नीक व दो अन्य को उम्रकैद का फरमान सुना दिया गया है। दिसम्बर 1992 यानी 15 साल पहले बाबरी मस्जिद ढहाये जाने के गुस्से में कानपुर में 11 लोगों को जलाने के मामले में 15 लोगों को अदालत ने उम्रकैद की सज़ा सुनाई है ।इनमें कोयम्बटूर वाले केस में कई अपराधियों को दोहरी-तिहरी-और चार बार उम्रकैद की सज़ा सुनाई गयी है ।अब्दुल ओज़िर को 125 साल कैद की सज़ा सुनाई गयी है । वही फर्जी एंकाउंटर केस में सी बी आई ने दोषियों के लिए मृत्युदंड की मांग की थी । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह खबरें क्या संकेत करती हैं ? अदालती प्रक्रियाओं पर यकीन लौटाने में  इनसे मदद मिलेगी ? या सर्वोच्च न्यायालय तक जाकर स्थितियाँ पलटने वाली हैं ? मै अब भी निष्कर्ष निकालने में असमर्थ हूँ । क्या न्याय-प्रक्रिया अपनी निरंतर होने वाली आलोचनाओं से झटका खाकर हरकत में आ गयी है ?सच का कितना और कौन सा अंश हम तक पहुँच रहा है ? क्या हमें आनन्दित होना चाहिये ? मै हतप्रभ हूँ ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-5300241581146924404?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/5300241581146924404/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=5300241581146924404' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/5300241581146924404'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/5300241581146924404'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/10/blog-post_25.html' title='अब तक उनसठ .....| मैं क्या समझूँ !!'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-6477090179718402439</id><published>2007-10-22T20:48:00.000+05:30</published><updated>2007-10-22T20:56:00.901+05:30</updated><title type='text'>बाज़ार में खडा रावण</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/RxzApZvOpUI/AAAAAAAAAJg/EPPkZSqHr8Y/s1600-h/dussera.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/RxzApZvOpUI/AAAAAAAAAJg/EPPkZSqHr8Y/s400/dussera.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5124182293556929858" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;इधर बहुत दिन से कुछ लिखने का वक़्त और् समां नही बन्ध पा रहा । बीच बीच में झांक ज़रूर जाती हूँ कि किसने क्या लिखा । खैर , अब जबकि त्योहारों का आलम है और हम अभी अभी रावण को फूँक कर हटे हैं तो एक आंखिन-देखी की एक पोस्ट भी चिपका ही देते है । हुआ यूँ कि रावण –जलन [ दहन कह लीजिये ] की पूर्व सन्ध्या पर हम दिल्ली के तिलक नगर की ओर एक कार्यक्रम अटेंड करने चल रहे थे । टैगोर गार्डन आते आते सडक के दोनो ओर का नज़ारा देख मुँह खुले खुले रह गये ।लाल-बत्ती, चौराहा तिराहा. फुटपाथ, पार्क जहाँ जहाँ जगह हो सकती थी वही वही बडी बडी मूँछों और दांत वाले, अट्टहास करते रावण, कुम्भकरण और मेघनाथ के विशालकाय पुतले जलने को तैयार पडे थे । कुछ दशानन ,धड और बाकी अंग ट्रकों में सवार होकर सडकों पर दौडने लगे थे न जाने किन गंतव्यों तक पहुँचने के लिए । यह रावण का बाज़ार था । बोर्ड लगे थे- मोहन रावण वाला, सोनू रावण वाला [कोई राम या रामू  रावण वाला भी रहा हो तो आश्चर्य नही ] । यह बाज़ार है । राम रावण में बन्धुता है । रावण के भरोसे कई रामों के घर के चूल्हे जल रहे हैं । अखबारें बता रही हैं पुतलों की मांग बढ रही है । पुतले जलाने का चलन बढा है । जयपुर से बडी डिमांड आ रही है । क्या लोग दशहरा को वाकई धर्म की विजय का पर्व मानकर मनाने लगे है ? क्या रावण दहन से वे अपने बच्चों को अच्छाई का पाठ पढाने लगे हैं । &lt;br /&gt;चलिए चाहे जितना चाहे बाज़ार को गरियाएँ पर इतना ज़रूर हुआ है कि बाज़ार ने सबको अवसर प्रदान किये हैं । वह हर तरह का वे-आउट सुझाता है । सैकडों तरीके और उपाय हरएक के लिए हैं उसके पास ।बाज़ार –दर्शन बडा प्रबल दर्शन है जो हर धर्म ,हर सभ्यता, हर संस्कृति के अनुरूप खुद को ढाल लेता है । त्योहार प्रधान इस देश में वह और भी  सफल हुआ है । बाज़ार बिना त्योहार की कल्पना असम्भव है । इसलिए भई हम तो अक्तूबर माह के आने से पहले भय से काँपने लगते हैं। जेबें ढीली होते होते नया साल मनाने की नौबत आ जाती है । श्राद्धों में , नवरात्रों में व्रत के खाने में, आलू चिप्स में, डांडिया के डी जे  में ,दुर्गा पूजा के पंडालों में,गीतों में, मेहन्दी में ,शादी में , करवाचौथ में, दीवाली मेलों में,पटाखों में,लडियों में ,मिठाइयों में, उपहारों में, दूज में, गोवर्धन में ...........सब में, सबके बीच बाज़ार उपस्थित रहता है । और इसी के बीच खडा है रावण जो बार बार जल रहा है पर रक्तबीज सा पल रहा है । जितना ही जलता है उतना ही बढता है ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-6477090179718402439?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/6477090179718402439/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=6477090179718402439' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/6477090179718402439'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/6477090179718402439'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/10/blog-post.html' title='बाज़ार में खडा रावण'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/RxzApZvOpUI/AAAAAAAAAJg/EPPkZSqHr8Y/s72-c/dussera.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-2832780991752579728</id><published>2007-09-28T12:03:00.000+05:30</published><updated>2007-09-28T12:08:51.194+05:30</updated><title type='text'>महापुरुष उदास है</title><content type='html'>&lt;a href="http://azdak.blogspot.com/2007/09/blog-post_27.html"&gt;प्रमोद जी&lt;/a&gt; का  महापुरुष उदास हैऔर अकेला है बेवकूफ बुद्धिजीवियोँ के बीच । मुझे भी हमेशा से लगा किताबें खरीदना [जो पडी रहेंगी शो केस में अपना सारा वज़न लिए], फिक्की के सेमिनार और पुस्तक विमोचन  , मण्डी हाउस के बेवजह चक्कर , श्रीराम सेंटर के नाटक , आई आई सी और आई एच सी की गोष्ठियाँ और प्रदर्शनियाँ  बेवकूफ बुद्धिजीवियों की बौद्धिक अय्याशी के अड्डे हैं । सोचना और उस सोच पर दुनिया को कायल् कर देना शगल है । ज्ञानदत्त ने सही पहचाना । कभी कभी एक ही के भीतर महापुरुष और बेवकूफ बुद्धिजीवी एक साथ होता है ।विखंडित स्व । स्प्लिट पर्सनैलिटी ।पर अलग भी होता है ।बेजी जी ने कहा –&lt;br /&gt;महापुरुष ज्ञानियों के बीच हो या अज्ञानियों के बीच अकेला ही होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाँ पर खुश होने और रहने का ताल्लुक ज्ञान से है मैं नहीं मानती। (यकीन नहीं हो तो मुझे ही देख लें :)))&lt;br /&gt;दोनो बातों से सहमत हूँ ।पर व्याख्या अपेक्षित है ।मेरा आशय भिन्न है ।कुछ कबीर की तरह है --- &lt;br /&gt;सुखिया सब संसार है खावै और सोवै दुखिया दास कबीर है जागै और रोवै &lt;br /&gt;जिसने ज्ञान पा लिया वह कभी खुश रह ही नही सकता ।खुशी  का ताल्लुक बेखबर रहने से है ।अज्ञानी होने से है ।बच्चा जब तक दुनिया के दर्द-रंज जान नही लेता वह खुश है । अबोध है मासूम है तो सब आनन्द है ।आनन्द पर वज्रपात होता है जब जान जाता है संसार को । सुख का भोंथरापन समझ लेने के बाद चैन नही मिलता ।कबीर ने जाना कि सुख और खुशी भ्रम है क्षणिक हैं ।जिनके पीछे पगलाई भीड भाग रही है वह वस्तुएँ कितनी सारहीन हैं । इसलिए कबीर दुनिया के इस चलन को देखता है और दुखी रहता है । कैसे इनसान खुद को मूर्ख बनाता है और जिए जाता है । इसलिए प्रमोद जी का महापुरुष दुखी है । वह जानता है ।बौद्धिक होना , बने रहना और दिखना क्या है । ए.सी. की हवा खाते नाटक का मंचन होते देखना और हाशिये के लोगो पर बात करना और मुद्दों को चाय-समोसे के साथ उडा देना।महापुरुष दुखी ही रहेगा और अकेला भी ।बेवकूफ बौद्धिक जब तक अज्ञानी है वह अय्याश है और उसकी हर चिंता फैशन है ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-2832780991752579728?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/2832780991752579728/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=2832780991752579728' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/2832780991752579728'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/2832780991752579728'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/09/hapurush.html' title='महापुरुष उदास है'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-988980352933991882</id><published>2007-09-08T17:10:00.000+05:30</published><updated>2007-09-08T19:03:52.481+05:30</updated><title type='text'>सत्ता तो भ्रष्ट करती ही है ....</title><content type='html'>उदय प्रकाश की एक कहानी है “वारेन हेस्टिन्ग्स का सान्ड ”जिसमे‍ एक स्थान पर उन्होने लिखा है” सत्ता तो भ्रष्ट करती ही है।” बात मे‍ दम है ।सत्ता जिसके पास भी होगी उसे ही भ्रष्ट करेगी चाहे वह स्त्री हो दलित या मज़दूर ।न न... । मेरा मन्तव्य हाशियाई-विमर्शो‍ अर सन्घर्षो‍ पर धूल डालना नही है । एक हाशिये का तो मै खुद भी प्रतिनिधित्व करती हूँ। यह और बात है कि एक तरह से विमर्श अपने आप में मुख्यधारा की प्रक्रिया है ।माने यह कि विमर्शकार बन कर मैँ भी मुख्यधारा हो जाती हूँ। कैसे ? जैसे आदिवासी या दलित् समाज का व्यक्ति मुख्यमंत्री बनते ही अपने समाज को भूल राजनीति की मुख्यधारा के अनुकूल आचरण करने लगता है । ये दलितों के “अभिजन” हो जाते हैं । तो सत्ता और शक्ति , विमर्श की परिधि में भी कुछ कुछ मिलती है‌‍ । ये बडी अप्रत्यक्ष सी  प्रक्रियाएँ हैं । &lt;br /&gt;खैर , मुद्दा वही पुराना है जिस पर &lt;a href="http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/09/blog-post_07.html"&gt;पिछली पोस्ट &lt;/a&gt;में बात की थी । स्त्री पर बात करते हुए अक्सर हम जिन पूर्वधारणाओं से ग्रस्त रहते हैं ,और जिनके कारण हमेशा से स्त्री-विमर्श का तेल हुआ है ।ये धारणाएँ हैं--- पहला, स्त्री की लडाई या प्रतिद्वन्द्विता पुरुष से है । स्त्री को मुक्ति पुरुष से चाहिये । दूसरा, स्त्री-विमर्श किसी भी अन्य हाशियाई –विमर्श की ही तरह सत्ता-विमर्श है।यानी यह सत्ता पाने की जंग है । तीसरा,सभी क्षेत्रों में स्त्री के आगे बढने से स्त्री की सशक्तीकरण हो रहा है । चौथा, लडकियाँ बोर्ड के नतीजों में हमेशा आगे रहती है इसलिए वे ज़्यादा होशियार और प्रतिभावान हैं और इसलिए कहना चाहिए कि वे शिक्षित हो रही हैं ।&lt;br /&gt;पहले मिथ का निराकरण का प्रयास मै पिछली पोस्ट में कर चुकी हूँ ।&lt;br /&gt; अब दूसरी बात - स्त्री-विमर्श किसी भी अन्य हाशियाई –विमर्श की ही तरह सत्ता-विमर्श है।यानी यह सत्ता पाने की जंग है ।&lt;br /&gt;इसी के जवाब की भूमिका मैने आरम्भ में बान्धी है ।यह ठीक है कि स्त्री विमर्श की झण्डाबरदार हो जाते ही मुझे मुख्यधारा वाले थोडे-बहुत लाभ तो मिलने लग जाते है लेकिन यह मानने से इनकार नही किया जा सकता कि हाशियाई-विमर्शों से एक दमित-दलित वर्ग में अस्मिता का बोध भी आया है और चेतना भी । बहुत से आन्दोलनों को खडा करने और दबी अस्मिताओं को उभारने में ये विमर्श कामयाब हुए हैं । यही इसकी शक्ति है । लेकिन वे जो हाशिये की अस्मिता नही है ,जिन्होने हाशिये पर होने के अपमान और दंशों को नही झेला ;जब वे विमर्शकार होते है तो उनका विमर्श फैशन से कम नही लगता ।साथ ही यह विमर्श के मनत्व्यों को हानि पहुँचाता है हाशिये के प्रति लोगो को असम्वेदनशील बनाता और भ्रमित करता है। तभी तो पुरुषों द्वारा अक्सर यह कह दिया जाता है कि” औरतों की लडाई सत्ता और शक्ति पाने के लिए है ”।शायद इसीलिए &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2007/09/blog-post_06.html"&gt;मनीष&lt;/a&gt; ने यह कहा कि मीडिया में औरतें अपनी प्रतिभा नही किसी और शक्ति के बलबूते बढ रही हैं ।यह आंशिक सत्य हो सकता है । बहस तो यह भी हो सकती है कि- सत्य क्या है यह कौन बताएगा ?अंतिम सत्य , पूर्ण सत्य कुछ नही है । सो डंके की चोट पर यह कहना कि स्त्री प्रतिभा नही प्रतिमा है – गलत होगा ।यह भी बौखलाहट भरा पूर्वाग्रह ही है ।