Thursday, March 13, 2008

अहा ! सोना !! कितना आह्लादकारी !!


अहा ! सोना !! कितना आह्लादकारी है !!बरसों से सोच रही हूँ जैसे द्विवेदीयुगीन {ठीक से याद नही आ रहा नाम }एक लेखक के लेख है -"दाँत", "हाथ","नाक""कान" ...... या शुक्ल जी के ही "लोभ और प्रीति" "भक्ति -श्रद्धा" वैसे ही मै अपने प्रिय विषय "नींद" पर लिख डालूँ कुछ तडकता -फडकता । जैसा कि मेरा ब्लॉगर प्रोफाइल कहता है - सोना मेरा एक शौक है ।जब और कोई काम न हो मुझे सिर्फ और सिर्फ सोना पसन्द है {वैसे जब बहुत काम हो तब भी मेरा यही मन होता है कि सो जाऊँ } खैर ,मैं ऐसी बडी सुआड {लिक्खाड की तर्ज पर} हूँ यह मैने औरों से ही जाना है । होश सम्भालते -सम्भालते यह मेरे बारे मे प्रसिद्ध हो चुका था कि मुझे जब भी जहाँ भी कहा जाये कि -चलो सो ओ । तो मै बिना एक पल भी देर किये सो जाऊंगी । एग्ज़ाम के दिनों जब तपस्या कर रहे होते थे एक आसन पर विराज कर, झाड -झंखाड की भांति आस-पास पुस्तकें फैला कर ,तो बडी कोफ्त होती थी रात में सबके सो जाने के बाद । मन से गालियाँ फूट पडती थी हर एक व्यक्ति के प्रति जो कहता था - "हम सोने जा रहे हैं ,गुडनाइट ! ठीक से पढना ।" रात के एक डेढ बजते बजते किसी के उठने की आहट होती तो बरबस मन चिल्ला पडता था ---"अरे ! कोई तो आकर कह दो ,बेटा अब सो जा बहुत पढ लिया ।" हँह !! एम. ए. मे लेकचर अटेंड नही कर पाती थी {ये और बात है कि अब लेक्चर देने में बडा आनन्द आता है}। हद तो यह थी कि मुझे अपने बस्ते में टॉफी , काजू . मिसरी ,इलायची वगैरह रख कर ले जाना पडता था कि जब भी लेक्चर सुनते- सुनते नीन्द अने लगे मुँह चलाना शुरु कर दूँ । जैसे मच्छर "ऑल-आउट " के आदि हो जाते हैं और ऑल -आउट के सर पर ही मंडराने लगते हैं , मेरे ऊपर मंचिंग का उपाय बेअसर होने लगा । मैने क्लास करना बहुत कम कर दिया ।यूं ही पढाई की । टॉप-शॉप भी किया पर सोने की ललक मन में हर पल मचलती थी ।

फिर नीन्द को करारा झटका लगा जब संतान ने जीवन में प्रवेश किया । यह मेरी नीन्द पर कुठाराघात था । जब नन्हा शिशु दुनिया में आया मैने उस पर एक नज़र डाली । बस!! काम खत्म !! और सुख की लम्बी नीन्द में कई दिन के लिए एक साथ डूब जाना चाहा । {एक माँ की ऐसी स्वीकारोक्ति बडी पतनशील है न! } मुझे बहुत दिन तक बच्चा अपना प्रतिद्वन्द्वी लगता रहा । कमबख्त सारी रात जगता और सुबह जब घर के सारे काम मुँह बाये खडे होते वह चैन की नीन्द सोता और हम काम करते । क्या कहूँ ,मेरी नीन्द पर किसी और की नीन्द भारी पडने लगी । किसी भी और माँ की तरह मुझे भी यह स्वीकार कर लेना पडा कि मेरे "मैं" से ऊपर किसी और का "उँए -उँए... " है ।
नौकरी करते ,सुबह तडके उठ रसोई निबटाते ,तीन बार बस बदल कर हाँफते-हाँफते ऑफिस पहुँचते , पढाई भी साथ -साथ करते ,यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी से लौटते लौटते ,शाम को खाना बनाते और सबको खिलाते ,बच्चे को सुलाने के लिए बिस्तर पर धम्म से लेटते -लेटते यह हालत हो जाती कि अनायास मुख से निकलता था कि -

"ओह ! मैं कितनी खुशनसीब हूँ कि मुझे सोने को मेरा बिस्तर मिला और अटूट गहरी नीन्द !!"

पिछले दो-तीन दिन से एक प्रोजेक्ट के चलते नीन्द की शामत आ गयी थी । कल दिन भर से सर भन्ना रहा था और आँखों के आगे बस बिस्तर घूम रहा था । लोक-लाज का भय मिटाकर एक झपकी मैने कल के सेमिनार में कुर्सी पर बैठे -बैठे ले डाली । पर "ऊँट के मुँह में जीरा "साबित हुई। एक घटिया ,लकडी के फट्टे वाली कुर्सी पर भला क्या आराम मिलता । उलटा हाड-गोड दुख गये ।
घर पहुँच कर देखा सासू माँ ऑलरेडी थकान के कारण बीमार- सी पडी थीं । सर बस अब ज्यूँ फटा चाहता था ,आँखे बस अब बन्द हुआ चाह्ती थीं ,मन चीत्कार करना चाह्ता था ,लेकिन बेटे का स्कूल का होमवर्क कराना था ,सबको खाना खिलाना था । बहुत कर्म निबटाने थे । अंतत: डिस्प्रिन खा कर ,सर पर दुपट्टा बान्ध कर जब लेटी तो फिर मुँह से यही निकला -
"आह !! नीन्द कितनी आह्लादकारी है । कितनी अपनी है । कितनी सच्ची है । कितनी ज़रूरी है । मुझे दुनिया से छीन ले जाती है ,कहीं दूर ......परे ....बस मैं होती हूँ .....और नींद ...मेरे भीतर चुपचाप बहती सलिला सी ......जिसके किनारे पाँव डुबाये ,अकेली बैठ मैं जाने कितनी सदियों के लिए ऊर्जा समेट लेती हूँ ........."