इसका अन्य पक्ष यह भी है कि कई बार स्त्री-सशक्तिकरण के भ्रामक अर्थ ग्रहण करते हुए झंडाबरदारी करने वाली  कुछ स्त्रियाँ केवल कुछ पुरुषों द्वारा मूर्ख ही बनाई जा रही होते हैं । यह किसी विमर्श का सबसे घातक पहलू है । प्रतिभा जी का राष्ट्रपति बनना भी मुझे इसी श्रेणी में लगता है ।यह स्त्री का सशक्तीकरण नही स्त्री-विमर्श की हार है जब स्त्री को मोहरा बना कर मकसद हल किया जा रहा है और लगातार स्त्री-शक्ति के गीत गाये जा रहे हैं ।&lt;br /&gt;सत्ता और शक्ति स्त्री अपनी काबिलियत और हौंसलों से हासिल करती है और उसका उपयोग अपनी समझ से बेहतरीन करती है तो वह पुरुष से ज़्यादा सम्माननीय है क्योंकि जो पुरुष ने आसान रास्तों से गुज़र कर किया उसके लिए एक स्त्री ने शोलों पर चलकर रास्ता तय किया होता है ।ऐसे में अगर किरण बेदी दिल्ली की पुलिस अधीक्षक बनती तो यह वास्तविक अर्थ में स्त्री सशक्तीकरण होता ।&lt;br /&gt;कहने का तात्पर्य यह कि स्त्री की लडाई सत्ता,शक्ति,नियंत्रण की शक्ति को हस्तांतरण करने की नही है ।उसकी लडाई भागीदारिता की लडाई है ।समान अवसरों और समान हकों की लडाई है । उसकी लडाई उसे हीन  मानने और समझने की मानसिकता से है ।उसकी लडाई में सबसे बडा दावा मानाधिकार का दावा है ।जीवन की वैसी ही अकुंठ और बेहतर स्थितियों की लडाई जो पुरुष को उपलब्ध है ।&lt;br /&gt;इस लडाई में सत्ता और शक्ति केवल उपकरण हैं ,ज़रिया है मात्र । यदि इन्हे लक्ष्य समझा गया तो लडाई का मूल बिन्दु ही नष्ट हो जाएगा। मूल लडाई व्यवस्था की संरचना के पीछे छिपी मानसिकता है । स्त्री के लिए वास्तविक गतिरोध भौतिक् जगत में नही ,मनों के भीतर ,दिमागों में, अवचेतन में हैं । सत्ता तो भ्रष्ट करती ही है । इसलिए यह दावा बेकार है कि शीला दीक्षित या मायावती का मुख्यमंत्री होना इसलिए सही है कि वे किसी मर्द से बेहतर प्रशासन चलाएगी और मानवीय मूल्यों या बेहतर समाज की स्थापना कर पाएगी ।सत्ता की कज्जल-कोठरी में जो जाएगा ,कालिख तो लगेगी ही ।&lt;br /&gt;अत: स्त्री होने के कारण किसी अधिकार को पाने का दावा गलत है तो उतना ही गलत दावा प्रतिपक्ष का होगा कि स्त्री होने के कारण अधिकार या सत्ता को स्त्री हासिल नही कर सकती।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-988980352933991882?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/988980352933991882/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=988980352933991882' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/988980352933991882'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/988980352933991882'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/09/blog-post_08.html' title='सत्ता तो भ्रष्ट करती ही है ....'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-6059315876623782341</id><published>2007-09-07T09:40:00.000+05:30</published><updated>2007-09-08T17:09:54.512+05:30</updated><title type='text'>मोहल्ले का स्त्री-विमर्श और कुछ छूटे हुए मुद्दे</title><content type='html'>मोहल्ले पर आजकल &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/search/label/%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%9B%20%E0%A4%B9%E0%A4%AE%20%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A5%87%E0%A4%82%20%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%9B%20%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%AE"&gt;स्त्री-विमर्श&lt;/a&gt; चल रहा है ।अच्छा है । पर पीडा इस बात की है कि विमर्श एकांगी दृष्टिकोण को लिए चल रहा है । सारी बात चीत के बाद लगता है कि मुद्दा मात्र यह रह गया है कि ‘स्त्रियाँ हर क्षेत्र में प्रगति कर रही है और भारत की किस्मत लिख रही हैं ‘जैसा कि &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2007/09/blog-post_05.html"&gt;पूजा के लेख &lt;/a&gt;से ध्वनित होता है या फिर ठीक उलट कि &lt;a href="http://mohalla.blogspot.com/2007/09/blog-post_06.html"&gt;‘स्त्रियाँ आगे तो बढ रही हैं लेकिन प्रतिभा के बलबूते नही &lt;/a&gt;किन्ही और ही मानदनडों पर ‘।माने लडाई बहस एक सरफेस के ऊपर काई सी जम रही है जिसके नीचे की गहराई अभेद्य और अगम्य हो जाएगी अगर यह विमर्श कुछ पल और यूँही चलता रहा। इसलिए सोचा कि कुछ वास्तविक मुद्दे उठ जाने चाहिये इससे पहले कि बात में बात सा कुछ न बचे और शब्द रीत जाएँ और  अर्थ चुक जाएँ । &lt;br /&gt;मेरी समझ से स्त्री के आगे बढने या न बढने से कहीं ज़रूरी बातें और हैं । इसलिए पहले तो उन मिथों से निबटना ज़रूरी है जो हर इस बहस में शामिल व्यक्ति की पूर्वधारणा के रूप में काम कर रहा है । ये मिथ है‍ -&lt;br /&gt;पहला, स्त्री की लडाई  या प्रतिद्वन्द्विता पुरुष  से  है । स्त्री को मुक्ति पुरुष से चाहिये । दूसरा, स्त्री-विमर्श किसी भी अन्य हाशियाई –विमर्श की ही तरह  सत्ता-विमर्श  है।यानी यह सत्ता पाने की जंग है । तीसरा,सभी क्षेत्रों में स्त्री के आगे बढने से स्त्री की सशक्तीकरण हो रहा है । चौथा, लडकियाँ बोर्ड के नतीजों में हमेशा आगे रहती है इसलिए वे ज़्यादा होशियार और प्रतिभावान हैं और इसलिए कहना चाहिए कि वे शिक्षित हो रही हैं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब इन मिथों का निराकरण - &lt;br /&gt;स्त्री की लडाई ,दर असल , पुरुष से नही पितृसत्ता से है जिसका समान रूप से शिकार पुरुष भी है ;इसलिए स्त्री की मुक्ति या लडाई पुरुष की भी मुक्ति और लडाई है ।लेकिन अफसोस यह है कि इस् मुद्दे पर स्त्री व पुरुष एक दूसरे को प्रतिद्वन्द्वी मानते हैं और सारी ऊर्जा अवास्तविक शत्रु से जूझने में निबट जाती है ।मायने यूँ समझिए कि, जब एक स्त्री अपनी पारम्परिक भूमिकाओं से निकल कर मनचीता करना चाहती है तो उसका रास्ता रोकने वालों में पितृसत्ता के चौकीदार पुरुष ही बाधा नही बनते बल्कि इसी व्यवस्था में रची-पगी स्त्रियाँ भी उतनी ही बाधक बनती हैं ।पुरुषो को समझना होगा कि वे एक कितने ही शिक्षित हो जाएँ वे एक बन्धी बन्धाई परिपाटी के अनुरूप ही व्यवहार कर रहे हैं । यह भी समझना होगा कि पुरुष का साथ ही गंतव्य है और मंतव्य है न कि पुरुष से मुक्ति । पुरुषों को धरती से मिटाकर स्त्रियाँ कहाँ जाएँगी ?&lt;br /&gt;इसलिए कामना साथ की ही है चाहे वह इच्छित साथ लड कर लेना पडे ।&lt;br /&gt;“चक दे इंडिया” इस मायने में एक अच्छा उदाहरण सामने लाती है ।लडकियों की टीम वर्ल्ड कप में जाने लायक है यह सिद्ध करने के लिए उसे लडकों की टीम के साथ खेलना पडता है । वास्तव में भी जब जब स्त्री की क्षमताओं पर विचार हुआ है तो उसका पैमाना पुरुष ही रहा है ।स्त्री अपने आप में कुछ नही अगर उसकी प्रतिभा पुरुष की प्रतिभा से टक्कर लेने लाबिल नही है ।यहाँ ये कायनात के दो अलग ,पूरक प्राणी ,साथी न होकर दो लडाके हो जाते हैं। जिसमें एक अपनी भिन्न शारीरिक और मानसिक शक्तियों व क्षमताओं के कारण हीन साबित होता है।इसलिए शारीरिक क्षमता को सिद्ध करने के लिए प्रजनन और पोषण से ही बात नही बनती स्त्री को पहलवानी भी करनी पडती है ;और वह करती है;खुद को साबित करने के लिए ये वे अग्नि-परीक्षाएँ हैं जिनसे वह आज भी गुज़रती है ,और सफल भी होती है । शारीरिक क्षमताएँ और काबिलियत सिद्ध करने के लिए अभी तक पुरुष से नही कहा गया है कि-“चलो जी, तुम्हे तब मानेंगे जब बच्चा पैदा करके दिखाओ “&lt;br /&gt;तो लडाई दो विपरीत लिंगियों की नही है । उनके सामाजी करण की प्रक्रिया और उसके पीछे के संसकारों या मानसिकता से है ।&lt;br /&gt;समानता के मायने क्या है ? इस पर भी सोचने की ज़रूरत है । बाकी मिथों का जवाब अगली पोस्ट में ।यूँ भी पिछली पोस्ट विचारों के प्रवाह में बहुत दीर्घ हो गयी थी ।इसलिए अभी इतना ही । बहस आमंत्रित है .........&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-6059315876623782341?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/6059315876623782341/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=6059315876623782341' title='29 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/6059315876623782341'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/6059315876623782341'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/09/blog-post_07.html' title='मोहल्ले का स्त्री-विमर्श और कुछ छूटे हुए मुद्दे'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>29</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-6902057190242928818</id><published>2007-09-06T10:25:00.000+05:30</published><updated>2007-09-06T10:29:10.277+05:30</updated><title type='text'>एक पगलाए वक्त में रस-चर्चा</title><content type='html'>जब काव्य में रस की बात होती है तो सबसे पहले रसराज &lt;strong&gt;श्रृंगार &lt;/strong&gt;[आम भाषा में प्रेम –और उसके भी दोनो पक्ष संयोग और वियोग ]  का नाम आता है ।“पृथ्वीराज रासो” की परम्परा के रासो काव्य युद्ध और श्रृंगार के वर्णनों से अटे पडे हैं। यानि वीर और श्रृंगार रस इनमें प्रमुख हैं। श्रृंगार का बखान क्या करूँ, वह हमेशा प्रासंगिक रहेगा और सबका स्वानुभूत भी । युद्ध के वर्णनों में मिलने वाले वीर रस और अन्य दो रस- रौद्र  व जुगुप्सा  मुझे बात करने को अधिक प्रासंगिक जान पड रहे हैं ।चलिए वीर रस की बात करें।वीर रस की प्रेरक स्थितियाँ होती हैं जब अधर्म , अत्याचार और अन्याय का सर्वत्र बोलबाला हो ।खलनायक के दुराचरण और निर्बलों पर उसका अन्याय वीर रस के नायक को भडकाने और रस की पूर्ण निष्पत्ति में सहयोग देते हैं। ऐसे में जननायक के रूप में खडा नायक वीर रस से स्फूर्त और सद्दुदेश्य से संचरित होता है और उसका वीरतापूर्वक शस्त्र उठा कर शत्रु पर वार करना वीर रस का निष्पादन करता है । ऐसे में रौद्र रस वीर का सहयोगी बन कर प्रकट होता है । रौद्र शब्द अधिकांश लोगों ने शिव के रौद्रावतार या रौद्र रूप के विषय में सुना होगा । रौद्र रस का स्थायी भाव क्रोध है [स्थायी भाव माने वे मूल भाव जो आदिम काल से मनुष्य के मन में रहते आये है और रहेंगे ,और अनुकूल अवसर आते ही प्रकट हो जाते हैं] ।यह क्रोध दुराचारी के चिढाने और हरकतों से बाज़ न आने पर वीर नायक में उतपन्न होता है।ऐसे में नायक की क्रोध से आंखे लाल होना, बाँह ,होंठ फडकना ,हुंकार करना, चुनौती देना रौद्र रस का सृजन करते हैं। ये दोनो रस मिलकर युद्ध के वातावरण को सजीव बनाते हैं तो वहीं युद्ध के बाद लाशों और्  खून् से लिथडे कटे शरीर ,मरघट सी नीरवता और गिद्धों चीलों का लाशों में से आँख जिह्वा नोच नोच कर खाना ऐसा घृणित वातावरण बनाते हैं जिनसे जुगुप्सा रस की निष्पत्ति होती है माने कै करवा सकने की क्षमता वाला उबकाई भरा वातावरण्। &lt;br /&gt;यह वीरता प्रदर्शन और क्रोध कभी भी निर्बल और शोषित के प्रति नही होता ।उद्देश्य की पवित्रता और धर्म संस्थापना की मंशा से ही होता है। लेकिन अगर क्रोध और बल-प्रदर्शन कमज़ोर के प्रति होने लगे,मानो कंस का मथुरावासियों पर अत्याचार , तो वहाँ क्या रस होगा ;न,न...रसाभास....रसाभाव.....या शायद रसभंग ! रसभंग की ये स्थितियाँ हमें आज हर ओर दीख पड रही हैं ।डारविन के विकासवाद [survival of the fittest] ने यूँ भी प्रतिस्पर्द्धा में निर्बलों के पिछड जाने और सबलों के और और सबल होते जाने को वैज्ञानिक वैधता दे ही दी तो कार् मालिक और चालक के  रिक्शेवाले के प्रति असम्वेदनशील होकर जैसे तैसे आगे बढ जाने में अचरज क्या है ? मनों का बोझ लादे असहाय रिकशावाला लाख चाह कर भी जो कुछ नही कर सकता,और उसे भी उसी सडक पर ही चल कर आगे तक जाना है उस पर भी बेसब्र गाडियाँ लगातार “पीं-पीं” चींखती रहती हैं और थूक में चबाई सभ्य गालियाँ उस पर फेंकते हुए सबसे आगे बढ जाती हैं।यहाँ कार मालिक का रौद्र रूप रौद्र रस की खिल्ली सी उडाता लगता है । क्या यह आँखें लाल होना क्रोध से बाँहें फडकना अधर्मी,दुराचारी के कुकृत्यों के कारण है ? यह रौद्र है ? या पागलपन ? शायद पागलपन ही है । ये अतिवादी प्रतिक्रियाएँ और अकारण का गुस्सा जिसमें  पगलाया आदमी एक उमा खुराना पर गुस्सा होकर कई निरपराधों के वाहन जला डालता है या सीलिंग के विरोध में सडकों पर उतर आकर पत्थरबाज़ी करता,ट्रकें जलाता है। या कमज़ोर को सामने देखते ही जिसे अचानक अपनी शक्ति का भान हो जाता है जिसके दम्भ में वह सडक पर ही पीट पीट कर किसी की हत्या कर डालता है । या वर्दी का गुंडा  “मारो साले को !” कहते हुए प्रशासन की दी हुई बंदूक से, समर्पण को तैयार निहत्थे गुण्डे को भून डालता है । ऐसे लोगो को कौन सा वीर कहा जाए ? युद्धवीर ...दानवीर ... कर्मवीर....दयावीर....। न । न यह वीरता है न यह कोई रस है ।महज़ बल-प्रदर्शन वीरता नही और महज़ क्रोध रौद्र नही ।यह दिमागी बुखार है जिसका कोई वैक्सीन नही ।वर्ना पडोसी के कुत्ते को जान से सिर्फ इसलिए मार डालना कि उसका भौंकना पसन्द नही,या अपनी ही संतान को मार डालना सिर्फ इसलिए कि वह पिता के हिस्से के चिप्स खा गया दुरुस्त दिमागी हालत के लक्षण तो कतई नही हैं ।गरीब परिवारों के बच्चों की बोटियाँ चबाने वाले  मोनिन्दर सिंह ही वहशी नही हैं सिर्फ ।यह इस पगलाए वक्त के हर उस आदमी का वहशी जुनून है जिसे अपने हाथ् का डंडा और असहाय की चमडी दीखती है बस । &lt;br /&gt;तो वीर और रौद्र रस की स्थितियाँ आज सम्भव नहीं । ये दोनो रस रस चर्चा में बहिष्कृत होने चाहिए । ये निहायत अप्रासंगिक हैं । बचा –जुगुप्सा रस । वह निहायत प्रासंगिक है ।निठारी की कोठी के भीतरी नज़ारे को यदि कोई कवि छन्दोबद्ध करे तो जुगुप्सा रस का अब तक का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण बन पडेगा ।भीड के विरोध-प्रदर्शन और पुलिस के शांति-प्रयासों के बाद का सडकों का नज़ारा भी जुगुप्सा रस के लिए मॉडीफाएड स्थिति होगी ।इसे रस भंग कहने वाले मूर्ख होंगे । अब बाकि बचे रसों की बात । हास्य रस् भी श्रृंगार का साथी है और कभी अप्रासंगिक नही होने वाला । करुण रस तो शायद अब रसराज हो जाए क्योंकि सर्वत्र स्थितियाँ इसकी प्रेरक ही हैं । सरकारी-प्रशासनिक अफसरों-गुंडो और आतंकवाद के दौर में भय रस भी  अति प्रासंगिक है और वैज्ञानिक –प्रौद्योगिक तरक्की के चलते अद्भुत रस भी यदा-कदा दीख जाएगा । अभी बहुत कुछ अद्भुत होना बाकी है ।भक्ति रस विवादास्प्द रस की श्रेणी में है क्योंकि भक्ति वाले शांत रस और उसके स्थायी भाव निर्वेद में कोई रुचि न रखकर धर्म और राजनीति में अधिक दिलचस्पी दिखा रहे है ।बम-बम भोला में रमते हुए लाठी बल्लम लिए कुश्ती के दाव पेंच भी खेलते रहते हैं । वात्सल्य रस या कहे माता पिता का संतान के प्रति प्रेम –यह भी प्रश्न चिह्नित है ।इसकी प्रतिकूल परिस्थितियाँ वात्सल्य भाव के पुष्टिकरण में बाधा बन रहा है ।केवल कृष्ण की बाल-लीलाओं में आनन्द लेने को जेंडर-बायस कहा जा रहा है ।बालिका-शिशु की अठखेलियों को अभी तक नज़रान्दाज़ किया गया है।&lt;br /&gt;सो नतीजा यह कि सब रसों में वीर और रौद्र रस को छोडकर बाकि सभी रस काव्य में और समाज में अपनी अपनी प्रासंगिकता के लिए अडे है ।रौद्र और वीर को या तो अपना स्वरूप बदलना होगा या मिटना होगा या अप्रासंगिक होना होगा माने सिर्फ किताब तक सीमित रहना ।ऐसी कोई स्थिति समाज में नही होगी जिससे प्रेरित हो कर हम वीर या रौद्र का उदाहरण दे सकें या जिनके आधार पर कवि काव्य लिख सके ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-6902057190242928818?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/6902057190242928818/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=6902057190242928818' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/6902057190242928818'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/6902057190242928818'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/09/blog-post.html' title='एक पगलाए वक्त में रस-चर्चा'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-1648174516923645705</id><published>2007-08-20T09:53:00.000+05:30</published><updated>2007-08-20T10:12:32.030+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फुल-टाइम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विज्ञापन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गधेलू'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्वस्थ नौकर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='घरेलू'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जड'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जवान'/><title type='text'>विज्ञापन ---चाहिये एक फुल-टाइम ,घरेलू,गधेलू, जड ,जवान,स्वस्थ नौकर</title><content type='html'>विज्ञापन हिन्दी-लेखन की अद्यतन विधा है [यह मेरा मानना है]।पॉपुलर भी [नही है तो हो जाएगी]&lt;a href="http://masijeevi.blogspot.com/2007/08/blog-post_19.html"&gt;।हाशियाई विमर्श&lt;/a&gt; में हम दोनो ओर हैं। कुछ प्रसंगों में मुख्यधारा और कुछ म्रं सीमांत या हाशिये पर हैं।जहाँ हम मुख्यधारा हैं वहाँ हाशिये के प्रति सम्वेदनशीलता लाख  प्रतिबद्धता के बाद भी नही आ पाती ।इसलिए जब नौकर पर एक कहानी लिखने का सोचा तो नही लिख पाए। आराम और फुरसत से ब्लाग लिखते हुए अपने नायक के सन्दर्भ में फुरसत की बात जम नही रही थी &lt;a href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2007/08/blog-post_14.html"&gt;।नौकर का फुर्सत और आराम मे होना &lt;/a&gt;या कहें अस्मितावान होना मालिक होने के भाव को चुनौती देता है ।इसलिए कहानी का केन्द्रीय भाव पकड नही आता था । कहानी का फॉर्म नही जम रहा था ।तभी यह अद्यतन विधा याद आयी । यूँ भी कहा जाता है [पता नही कहाँ कहा जाता है ] कि लेखक विधा नही चुनता उसका कथ्य अपने लिए उपयुक्त विधा का चुनाव अपने आप कर लेता है । सो हमारे कथ्य और मंतव्य ने अपने लिए विज्ञापन विधा का चुनाव स्वयँमेव कर लिया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;विज्ञापन &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;चाहिये एक फुल-टाइम ,घरेलू,गधेलू, जड ,जवान,स्वस्थ नौकर [बच्चोँ को प्रेफरेंस दी जाएगी ]जिसे थकान न होती हो ;होती भी हो तो बताए न, जो कम रोटी और कम नीन्द पर ज़्यादा काम कर सके,जिसे आराम हराम हो ,जिसे अखबार पढना,चिट्ठी लिखना न आता हो ,जिसकी किसी समसामयिक विषय पर अपनी कोई राय न हो, जिसके चहरे पर आशा और आँखों में सपने न हों ,नौकर होने के कारण जिसके हाड-गोड आसानी से तोडे जा सकें,जिसका परिवार न हो, हो तो गाँव में हो जहाँ उसे जाने की छुट्टी नही दी जाएगी क्योंकि गाम जाकर ये नौकर जात वापस नही आते, विवाह की आज़ादी नही होगी ,विवाहित होने पर पत्नी-बच्चे गाँव मेँ ही रहे तो अच्छा ,दोस्ती-मित्रता की आज़ादी नही होगी ,जो सबके सोने के बाद सोए और सबके जागने से पहले जाग जाए,जिसके रीढ की हड्डी और गर्दन की हड्डी न हो या तोडी जा चुकी हो और वह गर्दन सीधी करके खडा न हो सकता हो लेकिन काम करने का उसमें ज़बर्दस्त जोश हो , ,जो परेशान होकर भागने का प्रयास न करे अन्यथा चोरी का केस लिखवा कर पकडवा लिया जाएगा [पिटाई होगी सो अलग] ,जो डाँट खाने पर मुँह न खोले ,वफादारी में कुत्ते के समान, स्वभाव में गऊ , बोलने में बकरी समान , बोझ ढोने में गधे के समान, फुर्ती में घोडे के समान उपयोगिता में बैल के समान और मालिक के सामने मेमने के समान् हो। और अंतत: वह सिर्फ और सिर्फ नौकर हो ।&lt;br /&gt;बीमारी व दुर्घटना की स्थिति मे‍ इलाज की गारन्टी नही ।योग्य उम्मीदवार सम्पर्क करे‍-बाक्स नम्बर -१०००&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-1648174516923645705?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/1648174516923645705/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=1648174516923645705' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/1648174516923645705'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/1648174516923645705'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/08/blog-post.html' title='विज्ञापन ---चाहिये एक फुल-टाइम ,घरेलू,गधेलू, जड ,जवान,स्वस्थ नौकर'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-6992321613766396287</id><published>2007-08-03T11:24:00.000+05:30</published><updated>2007-08-03T11:52:48.243+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Poem'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी कविता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='aalok dhanva'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='aseemaa bhatt  भागी हुई लडकियाँ'/><title type='text'>भागी हुई लडकियाँ –भाग-2</title><content type='html'>पिछले दिनोँ आलोक जी की कविता ‘भागी हुई लडकियाँ ’ बहुत चर्चा में रही । कारण था असीमा की आप-बीती का प्रकाशन जिसमें अलोक जी के कवि हृदय और व्यक्तित्व में अंतर्विरोध देख कर दुख हुआ ।किसी निर्णय पर पहुँचना नही है मुझे न इतनी औकात है मेरी ।इस विषय पर पहले ही लिख चुकी हूँ ।लेकिन बहुत उत्सुकता थी आलोक धन्वा की कविता “&lt;a href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2007/07/blog-post_31.html"&gt;भागी हुई लडकियाँ &lt;/a&gt;”पढने की ।अभय तिवारी जी ने  वह इच्छा पूर्ण कर दी ।उन्हे धन्यवाद! &lt;br /&gt;कविता  पढने के बाद वह अधूरी सी लगी । एकतरफ़ा  ।शायद एक स्त्री-स्वतंत्रता के प्रबल पक्षधर कवि को लडकियोँ के भागने में क्रांतिधर्मिता का दर्शन होता हो जो समाज की संरचना मेँ आमूल-चूल परिवर्तन के बहुत प्रारम्भिक  संकेत होँ ।महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के ‘कविता क्या है’ सम्बन्धी लेख से असंतुष्ट होकर आचार्य शुक्ल को फिर से लिखना पडा था “कविता क्या है”।न मै आचार्य शुक्ल हूँ न आलोक जी द्विवेदी हैं ;उनके आस पास भी कही नही ठहरते हम शायद इसलिए  आलोक जी से असंतुष्ट होने का जोखिम लिया जा सकता है । ऐसे में “भागी हुई लडकियाँ ”का दूसरा भाग बहुत कम चेष्टा से ,रच दिया है। अ-कवि [अप्रतिष्ठित औत स्त्री  :) ]की कविता शायद ऐसी ही हो सकती होगी |&lt;br /&gt;और एक तरफ़ा शायद यह भी है । इसलिए दूसरा भाग कहा है ।यह सचमुच की भागी लडकियां है रतजगो‍ में भागी नही।&lt;br /&gt;तो एक पक्ष यह भी -----&lt;br /&gt;आलोक धन्वा को समर्पित , क्योन्कि उन्ही की कविता से प्रेरित है यह कविता ।&lt;br /&gt;*****&lt;br /&gt;भागी हुई लडकियाँ &lt;br /&gt;कडे जीवट वाली होती हैं&lt;br /&gt; जीती हैं&lt;br /&gt; मौत को शर्मसार करतीं ।&lt;br /&gt; यूँ भी जब तक &lt;br /&gt;गर्भ् में ही मार न दी जाएँ &lt;br /&gt;मरती नही लडकियाँ &lt;br /&gt;आसानी से।&lt;br /&gt; कडी जान होती हैं।&lt;br /&gt; भागी हुई लडकियों के सामने &lt;br /&gt;नही होते विकल्प । &lt;br /&gt;उनके रास्ते वेश्यालयों तक जाकर &lt;br /&gt;बन्द होते हैं हमेशा के लिए &lt;br /&gt;और भागने के बाद &lt;br /&gt;झरोखे से झाँकने की भी नही रहती हकदार ! &lt;br /&gt;उजाले के सफेद पुरुषों को &lt;br /&gt;रात के ग्लानिमय अन्धेरे में &lt;br /&gt;अपनी चूहों,झींगुरों से अटी पडी मैली कोठरी में ,एक के बाद एक &lt;br /&gt;देती हैं राहत । &lt;br /&gt;भागी हुई लडकियों को &lt;br /&gt;बेच जाते हैं उनके प्रेमी &lt;br /&gt;दलालों द्वारा बलत्कृत होने और् &lt;br /&gt;तब्दील होने&lt;br /&gt;एक रंडी में ।&lt;br /&gt; एक निर्विकल्प दुनिया &lt;br /&gt;खिंच जाती है &lt;br /&gt;चारो ओर । &lt;br /&gt;खरीदारों के हाथ किसी मवेशी की तरह&lt;br /&gt;  टटोलते हैं उनकी देह &lt;br /&gt;और लगाते हैं कीमत । &lt;br /&gt;*** बज़ारू, बेआबरू &lt;br /&gt;मानते है जिन्हे; &lt;br /&gt;आश्चर्य ! !&lt;br /&gt;वे भी पालती हैं भ्रम इज़्ज़त के &lt;br /&gt;और मुँह सिए पडी रहती हैं &lt;br /&gt;सीले कोनों में रोगों से अटी देह लिए ।&lt;br /&gt;वे नही कहना चाहतीं अपनी पीडा&lt;br /&gt;शर्मिन्दगी के घृणित,कुत्सित पल &lt;br /&gt;नही बांटना चाहतीं। &lt;br /&gt;तीस के बाद &lt;br /&gt;बुढाने लगती हैं तेज़ी से&lt;br /&gt; इसलिए&lt;br /&gt; उनकी लडकियाँ&lt;br /&gt;[जिन्हे भागने की नही पडी&lt;br /&gt; ज़रूरत] ज्ल्दी-जल्दी होने लगती हैं बडी&lt;br /&gt; सीखने लगती हैं हुनर ।&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;घर के भीतर् &lt;br /&gt;शौचालय-सा शहर में वेश्यालय है।