14 comments:

ajay kumar jha said...

sujata jee,
sheershak dekh kar to mujhe aisaa lagaa ki aap bhee anya mahilaaon kee tarha sone chandi heere moti aur gehno par kuchh kehne waalee hain magar jaise hee post par nazar padee aur aaraam farmaate swhan ko dekha to kya kahoon.......

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

अपनी बात को कहने का आपका सलीका लाजवाब है। मैं आपके इस हुनर को सलाम करता हूँ।

अनिल रघुराज said...

सुजाता जी, मेरी भी प्रोफाइल में जमकर सोना खास शौक के तौर पर दर्ज है। हर दिन सोते वक्त आप मौत के आगोश में जाने का अहसास करते हैं। इसलिए मुझे मौत से ज़रा सा भी भय नहीं लगता।
वैसे, आपसे अनुरोध है कि 'इन्हें भी देखें' में हिंदुस्तानी की डायरी को भी दर्ज कर लें। इससे कुछ और नहीं, बस मन में थोड़ी-सी आश्वस्ति आ जाती है कि हम भी काम का लिख रहे हैं।

Sanjeet Tripathi said...

शानदार शैली!!
अजी क्या बताएं, बचपन से अब तक मजाल है जो बिना डांट खाए हमने सुबह बिस्तर छोड़ा हो ;)

Tarun said...

na jaane kyon hum pehle hi samajh gaye the ki isme sona wale sone ke baare me nahi hoga balki uski sone ka sona hoga jis per aapne likha hai. Sahi likha hai, tabhi to kisi ne likha tha, "mujhe need aane lagi hai, meri jaan jaane lagi hai...."

Waise jab aap idhar udhar dekhne ki keh hi rahi hain to humne aisa kya gunah kiya, thora uchhak ke dekhna parega lekin ek nazar idhar bhi dikhwa sakti ho, uchhak ke isliye beech me lamba sa samnudar jo hain na....

Udan Tashtari said...

माँ सिखाया करती थी कि जब भूख लगी हो तो खाने पीने की खरीददारी पर बाजार नहीं जाना चाहिये वरना जरुरत से ज्यादा चीजें खरीद कर आ जाती है...वैसे ही जब आपको नींद आये तो नींद पर मत लिखा करें..कुछ जरुरत से ज्यादा ही अच्छा लिख गया है. :)

बढ़िया बहता हुआ अन्दाज..मन को बहुत भाया.

आभा said...

माँ बनने के बाद नीदं का दुख भुगतना पडंता है फिर कुछ भी हो बच्चे को क्या लेना .....अब .. सभालों ...नीद भी...

सुजाता said...

लेख पसन्द करने वालों को धन्यवाद ,ईश्वर उन्हे हर रात {चाहें तो दिन में भी} चैन की नीन्द नसीब कराए:-)
आभा , आप समझ रही होंगी मेरी पीडा क्या है
:-(

masijeevi said...

क्‍या कहें,
अधिक से अधिक पुष्टि कर सकते हैं कि जितना बड़ा सुआड़ आप अपने को बता रहीं हैं वो उसका शतमांश भी नहीं है जितना कि आप वाकई हैं।

वैसे ऐसे लोगों के लिए एक सरल सी संज्ञा और है- आलसी :)

vijay gaur said...

ek achchha niband hai nind par. badhai.

सागर नाहर said...

सुजाता जी
एक और बड़े सुआड़ का नमस्कार..मुझे भी पढ़ने के बाद सबसे ज्यादा जो पसन्द है वो है सोना..( Gold नहीं)
आप विश्‍वास नहीं करेंगी कि मैने गाड़ी चलाते समय सोने की कॊशिश करने का प्रयोग भी किया हुआ है। ..
पहले हर्ष और चैतन्य छोटे थे तब निर्मला दिन भर की थकी होती और रात गहरी नींद में होती तब में कभी कभा नैपी बदलने का काम करना पड़ता तब हमारा भी कुछ कुछ आपके जैसा ही हाल होता था।
बस और क्या कहें पढ़ते पढ़ते इतना मजा आया कि एक बार सोने की इच्छा हो आई और झपकी लेकर आये और उसके बाद टिप्पणी दे रहे हैं।
एक बार और धन्यवाद.. सोने देने के लिये। :)

अनुराग अन्वेषी said...

zzzzअभी नींद आ रही है, क zzzz में zzzz ट zzzz बा zzzz द zzzzz में लि....zzzzzzzzzzzzzzz :)

note pad said...

@vijay ji ,
maine nibandh to nahee likhaa thaa:-(
@sagar ji ,
sone me jo maza hai vo kahee nahee.hai na!
@Anuraag ,
bade lazzzzzzzzzzzzzzy ho bhaii :-)

sexy11 said...

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