&lt;br /&gt;रसोई-सा पवित्र नही पर उससे अहम &lt;br /&gt;जहाँ से निवृत्त्त होकर&lt;br /&gt; पाक-मना&lt;br /&gt; परिवार-संरचनाओं के मुखिया &lt;br /&gt;लौटते है।&lt;br /&gt;फर्क यह है &lt;br /&gt;इन्हे कोई अपना नही कहता सार्वजनिक शौचालय की भाँति ।&lt;br /&gt; जिन्हे गन्दगी छोडने के बाद &lt;br /&gt;अपनी,साफ करने &lt;br /&gt;कोई नही आता । &lt;br /&gt;**** &lt;br /&gt;सीधे-सादे-भोले लोग &lt;br /&gt;सोचते हैँ &lt;br /&gt;भागी हुई लडकियाँ &lt;br /&gt;आत्महत्या क्यों नही कर लेतीं?&lt;br /&gt; मौत से बदतर ज़िन्दगी से &lt;br /&gt;खुद मौत ही बेहतर नही ?&lt;br /&gt;ये सीधे, भोले लोग &lt;br /&gt;समझते क्यों नही &lt;br /&gt;भागी हुई लडकियों के &lt;br /&gt;लौटने के दरवाज़े &lt;br /&gt;ये खुद ही &lt;br /&gt;बन्द कर चुके हैं। &lt;br /&gt;इन्होने बदल  दिया है &lt;br /&gt;कोठो को &lt;br /&gt;वॉल्व में ,&lt;br /&gt; भागी हुई लडकियों को रंडियों में, &lt;br /&gt;हत्या को &lt;br /&gt;आत्महत्या में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-6992321613766396287?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/6992321613766396287/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=6992321613766396287' title='27 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/6992321613766396287'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/6992321613766396287'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/08/2.html' title='भागी हुई लडकियाँ –भाग-2'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>27</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-5170965669306369446</id><published>2007-07-27T10:03:00.000+05:30</published><updated>2007-07-27T10:06:10.461+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='।SHORT STORY'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='laghu kathaa'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='HINDI लघुकथा'/><title type='text'>बरसात के बाद</title><content type='html'>बरसात के बाद भीगे पत्तों की महक के साथ काली धुली, अकेली सडक पर चलते हुए वे दोनो जाने क्या कुछ सोच रहे थे।चुप्पी दीवार न थी पर सहारा तो थी ही ।शायद दोनो में से कोई भी पहल करने का जोखिम नही उठाना चाहता था । कीचड भरी फ़ुटपाथ पर रपटते हुए ,कदमों को धीरे-धीरे नज़ाकत से उठाते हुए हलकी डगमगाहट में कान्धे से कान्धा टकरा जाता है । एक सुखद अनूभूति के साथ लडकी कदमों को फिर से डगमग़ा जाने देती है ।वह चंचल है ।लडका समझ रहा है । वह सम्भाल लेता है हाथों का सहारा देकर और उसका तुरंत ही हाथ छोड देना लडकी को खिझा देता है वह कुछ और देर थामे रह ता तो ?लडका शांत और गम्भीर है ;जैसे बहुत कुछ हो उसके पास कहने के लिए या कुछ भी न हो कहने के लिए लडकी से ।या शायद वह सोच रहा हो कि इस समय मेँ वह और बहुत से काम निपटा सकता था । लडकी को उसपर लाड आता है ।घर से बाहर उसके भीतर की अल्हड प्रेमिका करवटें लेने लगती है ।वह उसका सर गोद मेँ रख कर थके मुख को चूम लेना चाह्ती है ।लडके के भीगे –बिखरे बालों को समेटने के लिए उसका मन मचलता है,पर सडक पर ? कोई बात नही ।वह हाथ बढाती है तो लडका कहता कुछ नही भवें सिकोडता हुआ उसे नादानी न करने को कहता- सा  देखता है।फिर पलट कर पीछे और दाएँ -बाएँ देखता है। लडकी उबासी लेने लगती है ।उसका मन बुझने लगता है।उसे समझ नही आता कि वे दोनो साथ क्यों हैं और लगातार चल क्यों रहे हैं !वह पार्क के बेंच पर बैठना चाहती है ,वह लडके के कन्धे पर सर रखना चाह्ती है । वह चाहती है कि लडका उसके नर्म रेशमी बालों में उंगलियाँ फिराए और इस प्रेमिल नीरवता में वह घर लौट कर सैकडों कर्म करने और कई भूमिकाएँ निभाने के लिए वापस समेट ले ऊर्जा ।अचानक उसने पलट कर लडके की ओर देखा –लडका अब लडका सा नही रहा । वह आदमी हो गया है ।या वह आदमी ही था ? क्या मैने इसे आज से पहले कभी नही देखा इस तरह ?अचानक लडकी के तेवर बदलते हैं ।वह कदमों को मोड लेती है बाज़ार की ओर जैसे सहसा याद आ गया हो कोई बहुत ज़रूरी काम । आदमी नही पूछता ।मानो वह तेवर समझ गया हो । वह सब समझ जाता है ।वह इसलिए अनूकूल व्यवहार कर पाता है। कमरे के भीतर चाहे जो हो । वह बाहर एक ज़िम्मेदार पति है ।लडकी याद दिलाती है कि बाज़ार से उसे लेना है सासू माँ के अचार डालने को सौंफ और कलौंजी । और सुबह का टिफिन पैक करने को अल्यूमीनियम फ़ॉएल ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-5170965669306369446?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/5170965669306369446/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=5170965669306369446' title='29 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/5170965669306369446'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/5170965669306369446'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/07/blog-post_27.html' title='बरसात के बाद'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>29</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-8207494214287621430</id><published>2007-07-26T19:15:00.000+05:30</published><updated>2007-07-26T19:22:09.024+05:30</updated><title type='text'>ढेला और पत्ती</title><content type='html'>बाल उद्यान पर पढिये &lt;a href="http://baaludhyan.blogspot.com/2007/07/blog-post.html"&gt;ढेले और पत्ती की कहानी &lt;/a&gt;।साथ ही यह अनुरोध भी कि आप अपने बच्चों के बनाए चित्र या उनकी लिखी कविता या कोई भी चटपटी बात जो उनके नन्हे मुख से निकल कर हमें गुदगुदा जाती है --मुझे या बाल उद्यान के किसी अन्य सदस्य को ई-मेल के ज़रिये भेजिये । हमे उसे प्रकाशित कर प्रसन्नता होगी ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-8207494214287621430?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/8207494214287621430/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=8207494214287621430' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/8207494214287621430'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/8207494214287621430'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/07/blog-post_9007.html' title='ढेला और पत्ती'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-6931395936898988787</id><published>2007-07-26T09:35:00.000+05:30</published><updated>2007-07-26T10:05:45.011+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='किरण BEDI'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='DELHI  COMMISSIONER OF POLICE'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='GENDER DISCRIMINATION'/><title type='text'>मर्दवादी समाज और व्यवस्था का एक और उदाहरण</title><content type='html'>अभी असीमा पर बात करते करते मुद्दे पूरी तरह उठे  भी नही हैं ,पूजा चौहान के प्रतिरोध के प्रतीकों को समझा भी नही गया है कि एक और उदाहरण पेश है मर्दवादी समाज और व्यवस्था का हमारे सामने ‘किरण बेदी’ के रूप मे जो दिल्ली की कमिश्नर बनने की दौड में पीछे धकेल दी गयीं हैं ।‘अ वूमेन हू डेयर्स ‘।डॆयरिंग वूमेन के लिए हमारे समाज के पास गालियाँ और ताने हैं तो व्यवस्था के पास भी अपने हथियार है ।क्योंकि निर्णय लेने की स्थिति जब पुरुष की होगी तो निश्चित रूप से वह व्यवस्था के और अपने हित में एक पुरुष को ही चुनेगा ।आज राष्ट्र की पहली महिला राष्ट्रपति जब कमान सम्भाल रही हैं तो किरण बेदी –देश की पहली महिला आई.पी.एस को देश ने निराश किया है ।असीमा जब मुँह खोलती है तो अकेली पड जाती है ।गालियों और धमकियों की शिकार होती है । क्या मायने यह है कि जब भी पुरुषवादी व्यवस्था मे महिला हिम्मत करेगी तो उसे मुँह की खानी होगी ?मेरी सोच गलत है तो यह भी बताया जाए कि किरण बेदी के साथ हुए अन्याय को हम किस दृष्टि से देखें? क्या यह सर उठाती स्त्री से मर्दवादी व्यवस्था की ईर्ष्या ?? राष्ट्रपति चुनाव में प्रतिभा पाटिल को भी  तो मोहरा बनाया गया है राजनीति का ।इसे महिला-सम्मान और सशक्तिकरण की नज़र से दिखाया जा रहा है ताकि पीछे की राजनीति को ढँका जा सके ।अत्यंत खेद की बात है कि आज तक भी हम स्त्रियों को मोहरा बना रहे हैं या रास्ते से बडी चालाकी से हटा रहे हैं ।डर है अपनी सालो‍ की सत्ता के खोने का ?&lt;br /&gt;याद करना होगा कि यह वही दिल्ली पुलिस है जो लडकियों से छेडछाड को रोकने के लिए अपने विज्ञापनो में समाज के मर्दों का आहवान करती है ।जिस विभाग की मानसिकता समाज की स्त्रियों के लिए ऐसी है वह विभाग की स्त्रियों के लिए क्या सोचता होगा यह अनुमान लगाया जा सकता है ।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/Rqgf2euz6UI/AAAAAAAAAJY/imR76RStWJY/s1600-h/nomen.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/Rqgf2euz6UI/AAAAAAAAAJY/imR76RStWJY/s400/nomen.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5091354399565146434" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;किरण बेदी से दो साल जूनियर युद्ध वीर सिह‍ को दिल्ली का कमिश्नर बनाया गया है ।वे २००९ मे रिटायर होन्गे और किरण बेदी तब तक रिटायर हो चुकी होन्गी । मेरिट और सीनियॊरिटी ---किसआधार पर यह फ़ैसला लिया गया है क्या यह जानने का कष्ट महिला सशक्तिकरण की दुहाई देने वाली सरकार करेगी ? क्या आम जनता को नही लगता कि यहां कुछ गलत हुआ है ?&lt;br /&gt;जब भी यह सोचने की कोशिश करो कि ’सब ठीक ही है शायद ’तभी एक प्रमाण मिल जाता है सब गलत होने का ।अपनी बेटियो‍ को किरण बेदी बनाने के ख्वाब देखने वाले माता-पिता शायद अब कभी ऐसा ख्वाब देखने की बेवकूफ़ी नही करेन्गे । शायद इससे बेहतर वे अपनी बेटी को ऐसे अफ़सर से ब्याहना ज़्यादा पसन्द करेन्गे !!सवाल उठ रहे है‍ लगातार तब तक जब तक कि सवालो‍ का अन्तहीन सिलसिला सत्ता के एकाधिपतियो‍ को आतन्कित न कर दे ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-6931395936898988787?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/6931395936898988787/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=6931395936898988787' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/6931395936898988787'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/6931395936898988787'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/07/blog-post_26.html' title='मर्दवादी समाज और व्यवस्था का एक और उदाहरण'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/Rqgf2euz6UI/AAAAAAAAAJY/imR76RStWJY/s72-c/nomen.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-8636062195563533673</id><published>2007-07-23T10:39:00.000+05:30</published><updated>2007-07-23T12:26:33.926+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='निजता अर्चना'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पूजा चौहान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='असीमा भट्ट'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रिश्ते'/><title type='text'>निजी कितना निजी है और कब तक ?कवि कितना मानव है ?</title><content type='html'>एक बार हमने लिखा था कि पुरुष आमतौर पर एक प्रोग्रेसिव पत्नी नही चाहते। &lt;a href="http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/03/blog-post_08.html"&gt;पत्नी प्रोग्रेसिव अच्छी तो लगती है ,मगर दूसरे की&lt;/a&gt; । किसी व्यक्ति की जिन खूबियों की वजह से हम उससे प्रेम करने लगते हैं ,विवाह के बाद वही हमें अपनी दुश्मन जान पडती हैं ।सो प्रेमिका की प्रोग्रेसिव बातें मनमोहिनी होती हैं, वो लडकी सबसे अलग लगती है जिसे आप पसन्द करने लगते हैं ।वही पत्नी बन जाए तो पुरुष सबसे पहले उसी खूबी को,बोल्डनेस ,स्मार्टनेस, प्रोग्रेसिव थिंकिंग को समाप्त करने की चेष्टाएँ शुरु कर देता है ।विवाह के बाद वह अचानक चाहने लगेगा कि मेरी पत्नी मेरे माता-पिता के पैर छुए,उनकी इज़्ज़त में अपना सर पल्लू से ढँके, मेरे परिवार को अपने कामों पर तर्जीह दे,पलट कर जवाब न दे,शांति बनाए रखने के लिए जो जैसा है उसे वैसा चलने दे । यह स्थिति पत्नियों के साथ भी है ।किसी पेंटर को उसकी कला की वजह से पसन्द किया विवाह किया ,बाद में वही पेंटिंग अपनी सौत लगने लगती है ।&lt;br /&gt;लेकिन यहाँ अंतर इतना आ जाता है कि पत्नी की चाहत और मांगें अपने लिए होती हैं ।अपने परिवार और समाज के लिए नही ।उसे वक्त चाहिये –अपने लिए ।ध्यान चाहिये –अपनी ओर ।कंसर्न चाहिये –खुद के लिए ।परिवार को तो वह छोड ही चुकी होती है ।कई बार विरोध सह कर विवाह करने पर समाज को भी नकार चुकी होती है । इस मायने मे स्त्री पुरुष से ज़्यादा मनोबल और ईमानदार इरादे लिए होती है । परिवार को छोड भी दे कोई पुरुष तो उसका मोह कभी नही छूटता और समाज से उसकी लडाई केवल इच्छा से विवाह करने तक ही रहती है ।विवाह के बाद वह खुद समाज के दबावों मे जीता है और परमपरा सम्मत जीवन चलाना चाह्ता है ।&lt;br /&gt;कोई दो लोग क्यो प्रेम करते है,विवाह करते है ,सम्बन्ध-विच्छेद करते हैं  यह उनका नितांत निजी मसला होता है ।माना ।लेकिन सिर्फ तब तक जब तक कि वहाँ भावनत्मक उत्पीडन ,मानसिक शोषण ,असमानता और धोखा नही है ।दो प्रेमियों का रिश्ता जब केवल स्त्री-पुरुष स्तरीकरण के समीकरण में जीने लगता है तो वह पूरी स्त्री जाति और पुरुष जाति की समस्या हो जाती है ।पिटना –पीटा जाना ,भावनात्मक ब्लैकमेलिंग करना,धोखे मे रखना ,किसी भी स्त्री-पुरुष का निजी मसला नही रह जाता ।असीमा भट्ट को अभिव्यक्ति का मंच मिला यह अच्छा ही है। वर्ना अर्चना जैसी कई लडकियाँ इस ‘निजी ‘के दर्द को कभी अभिव्यक्त नही करतीं और रिश्ते की मर्यादा साथ लेकर घर के पंखे से लटक जाती हैं, बिना एक भी सबूत छोडे दोषियों के खिलाफ । शक ,डर , दबाव ,उत्पीडन को मर्यादा के नाम पर क्योंकर दफ्न रखना चाहिये ?क्या हम केवल आत्महत्या का उपाय ही छोडना चाह्ते हैं स्त्री के लिए ?पूजा चौहान भी अभद्र है ।असीमा रिश्ते के निजी पक्षों को समाज के बीच उछाल रही है ।अगर वे आत्महत्या कर लेतीं तो हम कभी नही जान पाते कि ये दो लोगों के निजी रिश्ते कितने कुरूप हो सकते है ।अर्चना का ज़िक्र &lt;a href="http://masijeevi.blogspot.com/2007/07/blog-post_7899.html"&gt;मसिजीवी &lt;/a&gt;ने अपनी एक पोस्ट में किया था ।अगर वह शर्मसार होने से बचने की कोशिश न करती और पति के दुर्व्यवहार को कभी बयान करती तो शायद उसकी मृत्यु के बाद ही सही ,वह पति सलाखों के पीछे होता ।&lt;br /&gt;एक महत्वपूर्ण बात यह भी । सच अपने सम्पूण रूप मे कुछ नही होता । वह विखंडित है ।सच के कई पहलू होते हैं ।लेकिन इन विखंडित सत्यों के बीच हमें अपने सच का एक चेहरा बनाना होता है । यह सच का हमारा निजी पाठ है ।असीमा का सच अगर सच का एक पहलू है तो भी वह भयानक है । साथ ही वह घुटने –कुढने की बजाय कह देने की राह दिखाता है ।जो किसी हाल में गलत नही है । चुप्पी की परम्परा से कहीं बेहतर है जो आत्महत्या की ओर ले जाती है &lt;br /&gt;एक और बात । सत्य और सौन्दर्य हम सभी देखते हैं । साहित्यकार ही उसे कह पाता है ।क्योंकि वह सम्वेदनशीलता के साथ और भीतरी नज़र से देखता है ।वह कार्यों व्यवहारों को उनके कारण सहित पकडना चाहता है । उसकी सम्वेदनशीलता मानव विशेष के लिए नही सामान्य के लिए होती है । इसलिए उसके लेखन और जीवन में विरोध दिखाई दे तो हमें उसके लेखन ही नही उसकी सम्वेदन शीलता पर भी शक करना होगा &lt;a href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2007/07/blog-post_5012.html"&gt;।अभय जी ने लिखा&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;‘’ यह उम्मीद पाल लेना कि उच्च सौन्दर्य बोध की रचनाएं करने वाला कवि अपने निजी जीवन के हर क्षण में उसी उच्च संवेदना से संचालित होगा और एक अतिमानव की भाँति सारे क्लेश-द्वेष से मुक्त होगा.. ऐसी कल्पना ही कवि की मनुष्यता के साथ अन्याय है.. आखिर कवि मनुष्य ही तो है.. कोई संत तो नहीं..”&lt;br /&gt;बेशक ।वह भी मनुष्य है ।आचार्य रामचन्द्र शुकल ने लिखा था कि कविता का लक्ष्य है ---मनुष्यता की रक्षा करना ।तो हम उस कवि से मानव होने की ही उम्मीद कर रहे है ।वह अति मानव न हो । पर कम से कम अमानवीय तो न हो जाए ।सडक के भिखारी को भीख देना और घर के भीतर नौकर को पीटना ----क्या यह मानवीयता ही है ?&lt;br /&gt;कवि को कम से कम मानव के ओहदे से तो नीचे नही गिरना चाहिये ।&lt;br /&gt;बाकि आगे कहूंगी अभी तो इतना ही ...................&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-8636062195563533673?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/8636062195563533673/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=8636062195563533673' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/8636062195563533673'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/8636062195563533673'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/07/blog-post_23.html' title='निजी कितना निजी है और कब तक ?कवि कितना मानव है ?'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-3780431715004910903</id><published>2007-07-21T09:42:00.000+05:30</published><updated>2007-07-21T10:05:08.497+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी कहानी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भिक्षा  वृत्ति  Hindi story'/><title type='text'>पुल के नीचे</title><content type='html'>अगर मै गलत नही हूँ तो सुदर्शन की कहानी ही है “हार की जीत” ,बचपन मे पढा करते थे ।बाबा भारती का घोडा सुल्तान जिसकी चाह्त मे था डाकू खडक सिँह ।वह कहानी एक कारण से हमेशा याद रह जाती है ।कोढी,भिखारी के भेस मे खडक सिँह जब बाबा भारती को चकमा देकर सुल्तान को ले भागता है तो बाबा कहते है –“मेरी एक विनति सुनते जाओ ! जो तुमने मेरे साथ किया उसका ज़िक्र किसी से न करना । वर्ना लोग किसी असहाय की मदद करने से कतराएँगे ।“ लेकिन खडग सिँह ने किसी से कहा या नही यह तो नही बता सकती लेकिन यह सबको मालूम हो गया जाने कैसे ।आज हम किसी की मदद करने से पहले सौ बार सोचते है ,कोई पतली गली ढूँढने लग जाते हैं।एक किस्म के लोग इस द्वन्द्व में पडते ही नही ।उनकी बहुत स्पष्ट सोच होती है ।एक तीसरी किस्म के लोग ऐसे दृश्य सिर्फ फिल्मो मे ही देखते हैं ।उनकी गाडी कभी उन मोडों से नही गुज़रती जहाँ भिखारियों के झुण्ड हैं ।एक किस्म और है उन लोगों की जो भीख देकर अपने कद को थोडा और बढा महसूस करते हैं ।&lt;br /&gt;दिल्ली के अधिकतर ट्रैफिक सिग्नल भिखारियों के किसी न किसी गिरोह के इलाकें हैं जिनकी हदें और लक्ष्य साफ तौर पर निर्धारित हैं ।मै भयभीत रहती हूँ जब मूलचन्द की रेड लाइट पर रुकते ही दो औरतें गोद में नवजात शिशु और एक हाथ में दूध की मैली –गन्दी-खाली बोतल लिए ,भावशून्य चेहरे के साथ बुदबुदाती हुई तब तक खडी रहती है जब तक आप उसे वहाँ से हट जाने को कह न दें ।इनमें एक को उसकी गर्भावस्था से ही देख रही हूँ ।वह सडक से एक हफ्ता गायब रही ।वापस लौटी एक नन्ही जान के साथ।हैरानी तब होती है जब हरी बत्ती होते ही आप इन्हे लडते-खिलखिलाते अपने अड्डों की ओर लौटते हुए देखें।मै मूलचन्द के इस चौराहे पर रुकने से घबराती हूँ ।मेरे सामने वे नवजात शिशु जो पैदा हो रहे है और सहज ही भिखारियों की नई पीढी मे शामिल हो रहे है :कुपोषित ,सम्वेदना से रहित ,इज़्ज़त और नैतिकता की अवधारणाओं से नितांत अनजान्,विकास की किसी मुख्यधारा मे समाहित हो सकने के किसी भी सम्भावना से परे ,अपराध की ओर प्रेरित ,भूख के दायरे मे सोचने वाले और समाज को गाली भरी नज़रों से घूरते हुए ।शहर के  भूगोल  मे पुलों के नीचे बसी यह “गन्दगी" दिल्ली के सिटी ऑफ फ्लाईओवर्स बनने के साथ साथ एक और समानांतर सिटी की रचना कर रही है जिससे हम बचना चाह्ते है ,जिसे देखते ही हम चेहरे सिकोड लेते हैं । कुछ समय पहले चित्रा मुदगल की कहानी “&lt;strong&gt;भूख”&lt;/strong&gt; पढी थी :मार्मिक ।रोंगटे खडी करने वाली ।एक असहाय स्त्री जिसके पास एक नवजात शिशु के अलावा दो और बच्चे, अस्पताल मे पडा घायल पति है और रोज़गार का कोई ज़रिया नही क्योंकि गोद के बच्चे वाली स्त्री को कोई काम कैसे दे ।वह एक ऐसी स्त्री को अपना बच्चा दिन भर के लिए उधार देती है जो भिखारिन है ।भिखारिन माँ को आश्वासन देती है कि बच्चे को वह दूध देगी ।लेकिन पेट भरेगा तो बच्चा रोएगा कैसे ।वह रोएगा नही तो साहबों के दिल कैसे पिघलेंगे ।सो  दिन भर् वह भिखारिन बच्चे को भूखा रख कर रुलाती और पैसे मांगती ।बच्चे की माँ मजदूरी करके घर मे बाकी बच्चॉ के लिए भोजन जुटाती ।शाम को भिखारिन जब बच्चा लौटाती तब तक वह रो रोकर थक चुका होता और अक्सर सो जाता । एक दिन वह बच्चा लौटा कर जाती है रोती हालत मे ।माँ नही जानती कि वह भूखा है। वह भात की पतीली की ओर बढता है तो वह उसे चंटा देती है ।कई दिन के भूखे शिशु का शरीर सह नही पाता । वह उसे अस्पताल लेकर दौडती है ।लेकिन व्यर्थ!डाक्टरनी कहती है –“बच्चे को भूखा रखती  थी क्या ? उसकी आंते चिपक गयीं ,सूख गयीं ।मार दिया भूखा रख -रख कर ।“&lt;br /&gt;;&lt;br /&gt;;&lt;br /&gt; “भिक्षावृत्ति “यानी भीख मांगना एक पेशा है ।अधिकतर् भिखारी पेशेवर भिखारी हैं और उनके इस पेशे में एक टूल की तरह इस्तेमाल होने वाली मानवीय सम्वेदनाएँ हैं । सवाल बहुत बडे बडे हैं जिन्हे हम उठने ही नही देते। भीख देकर हम वहीं कर्तव्य समाप्त समझते हैं :फिर चाहे वह भीख देने वाले हम हों या खुद सरकार ।राज्य की ज़िम्मेदारी यहाँ समाज की ज़िम्मेदारी से ज़्यादा बडी है । &lt;br /&gt;“&lt;strong&gt;कफन &lt;/strong&gt;“के घीसू-माधव जैसों के बारे में सोचने की प्रक्रिया शुरू करने का जो बीडा प्रेमचन्द ने लिया वह चित्रा मुदगल तक आते आते एक बडी सच्चाई हो जाता है ।लेकिन व्यवस्था वहीं की वहीं है ।समाज और राज्य की संरचना में ये हाशिये पहले से भी ज़्यादा उभर कर दिखाई दे रहे हैं । मानवीय सम्वेदनाएँ खो रही हैं दोनो ओर – भीख मांगने वालों मे और देने वालों में ।‘कफन’ में  प्रसव पीडा में माधव की पत्नी का कोठरी मे उपेक्षित रह कर दम तोडना और बाहर बैठ कर बाप-बेटे का आलू भून -भून कर खाना ,इस डर से उठ कर अन्दर बहू के पास न जाना कि कही दूसरा ज़्यादा आलू न खा जाए -----एक ऐसा घृणित चित्र उभारता है कि पाठक हतप्रभ और अवाक रह जाने के अलावा कुछ सोच नही पाता ।यहाँ मानवीयता शर्मसार होती है ;राज्य –समाज और व्यवस्था प्रश्नचिह्नित होती हैं।प्रेमचन्द लिखते हैं---“जिस समाज में रात –दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी [घीसू-माधव] हालत् से कुछ बहुत अच्छी न थी, और किसानों के मुकाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे ,कहीं ज़्यादा सम्पन्न थे ,वहाँ इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी “ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस समाज और व्यवस्था मे “मजूरी कोई करे और मज़ा कोई और लूटे “वाली स्थिति होगी वहाँ पेशेवर भिखारी और घीसू-माधव कैसे न होंगे ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-3780431715004910903?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/3780431715004910903/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=3780431715004910903' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/3780431715004910903'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/3780431715004910903'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/07/blog-post_21.html' title='पुल के नीचे'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-3446537871533516749</id><published>2007-07-13T12:07:00.000+05:30</published><updated>2007-07-13T12:19:49.463+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='HARRY POTTER  MARKET  BOOK FILM AMERICA MAIN STREAM'/><title type='text'>हैरी पोटर का बाज़ार और फीनिक्स का ऑर्डर !!</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/RpcgaoyzF4I/AAAAAAAAAJQ/SGM-D8A-WY0/s1600-h/harry+potter.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/RpcgaoyzF4I/AAAAAAAAAJQ/SGM-D8A-WY0/s400/harry+potter.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5086569946137433986" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;हरी पुत्तर का बाज़ार फिर से गर्म है और जे के राउलिंग ने इस महान सीरीज़ के आखरी सातवें उपन्यास को 21 जुलाई को बाज़ार मे उतारने का फैसला कर लिया है ।किताब से फिल्म की ओर बढी हरी पुत्तर की क्रेज़ ने मास हिस्टीरिया की स्थिति अख्तियार कर ली है ।जादू और अय्यारी का एक युग शुरु हुआ था चन्द्रकांता के साथ ।उसे बीते एक शताब्दी हो गयी है ।चन्द्रकांता ने आरम्भिक अवस्था के हिन्दी गद्य का बडा उपकार किया था।पर उस तिलिस्म से निकलने मे हिन्दी की रीतिकालीन प्रवृत्तियों को काफी समय लगा कि यहा फिर लौट कर आयी है जादू और फंतासी लेकर हैरी पोटर !पर चूंकि यह पस्चिम का तिलिस्म है सो इसे बकवास नही माना जाए प्लीज़ ! ।ढेर् सारा थ्रिल्ल और एडवेंचर के साथ साथ इस बार हैरी पोटर मे रोमांस को भी एड कर दिया गया है ।यानी 18 वर्षीय हीरो का पहला किस्स ऑर्डर ऑफ फेनिक्स मे मिलेगा ।आखिर हैरी अब बडा हो गया है ।और वैसे भी वह सिर्फ बच्चो की पसन्द नही है बलकि25-26 वर्षीय  युवा भी उसके दीवाने है।शायद उन्ही के लिए यह किस खास तौर से रखी गयी है ।यूँ भी हैरी पिछले 8-10 वर्षो मे युवा हो गया है।तो यह स्वाभाविक ही था ।इसलिए जहा तक यह कहा जा रहा है कि &lt;a href="http://www.hindu.com/2007/07/13/stories/2007071357810100.htm"&gt;यह किताब की फिल्म&lt;/a&gt; जगत पर विजय है तो मुझे कहना होगा कि फिल्म और किताब दोनो का गठबन्धन करने वाले बाज़ार और इसका प्रसार करने वाले संचार-तंत्र की विजय है यह ।  यह दीवानापन ,कहना पडेगा कि साफतौर पर मार्किट जेनेरेटिड है ।जिस देश के लोग सुनीता विलियम्स को ज़बर्दस्ती भारतीय मान कर माथे पर उसका नाम गुदवा सकते है वे बाज़ार या मीडिया जेनेरेटिड किसी भी क्रेज़ मे गर्व से शामिल होते हैं ।हैरी का विज्ञापन करने मे कोई पीछे  नही है ।एच ,टी ने अपना एक पूरा पृष्ठ समर्पित् किया है हैरी को । हैरी पोटर क्विज़ ,हैरी पोटर टी शर्ट ,हैरी पोटर की जादुई छडी ,पोस्टर ...और न जाने क्या क्या 1पूरा बाज़ार हैरी मय है ।हैरी को पढना उसकी शब्दावली से परिचित होना और उसकी लेटेस्ट फिल्म देखना  बच्चो के बीच स्टैंडर्ड का मुद्दा है ।यह अमरीका की मुख्यधारा मे सीधा शामिल हो जाने का सिम्बल है ।आप हैरी पोटर नही पढते तो आप पिछडे हुए ,गंवार आउटडेटिड् हैं ।हम तो अब तक भी मिट्टी के ढेले और आमकी पत्ती की कहानी सुना रहे है । हाफ ब्लड प्रिंस ,वोल्देमोर्ट डम्बल्डोर हर्माइनी  कैसे कैसे नाम !पुनर्निवास कालोनी मे बने  किसी सरकारी स्कूल् के बालक से पूछ लीजिए कौन है हैरी पोटर ?&lt;br /&gt;इतने बडे स्तर पर &lt;a href="http://www.jkrowling.com"&gt;जे के राउलिंग &lt;/a&gt;का बाज़ार मुझे हमेशा से हैरान करता रहा है । क्या वाकई हैरी पोटर एक महान धारावाहिक उपन्यास है ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-3446537871533516749?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/3446537871533516749/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=3446537871533516749' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/3446537871533516749'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/3446537871533516749'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/07/blog-post_13.html' title='हैरी पोटर का बाज़ार और फीनिक्स का ऑर्डर !!'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/RpcgaoyzF4I/AAAAAAAAAJQ/SGM-D8A-WY0/s72-c/harry+potter.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-5201819438637471362</id><published>2007-07-12T13:30:00.000+05:30</published><updated>2007-07-12T13:59:25.131+05:30</updated><title type='text'>अपना ब्लॉग हिट करें !</title><content type='html'>आज तक न जाने कितने लोगों ने हमें अपना ब्लॉग हिट करने के तरीके बताए ।&lt;a href="http://pangebaj.blogspot.com/2007/06/blog-post_24.html"&gt;पंगेबाज&lt;/a&gt; जी ने तो किसी के जूते उधार लेकर और उन्हे दिखा दिखा कर हिट होने के 5 तरीके बताए ।उनके एक तरीके को &lt;a href="http://puranikalok.blogspot.com/2007/07/2007.html"&gt;आलोक जी&lt;/a&gt; पूरी निष्ठा से फॉलो कर रहे हैं। कैसे ?अजी जा कर देखिये आजकल उनकी हर पोस्ट ब्रह्म मुहूर्त में 4 से 6 बजे के बीच प्रकाशित होती है और उनका खिलता चेहरा सारा दिन नारद पर दिखलाई देता रहता है ।और समीर जी ने &lt;a href="http://udantashtari.blogspot.com/2007/04/blog-post_06.html"&gt;‘मान गये कवि&lt;/a&gt; “ को हिट करने का राज़ भी बताया ही था । ऐरी गैरी नही विशेषज्ञों की टिप्पणीयाँ पाने के तरीके भी टिप्पेषणा-पीडितों के लिए &lt;a href="http://raviratlami.blogspot.com/2007/07/want-blog-comments-come-to-me.html"&gt;रवि जी&lt;/a&gt; ने बतलाए है ।इतना ही नही-उनकी इस निस्वार्थ हिन्दी सेवा मे‍--------&lt;br /&gt;"दूसरों के चिट्ठों पर डलवाने हेतु असभ्य, गाली-गलौज वाली टिप्पणियों हेतु प्रीमियम सेवा भी उपलब्ध है."&lt;br /&gt;पर ध्यान रहे------&lt;br /&gt;" इसके लिए ऊपर दिए रेट में ढाई सौ प्रतिशत प्रीमियम लिया जावेगा."&lt;br /&gt; तो ई तो ठहरा महन्गा सौदा ।अब हम भी कुछेक किफ़ायती ,घरेलू नुस्खे बता देते हैं । वैसे बताने नही वाले थे । पर ये नुस्खे भी ब्लॉग हिट करवा सकते है ।क्यों ? तो कद्रदान !मेहरबान ! &lt;br /&gt;* हिट दोप्रकार के उपलब्ध हैं –काला हिट और लाल हिट । काला वाला है मच्छरों के लिए और लाल वाला कॉक्रोचिज़ के लिए ।यू नो ?तो पहले यह डिसाएड कीजिए कि आप किस श्रेणी में हैं ।&lt;br /&gt;@इसका इस्तेमाल बडा आसान है ।अपना ब्लॉग खोलिए ।हिट का कैप हटाइए । स्प्रे कीजिए । ज़्यादा असर के लिए यही क्रिया दोहराइए । *दूसरा हिट करने का तरीका – जितना ज़ोर से हिट करना हो उतना ही दमदार जूता [गोला शू ,भीगा चमडे का जूता , खटारा पनहिया ,या कोमल मन वाले हो तो जनानी जुत्ती भी ले सकते हो ] अब अपना ब्लॉग खोलिए और ‘’’पटैक .............##@@ ज़ोर से हिट करिए ।जितना चाहे उतना हिट करिए ,करते रहिए जब तक कि सबसे ज़्यादा हिट वाले ब्लॉगर न बन जाएँ ।&lt;br /&gt;****इन नुस्खों की खासियत यह है कि ये स्वावलम्बन की प्रेरणा उत्पन्न करते हैं । आपको अपना ब्लॉग हिट करने के लिए किसी की टिप्पणियो की ,किसी लोकप्रियता सूची की ,सक्रियता क्रम की या किसी भी धडाधड स्वामी की ज़रूरत नही पडेगी ।यानी हिटिंग में टोटल आत्मनिर्भरता ! **** आप निश्चिंत होकर”””” ब्लॉगिंग फॉर ब्लॉगिंग सेक”” कर सकते है । किसी से रिश्तेदारी बढाए बिना ,फालतू मे औपचारिअकता दिखाए बिना । केवल वह कह सकते है जो कहना चाहते हैं ।इससे भाई-चारा निभाने की आवश्यकता खत्म  होती है ।&lt;br /&gt;**ब्ळागुनिया -----सारी! ----चिकन्गुनिया से अपने ब्लाग की हिफ़ाज़त करें।&lt;br /&gt;****अब हे हे हे कर के पीठ खुजाने और खुजलाने का निमंत्रण देने की भी आवश्यकता नही । *****चाहें तो पहले छोटा हिट आज़मा कर देखें  75 रु.इंट्रोडक्टरी ऑफर !&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/RpXkq4yzF3I/AAAAAAAAAJI/_MEnOFD3IxI/s1600-h/mosquito+spray.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/RpXkq4yzF3I/AAAAAAAAAJI/_MEnOFD3IxI/s400/mosquito+spray.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5086222779635930994" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; *****जल्दी करें ऑफर सिर्फ टिप्पणी मिलने पर..............&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-5201819438637471362?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/5201819438637471362/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=5201819438637471362' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/5201819438637471362'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/5201819438637471362'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/07/blog-post_12.html' title='अपना ब्लॉग हिट करें !'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/RpXkq4yzF3I/AAAAAAAAAJI/_MEnOFD3IxI/s72-c/mosquito+spray.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-8547790940468838761</id><published>2007-07-08T17:27:00.000+05:30</published><updated>2007-07-08T18:08:43.345+05:30</updated><title type='text'>एक निर्विचार पोस्ट की रेज़गारी...</title><content type='html'>आज के लिए कोई विचार नही कोई विषय नही और कुछ  कहना भी नही बच रहा है । पर जबकि हम सोचते है कि विचार शून्यता हिअ तब भी शायद किसी निर्विकार ,अज्ञेय ,अमूर्त किस्म की विचार प्रक्रिया कही बहुत भीतर  चालू होती है । बिलकुल उसी अन्दाज़ में ,गालिब के शब्दो मे ----&lt;br /&gt;"न था कुछ तो खुदा था   ...&lt;br /&gt; कुछ ना होता तो खुदा होता ..........."&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्लेटो&lt;/strong&gt; ने विचार को सर्वोपरी सत्ता माना था । सो खुदा विचार की ही तरह ..जब कुछ नही होता तब भी रहता है ।उनकी दृष्टि में यह वस्तुजगत उस विचार तत्व की ही नकल है ।और साहित्य आदि कलाएँ इस नकल यानी वस्तुजगत की नकल हैं । सो इतने नकलीपन के बीच यदि खालीपन का अहसास हो तो अस्वाभाविक क्या है :)&lt;br /&gt;तो वाकई जब हमे लगता है कि मन रीता है और मस्तिष्क की सारी शक्ति चुक गयी है ,एक निर्वात की सी स्थिति है तब भी शायद वह अपने आप में एक विचार-विकलता की सी स्थिति होती है। शायद सारा दार्शनिक चिंतन ऐसी दिमागी खालीपन की स्थिति मे उपजता हो .जब हम दीन-दुनिया से बेज़ार होकर जीवन मे अब तक की इकट्ठी हुई रेज़गारी को देखते है ं और एक दीर्घ निश्वास के साथ उसे वापस अपनी गुल्लक में डाल देते हैं :शायद यह सोच कर कि फिलहाल तो इससे कुछ बनने वाला नही है ।:)&lt;br /&gt;आज ऐसी ही स्थिति में मसिजीवी की पोस्ट पर  दिया कमेंट देख कर,और दिन भर की अपनी बातों का विश्लेषण कर  ऐसा लगा कि यह  निर्विचार होना उतना भी निर्वैचारिक नही है ---- &lt;br /&gt;"शर्मसार तो हुए ही है ।चाहे शर्मसार कितने हुए है यह अलग बात है ।प्रतिरोध का यह तरीका भारत जैसे देश के लिए वाकई शॉकिंग था । जहाँ स्त्री को हमेशा से घर की इज़्ज़त का वास्ता दे देकर घर के लोग अपमानित करते रहे उत्पीडन करते रहे उनके खोखलेपन और मानसिक शोषण को धता बताते हुए पूजा का यह प्रतिरोध एक असरकार तमाचा साबित हुआ है । "---&lt;br /&gt;वैसे पूजा का प्रतिरोध एक भदेस किस्म का प्रतिरोध है । जिसमें किसी नारी संगठन को आवाज़ नही दी गयी , प्रेस की शक्ति का सहारा नही लिया गया ,किताबे , कहानिया नही लिखी गयी न पढी  गयीं । उसने किसी अनामिका , जर्मेन ग्रियर, सीमोन दे बोवुआर उमा चक्रवर्ती .....को नही पढा । पढा होता तो शायद ऐसा कभी नही कर पाती।&lt;br /&gt;:&lt;br /&gt;:&lt;br /&gt;:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सो खुदा विचार की ही तरह ..जब कुछ नही होता तब भी रहता है ।आप चाहे तो आज़मा कर देख लें । यह पोस्ट भी इसी प्रयोग का एक नतीजा ही है ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-8547790940468838761?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/8547790940468838761/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=8547790940468838761' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/8547790940468838761'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/8547790940468838761'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/07/blog-post_08.html' title='एक निर्विचार पोस्ट की रेज़गारी...'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-8387738424082598387</id><published>2007-07-04T17:31:00.000+05:30</published><updated>2007-07-04T18:31:39.096+05:30</updated><title type='text'>आइए सर्फ़ोली बोली सीखे‍</title><content type='html'>बी.ए. ऑनर्स के प्रथम वर्ष की परीक्षाएँ समाप्त हुईं तो बहुत सा वक्त एकाएक पहाड सा हो गया था। सोचा द्वितीय वर्ष के पाठ्यक्रम में लगे टेक्स्ट को ही पढा जाए । श्रीलाल शुक्ल का रागदरबारी इसी समय सामने आया । उसकी महिमा सुन तो चुके ही थे  अब होता यूँ था कि वह उपन्यास हमें लत की तरह लग गया । रात मे जब घर के लोग चैन की बंसी बजाते ,हम फूहड हँसी हँस हँस कर उनकी निद्रा मे खलल डालते । डाँट पडी , फटकार लगाई गयी । फिर उन्हे आदत हो गयी । अब मेरे रातों को [जैसे पीपल पर कोई......] ज़ोर से हँसने पर घरवाले कहते ‘रागदरबारी “ पढ रही होगी । खैर,अब बहुत समय हुआ । रागदरबारी का भूत हमें हॉंंट नही करता । पर एक चीज़ है जो यदा –कदा गुदगुदाती है । एक पात्र हुआ करता था रागदरबारी में। जोगनाथ ।पूरा पियक्कड ।एकदम टुन्न रहने वाला ।यदा-कदा नालियों में गिरा पडा मिलने वाला ।उसकी एक विचित्र बोली थी ।गाँव-जवार के लोग उसे सर्फोली बोले कहते थे ।इसका व्याकरण कुछ यों था कि आप एक शब्द के सभी वर्णो के बीच मे र्फ लगाएँगे ।नही समझे न! &lt;br /&gt;एक बार जोगनाथ पीकर नाले में गिरा हुआ था । किसी की मदद की दरकार थी उसे । पडे पडे किसी के आहट सुनाई दी तो जोगनाथ बोला । उधर से किसी ने पूछा ‘कौन है साला ?” जोगनाथ ने उत्तर दिया “ मर्फै हूँ !जर्फोगनाथ ! किर्फ़िस सर्फ़ाले ने यर्फ़हा कर्फ़ाटे गर्फ़ाडे है ?“ मर्फाने यर्फह कि कर्फोन है सर्फाला ?आर्फज भी जर्फब मर्फज़ाक कर्फने का मर्फन हर्फोता है तो हर्फम जर्फोगनाथ को यर्फाद कर्फ लेते है !समझे कि नही ! &lt;br /&gt;कोड भाषा के रूप मे सर्फोली बोली बडी फायदेमन्द है । इसमें भद्दी भद्दी बाते आराम से कही जा सकती है ।क्यो ?इसके बोलने मे बडा मज़ा है । उससे ज़्यादा मज़ा जो कुछ लोगो को मा बहन करने मे आता है ।यह भी भाषा की एक अंगडाई है .प्रयोग है ,विभिन्नता है ।सो भाषाई नवीनता और प्रयोगशीलता के लिए एक ही तरफ क्यो बढना चाह्ते है। &lt;br /&gt;साहित्य में भाषा की विभिन्न भंगिमाएँ और शब्दावलियाँ एक वातावरण विशेष को जीवंत और यथार्थ बनाने के लिए आती है । गाली एक भाषिक संरचना है । और सामाजिक संरचना की ही तरह है । यदि समाज स्त्री-विरोधी ,दलित-विरोधी है तो भाषा मे उसके प्रमाण भी है । गालियो के समाजशास्त्र को देखे तो यह और स्पष्ट तौर पर समझ आएगा ।ऐसे मे एक दलित या स्त्री या किसी भी हाशिये की अस्मिता द्वारा जब अपने अनुभवों की अभिव्यक्ति होगी तो भाषा के सारे मर्दवादी ,ब्राह्मणवादी तवर वहा उपस्थित होंगे जिनका उद्देश्य लेखक द्वारा अपनी भडास निकालना नही होता वरन .उस वातावरण को सजीव करना , उस पात्र विशेष की मानसिकता को उभारना होता है ।यदि मुझे स्त्री निन्दक और शोषक पात्र को किसी कहानी में रचना होगा तो मै उस पात्र के मुख से वही भाषा कहलवाऊंगी जिसका इस्तेमाल मोहल्ला पर हाल ही मे हुआ है ।व्यक्तिगत पत्राचार ,निबन्ध ,लेख सार्वजनिक औपचारिक लेखन मे ऐसी च्युइंगम-वाली भाषा सरासर बदतमीज़ी है , राजनीती है , कुंठा है , कुत्सित है ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-8387738424082598387?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/8387738424082598387/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=8387738424082598387' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/8387738424082598387'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/8387738424082598387'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/07/blog-post_9644.html' title='आइए सर्फ़ोली बोली सीखे‍'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-5456687977150263573</id><published>2007-07-04T11:18:00.000+05:30</published><updated>2007-07-04T12:19:19.255+05:30</updated><title type='text'>टुईयाँ गुईया  ढेम्पूला की चुईयाँ</title><content type='html'>बच्चा शब्दों से खेलता है ,अपने अनुभवों को प्रस्तुत करता है ,पडताल और तर्क करता है।&lt;br /&gt;पैदाहोने के साथ ही भाषा से उसका परिचय होता है ।शुरु शुरु मे बोली जाने वाली जितनी भी ध्वनियाँ और शब्द होते है ;उनका अर्थ भले ही वह न जाने पर धीरे धीरे उसके लिए वे महत्वपूर्ण हो जाते है ।और अनुभावों के साथ साथ उसका भाषा का दायरा भी बढता है और लचीलापन भी आता है ।वह भाषा के मामले में प्रयोगशील होता है । आप उसे कविता सिखाएँगे ---&lt;br /&gt;Papa darling ,mamma darling ,&lt;br /&gt;I love u &lt;br /&gt;See your baby dancing &lt;br /&gt;Just for you…&lt;br /&gt;-वह अगली बार उसमे खुद से जोड देगा &lt;br /&gt;papa darling, mamma darling,maasi darling , anupam darling ,nani darling&lt;br /&gt;I love you…..&lt;br /&gt;तो जितने भी सम्बन्ध उसे प्रिय हैं वह उन सब को लाएगा कविता के बीच ।यह जुडाव है ,अभिव्यक्ति है ,भावनात्मकता है । पापा का चश्मा गोल गोल की जगह जब मैने एक  बच्चे को पापा का चश्मा रेक्टैंगल [पिता का चश्मा वाकई आयताकर लेंस वाला था ] कहते सुना तो समझ  आया कि भाषा उसके लिए तर्क भी है । वह रेक्टैंगल शब्द से परिचित न होता तो यह तर्क नही कर सकता था ।&lt;br /&gt;तुतलाने वाले बच्चे के लिए भी भाषा और ध्वनियाँ तक भी खेलने खुश होने का साधन है ।वे अपने मन से कुछ भी अटपटा गाते कहते हैं ।ऐसे ही बच्चे जो अभी भाषा और अर्थ नही जानते ,बस ध्वनि से हुलसते है ,के लिए एक कबीलाई लोकगीत प्रस्तुत है जिसका अर्थ उनके लिए महत्वपूर्ण नही । यह उनके खेलने और खिलखिलाने का गीत है जैसे – अक्क्ड बक्कड बम्बे बो ,.......सौ मे लगा ताला चोर निकल के भागा। &lt;br /&gt;लोकगीत और विस्तार से पोस्ट पढने के लिए &lt;a href="http://baaludhyan.blogspot.com/"&gt;बाल उद्यान &lt;/a&gt;पर जाइए जिसका अभी नारद पर पन्जीकरण नही हुआ  है ।कल ही गिरिराज जोशी जी ने हमसे यहा लिखने को कहा तो हमने सोचा कि आप सब इसे पढ पाए और प्रतिक्रिया दे सके ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-5456687977150263573?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/5456687977150263573/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=5456687977150263573' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/5456687977150263573'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/5456687977150263573'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/07/blog-post_04.html' title='टुईयाँ गुईया  ढेम्पूला की चुईयाँ'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-4433234947924211276</id><published>2007-07-02T13:07:00.000+05:30</published><updated>2007-07-02T14:48:55.275+05:30</updated><title type='text'>कॉफी सुन्दर और सजीली ...और हमारी फूहडता</title><content type='html'>&lt;!--chitthajagat claim code--&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.chitthajagat.in/?claim=tuzv4zg84yed" title="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी"&gt;&lt;img src="http://www.chitthajagat.in/images/claim.gif" border="0" alt="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" title="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी";&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;!--chitthajagat claim code--&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/RoiupmFzgrI/AAAAAAAAAJA/IXdnnPL4sOY/s1600-h/coffee.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5082504209110368946" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/RoiupmFzgrI/AAAAAAAAAJA/IXdnnPL4sOY/s200/coffee.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;दो चीज़े है जिनमे‍ हम फूहड ही रह गये । एक है पीना और दूसरा तकनीक ।&lt;br /&gt;काकटेल के बारे मे जब&lt;a href="http://food.wanderer.in/2007/05/24/welcome-to-my-bar/"&gt; समीर जी की पोस्ट &lt;/a&gt;पढी तब भी बडी ग्लानि हुई ।हमे तो सीधी –साधी शराब ही समझ नही आती काकटेल जैसा गडबड झाला क्या खाक समझ आता ? जिन्हे पीने की तमीज़ न हो उनसे पीने के विषय मे‍ बात करना अइसा ही है जैसा कि फुरसतिया जी को अपनी व्यस्तताओ‍ के बारे मे बताना :)&lt;br /&gt;पीने की अनपढता हमे काफी पीने मे भी है यह पिछली ब्लागर मीट मे अमित से मिलकर लगा । । आज तक बस दो ही कॉफी जानी है –अच्छी कॉफी / बुरी कॉफी ।{ वैसे कैफे कॉफी डॆ का बिना पानी वाला वाश रूम भी हमे भूला नही है । अगली मीट पास आ रही है इस लिए नॉस्ताल्जिया हमारे जिया मे हिलोर ले रहा है }&lt;br /&gt;पहले सोचते थे कि काफी की बारीकियों को जाने बगैर भी मै खुशहाल जीवन जी पा रही हूँ तो।सैकडो लोग जी रहे हैं ।ज़िन्दगी पहले ही उलझी पहेली है ;मुई कॉफी भी इस घाल मेल मे शामिल हो गयी तो जीना दुश्वार हो जाएगा । अमूमन हम ऐसे तर्क अपनी अज्ञानता या आलस्य को छुपाने के लिए गढ लेते है । सो प्रमादवश हमने कभी शराब और कॉफी की किस्मों और उन्हे पीने की तहज़ीब पर कभी गौर नही फरमाया था । इसी का नतीजा एक दिन भुगत लिया । ठंडी के मौसम में कॉफी पीने की हुडक उठी । कैफ़े कॉफी डॆ पहुचे । कॉफी मांगने पर पूछा गया “कौन सी कॉफी ?” सवाल जटिल था ।एस्प्रेस्सो कुछ सुना सुना नाम था सो मांग ली हमने ।हमारी भोली सूरत पर कॉफी डे वाले को तरस आया और उसने पूछ डाला “आर यू श्योर मैम ?”&lt;br /&gt;हमने भी अकड कर कहा “येस” और उसकी तरफ तुनक कर देखा । हँह ! जैसे हमे इतना भी नही पता कि एस्प्रेसो किस चिडिया ...कॉफी ..का नाम है । वह खीसे निपोरते गया और वापस आया । हाथ मे छोटी सी प्याली ,आधी भरी हुई एक काले ,गाढे , कडुवे द्रव्य से । बस क्या ? काटो तो खून नही । या खुदा ! आज 50 रु. मे ऐसी कॉफी लिखी थी नसीब में क्या यही है तेरी भक्ति का फल ?! अबोध ,मासूमो के लिए यही है तेरा न्याय ? तो ठीक है । हम उपहास स्वरूप दी हुई तेरी चीनी भी ठुकराते हैं । हा !! हमने चीनी का पाउच डाले बिना ही वो ज़हर का प्याला दो बडे घूंटो मे खाली किया और 50 का पत्ता साफ करवा कर फूट लिए वहा से ।अब उतने अबोध तो नही रहे पर फिर भी अपने हाथ की बनी, कम चीनी वाली नेसकाफे ही हमे भाती है।&lt;br /&gt;आज फिर से हमे हमारी कॉफी अज्ञानता बडी शिद्दत महसूस हुई जब सजीली और सुन्दर कॉफी &lt;a href="http://akshargram.com/pratibimb/?p=102"&gt;प्रतिबिम्ब&lt;/a&gt; पर रखी देखी । न जाने किन सामग्रियो और विधियो का वर्णन किया है अमित जी ने । वे कौन से नट्स है ? हा हेज़लनट्स आप कहोगे आप खुद ही नट्स हो जी । तो नट्स तो हम है ही । कॉफी वाले न सही ।हमारा तो जीना ही व्यर्थ जा रहा है ।हमे तो बस यही साधु वाणी याद आ रही है ---- जनम तेरा ब्लॉगिंग ही बीत गयो , रे तूने कबही ना कॉकटेल पीयो ,रे तूने कबही ना कैपेचिनो पियो .....रे साधो !!!! &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कॉफी का प्याला प्रतिबिम्ब से साभार !&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;तकनीकी फूहडता पर नही लिख रहे है वामे हमारी फूहडता का परमान हमरा बिलाग है ही न!&lt;br /&gt;। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-4433234947924211276?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/4433234947924211276/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=4433234947924211276' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/4433234947924211276'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/4433234947924211276'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/07/blog-post.html' title='कॉफी सुन्दर और सजीली ...और हमारी फूहडता'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/RoiupmFzgrI/AAAAAAAAAJA/IXdnnPL4sOY/s72-c/coffee.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-7839102576513477653</id><published>2007-06-30T11:23:00.000+05:30</published><updated>2007-06-30T11:27:47.848+05:30</updated><title type='text'>कृपया अनदेखा करें ...........</title><content type='html'>ओह तो आपने अनदेखा नही किया ? देख ही लिया । और पढ भी रहे हैं ! अरे रे रे !&lt;br /&gt;वैसे मुझे पता था कि कोई तो ज़रूर देखेगा ही ।मानव की सहज जिज्ञासु प्रवृत्ति में मेरा पूरा विश्वास है ।अनदेखा करने को कहा जाए तो ज़रूर देखेंगे । बहुत दिन से देख रही थी की लोग बाग लिखते हैं “परीक्षण् पोस्ट ; कृपया अनदेखा करें “अभी दो दिन पहले रतलामी जी ने डाली थी । कल नीलिमा जी ने । मुझे रह रह कर मन होता था कि देख ही डालूँ क्या है । और नही तो यह ही पता लगेगा कि क्या परीक्षण किया है ।रतलामी जी की भी पोस्ट नही देखी । मन मसोस कर रह गयी । कुलबुलाहट मची रही ।जैसे पडोस में पडोसी का पडोसी से झगडा हो और मै उपस्थित ना हूँ । या घर में सास -ननद मेरे चुगली कर रही हों और मुझे सुन नही पा रहा हो । या माँ- बाप कमरे में टी- वी बजा रहे हों और बालक को डाँट कर पढने बैठा दिया हो दूसरे कमरे में ।&lt;br /&gt;तो फैसला लिया कि एक हिट ही तो होगी , चल देख ही डाल ,क्या अनदेखा करने को कहा गया है ।&lt;br /&gt;देख लिया । ऐसी राहत मिली जैसी किसी कब्ज़ियाये को हफ्ते भर बाद मिली हो । अब चित्त शांत है मन प्रसन्न् है ,निर्द्वन्द्व है ।&lt;br /&gt;ऐसी हालत हमारी ही नही थी । नीलिमा जी की  दो परीक्षण पोस्टो पर अभी तक कुल मिलाकर 30 हिट्स हो चुकी है ।मै समझ सकती हूँ !&lt;br /&gt;तभी विचार आया कि कुछ  भाई -बहिनी लोग यौन शिक्षा को न देने के पक्ष में डटे है तो यह तो यह बिल्कुल हमारे जैसी स्थिति हो जाएगी । मत दीजिये ज्ञान ,बालक-बालिकाओं को । सूचना क्रांति का युग है । ज्ञान का विस्फोट हो रहा है । तकनीक का प्रसार हो रहा है । बताइये ,रिलायंस वाले इस बार बुध –बाजार मे रेहडी लगा कर 200 रु. में मोबाइल बेच रहे थे । सो , सूचना किसी की ज़रखरीद लौंडी तो है नही जो ताले में बन्द कर के रख लेगा ।उस पर किसी की मल्कियत नही है । यहाँ छुपाओगे वहाँ मिल जाएगी । न जाने किस रूप में । पोर्न साइट्स है , किताबें , बातें ,सबसे बडा तो टीवी ही है । सो सूचना और तकनीक नही रुक सकती । किस रूप में दिया जाये सिर्फ इस पर आप नियंत्रण रख सकते हैं ।&lt;br /&gt;और यूँ भी लडकियों के प्रति हमारा समाज अधिक क्रूर है ।खास तौर पर निम्नवर्गीय समाज में लडकियों के लिये कुछ तथ्य जानना , कुछ कुंठाओं से मुक्त होना  कुछ मिथो से बचना और स्वस्थ जीना सीखना निहायत ज़रूरी है ।उन को यह समझाने की भी ज़रूरत है कि एक गलती पर ज़िन्दगी खत्म नही होती ।अपने घरों में ऐसे अन्धेरे कोने क्यो रचे जाएँ जहाँ पडे हमारे किशोर किशोरियाँ अपनी कुठाओं की ग्रंथियों में गर्क होते रहें ।&lt;br /&gt;कितना बताया जाए ,क्या बताया जाए और कौन बताए यह जानना ज़्यादा ज़रूरी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-7839102576513477653?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/7839102576513477653/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=7839102576513477653' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/7839102576513477653'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/7839102576513477653'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/06/blog-post_30.html' title='कृपया अनदेखा करें ...........'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-3487199517066485066</id><published>2007-06-29T18:41:00.000+05:30</published><updated>2007-06-29T21:36:07.617+05:30</updated><title type='text'>दर्पण मेरे ये तो बता ......</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/RoUeoGFzgqI/AAAAAAAAAI4/m9zWCcw14R8/s1600-h/woman.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5081501428736033442" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/RoUeoGFzgqI/AAAAAAAAAI4/m9zWCcw14R8/s320/woman.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;स्नोव्हाइट कीकहानी&lt;/span&gt; तो सुनी होगी ? उसकी सौतेली माँ स्नोव्हाइट के सौन्दर्य से ईर्ष्या करती थी और उसे मरवाने के भरसक प्रयास करती थी । अपने जादुई दर्पण से वह पूछती रहती थी –“दर्पण मेरे ये तो बता , सबसे सुन्दर कौन भला ?” उत्तर में सुनना चाहती थी अपना नाम । पर दर्पण कभी झूठ बोलता है भला ? वह बिन्दास कहता था –‘स्नोव्हाइट “! सो हमने मान लिया कि दर्पण झूठ नही बोलता । तथ्य स्थापित हो गया । वैज्ञानिक इसे नही मानेंगे । मै भी नही मानती । खुद देख रखे हैं ऐसे दर्पण जो बहुत मोटा { समीर जी जैसा :)स्माएली लगा दी है समीर भाई ) बहुत पतला (मसिजीवी जी जैसा, स्माइली नही लगाइ गयी है ) बहुत लम्बा , बहुत ठिगना , बहुत दूर [जीतू जी की तरह ] या बहुत पास [यह नही बतायेंगे ] दिखा कर आपको हँसा सकते है , रुला और चौँका सकते हैं ।&lt;br /&gt;खैर दर्पण एक और भी रहा । पच्छिम । पूरब का दर्पण । दर्पन झूठ नही बोलता । सो पच्छिम ने भी पूरब के बारे में कभी नही बोला ।पच्छिम का दर्पण जिज्ञासु था । पूरब में आया । देखा भाला ,घूमा फिरा । यहाँ का इतिहास लिखा सबसे पहले । साहित्य का इतिहास लिखा सबसे पहले क्या नाम था ...अम्म्म...”... एस्त्वार द ला लित्रेत्युर एन्दुई ....ब्ला ब्ला ह्म्म । यहाँ क्या किसी को एतिहास लिखना आता था कभी ।&lt;br /&gt;तो जी । क्या हुआ कि । वे घूमे फिरे । फिर लिखा । {व्यापार और शासन तो किया ही} और लिखा यह कि ये तो जी जादू –टोना-टोटका करने वाले ,देसी , गँवार ,अन्धविसवासी ,आस्था भक्ति वाले , इर्रेसनल , वगैरा वगैरा वाले लोग है पूरबिया लोग ।&lt;br /&gt;ठोक बजा कर कहा ।तो लो जी एक और कहानी याद आ गयी कि अंग्रेज़ी की किताब में “स्टोरीज़ रीटोल्ड “मेँ हुआ करती थी । एक गाँव था । जहाँ किसी को यह नही पता था कि दर्पण क्या होता है । कभी किसी ने दर्पण नही देखा था । वही किसी बुडबक को मिल गया रहा शीशा । उसने देखा । चकमक पत्थर जैसा । उसमे किसी दाढी वाले आदमी को देख संत समझ लिया और घर ले जाकर छुपा दिया । रोज़ खेत पर जाने से पहले अपना चेहरा ,यानी संत के दर्शन करता और तब जाता । पत्नी का खोपडा घूमा । पीछे से एक दिन ढूंढा कि पति किसे निहार कर जाता है । शीशा देखा । सुन्दर स्त्री दिखी । बस सियापा और क्या ?&lt;br /&gt;तो पूरब ने कभी अपनी व्याख्या अपने मुँह से कर के अपने आप नही बताया था । ना खुद अपना विसलेसन कभी किया था –कि मै क्या हूँ ,कैसा हूँ वगैरा । तो जब इतिहास लिखे गये पूरब के बारे में , उपन्यास लिखे गये ,तबही पच्छिम के आइने ने संसार भर को भी और पूरब को भी उसका प्रतिबिम्ब दिखाया । अनपढ , गवाँर , अन्धविसवासी ,व्रत त्योहार वाले , असभ्य । अब दर्पण तो झूठ नही बोलता ।तो पूरब वाला मानने लगा कि यही सच है । यही इमेज है । अब तो बुडबक खुदही अपना प्रचार करने लगा वैसे ही जैसा पच्छिम ने कहा कि वह है । पूरब ने आत्मसात कर लिया इस छवि को और इसी को बनाए रखने मेँ ऊर्जा लगाने लगा ।&lt;br /&gt;सो ई है दर्पण की कहानी । एडवर्ड सईद&lt;strong&gt; का “ओरियंटलिज़्म “ ।&lt;/strong&gt; सरलीकृत अन्दाज में ।यह उद्देश्य नही । ओरियंटलिज़्म माने प्राच्यवाद माने पच्छिम के प्राच्यविदो द्वारा पूरब को दिखाया गया आइना ।प्राच्यविद । ध्यान दीजिये “प्राच्यविद “।&lt;br /&gt;तो जब हमने बात की थी रसोई नष्ट करने की मतलब सिर्फ यह था कि इस मुद्दे पर क्रांति की ज़रूरत है । स्त्री पक्ष की सत्ता है रसोई ,वही नष्ट कर सकती है । हालाँकि मै मानती हूँ कि रसोई को सत्ता मानना भी स्त्री का बुडबकपना है ।&lt;br /&gt;तो रसोई नष्ट करने की बात पर स्त्री के इस रसोई –सत्ता के मालकिन रूप का बडा महिमामंडन किया गया । तब ही सोचा था कि कुछ समझा दें बालकों को , ज्ञान की राह दिखा दें ।पर क्या है कि बिना बडे- बडे नाम लिये लोग बात नही सुनते । सो एडवर्ड सईद का रसोई संसकरण यह बनाया है हमने कि&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;****स्त्री ने कभी अपनी व्याख्या नही की । वह महान है । वह उद्देश्यो के भटकाव में , पुरुष की तरह समय नष्ट नही करती । वह सृजन करती है । मौलिक सृजन ।कभी यह सृजन रसोई में होता है कभी गर्भ में । वह जीवन में रस और रंग लाती है {किसके ? अजी बैचलरों के !} जीवन को व्यवस्था देती है , सुचारू रूप से चलाती है {आपको समय पर खाना पीना ,कपडा -लता प्रेस किया हुआ ,रति ,संतान,संतान का होमवर्क ,माता पिता की सेवा, बहनों को मेवा सब समय पर कोई देता रहे तो जीवन सुचारू रूप से नही चलेगा भला? } फिर पितृसता कहे कि वह महान है । कुछ नही माँगती , क्षमाशील है , तपस्विनी है , ममतामयी है । ब्ला ब्ला ब्ला .........&lt;br /&gt;जब इतना चढाओगे , चने के झाड पर, तो बेवकूफ तो बनेगी ही निश्चित तौर पर ।&lt;br /&gt;कहोगे” तुम्ही तो हो जो सब सम्हालती हो “ और लम्बी तान कर सो जाओगे तो तारीफ के बोझ की मारी रात देर तक जाग सुबह के व्यंजनो ,ऑफिस –स्कूल के कपडों को सहेजेगी ही ।&lt;br /&gt;“बडी बहू बडी सीधी है जी । आज तक पलट कर जवाब नही दिया । चाहे मै कुछ भी कहती रही । बडी भोली है “” बस यही दर्पण है । तुम सीधी हो । गलत बात का विरोध नही कर सकतीं । बना दिया मूल्य । अब कैसे ना करे तदानुरूप आचरण । भोला होना ,अबोध होना एक गुण हो गया ।&lt;br /&gt;तो दर्पण झूठ ना बुलाए । पितृ सत्ता यही आईना स्त्री को दिखा -दिखा कर अब तक बुद्धू बनाती आयी है । जब दर्पणो की असलियत कोई स्त्री जान जाती है तो खतरे की घंटी बज जाती है स्त्रीविदों के लिए । स्त्रीविद । प्राच्यविद । इस तरह की बात करके आप भविष्य निधि की तरह निवेश कर रहे होते हो । एक बार इमेज बना दो फिर हर साल प्रीमियम भरो---“ मुझे बस तुम्हारे हाथ का खना ही अच्छा लगता है । “ और पाओ ढेर सारा इंश्योरेंस और पॉलिसी मैच्योर होने पर ढेर सारा कैश । बल्ले बल्ले !!&lt;br /&gt;सो इस मनोवैज्ञानिक निवेशीकरण को समझा जा रहा है मी लॉर्ड !!!!!&lt;br /&gt;स्त्री आज खुद को समझ सकने और अभिव्यक्त कर सकने में सक्षम हो रही है । उसे धीरे -धीरे इस आइने को तोडने के लिए तैयार होना है जो आज तक उसे पितृ सत्ता के पुजारी पुरष और स्त्रियाँ दिखाती आयीं है ।&lt;br /&gt;******&lt;br /&gt;सो दर्पण भी षड्यंत्रकारी हो सकता है , वह झूठ बोल सकता है , चाल चल सकता है । वह किसके हाथ में है और किसे दिखाया जा रहा है यह सोचना ज़रूरी है इससे पहले कि उस पर विश्वास करने चलें । &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;मै स्त्री ।मै जननी । महान । मै मौलिक सृजन कर्ता । मै पगली । मै ममतामयी । मै क्षमाशील । मै साध्वी कि सती । व्रती उपासी । सरल । हिसाब किताब में कमजोर ।त्रिया चरित्र । सडक पर कार लेकर नाक में दम करने वाली , पहले सूरजमुखी फिर ज्वालामुखी ।ज़िद्दी । ज़ोर ज़ोर से हँसने वाली । जो भी हूँ । खुद हूँ । खुद रहूँ । खुद जानूँ ।खुद देखूँ । कोई और मेरा आईना [ ।स्त्रीविद !] क्यो हो ?&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8991622950326641568-3487199517066485066?l=bakalamkhud.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/feeds/3487199517066485066/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8991622950326641568&amp;postID=3487199517066485066' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/3487199517066485066'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8991622950326641568/posts/default/3487199517066485066'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bakalamkhud.blogspot.com/2007/06/blog-post_29.html' title='दर्पण मेरे ये तो बता ......'/><author><name>सुजाता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10694935217124478698</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/SKuPvxCxxRI/AAAAAAAAAM0/Icofo36qir0/S220/my+foto.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_2nkzWCf_WxQ/RoUeoGFzgqI/AAAAAAAAAI4/m9zWCcw14R8/s72-c/woman.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8991622950326641568.post-6271850776992766782</id><published>2007-06-27T17:45:00.000+05:30</published><updated>2007-06-27T17:48:40.534+05:30</updated><title type='text'>यहाँ हिन्दी बोलने पर जुर्माना है जी !</title><content type='html'>तो हम सब ब्लौगिये यह सोचते रहे है कि हम नेट पर हिन्दी का प्रचार प्रसार कर रहे हैं। अंतर्जाल पर हिन्दी युवा हो रही है और इधर हिन्दी के देश में युवा होती पीढी को हिन्दी बोलने पर चुकाना पड रहा है फाइन !! जी हाँ ! हमारे देश के अधिकांश पब्लिक स्कूल यह सज़ा अपने छात्रो
