Monday, April 7, 2008

औरतों ! तुम तलाक क्यों नहीं ले लेतीं ?

अब तो हद है ।मैं बार बार इस टॉपिक से पीछा छुड़ाने की कोशिश करती हूँ , ये भूत की तरह मेरे पीछे लगा रहता है । माजरा क्या है ? आज क्यो न इसे चुका दूँ , पीछा छूटे !एक बार ! आर या पार ! बस इतना सा झेलना और बच जायेगा कि जब तक फैसले न ले लूँ अपने दम पर !कोई नही बदलेगा तुम्हारे लिए । तुम खुद को बदल डालो । एक दम ! कईं सदियों के कष्ट का हल एक पल दूर है । ले डालो तलाक ! या कर दो इनकार ! नही करनी शादी ! नही बनना मुझे पत्नी !नही होना मुझे गुलाम !मैं अपनी शर्तों पे जिउंगी !ये अनाम मुझे सोच के रास्तों पर से गुज़रने के पहले ही भड़का दे रहे हैं ।मुझे एकदम से कोई हल नही सूझ रहा । बस एक झटका और सालों के नरक से निजात ! कितना सरल है न !आखिर अपने आप समाज सुधर जायेगा जब हम सब एक स्वर में खड़ी होकर कह देंगी कि जाओ हम तुम्हारे बिना रह लेंगे { क्या सचमुच ? }और जो कहे के बिन तुम्हारे रह भी नही सकती और इस तरह साथ रह भी नही सकती ,अपना चेहरा देखो कि कितने अमानवीय हो और अहसास हो जाए तो खुद को बदलो ,लेकिन वो तो नही बदलेगा ,तो मैं मुँह बन्द करके पड़ी क्यों नही रहती ,अपनी घुटन से औरों को रसातल का रास्ता दिखाने का कलंक तो न मिलेगा ?
लेकिन हद है कि कोई पत्नी साथ खडी नही होगी जब मैं कहूंगी-आर या पार ।क्योंकि कुछ मामलों में नही होता आर या पार । जब होता है तो सिखाना नही पड़ता ।वो चिंतन का एक सिलसिला होता है जो आर या पार के प्रश्न का उत्तर बन जाता है ।सोच के वो स्फुलिंग जगाना या जागना ज़रूरी है,वर्ना आर- पार के क्षण में भी तुम हार का रास्ता चुनोगी ।पार चुनने की हिम्मत स्वचेतना से आती है ,अस्मिता से मिलती है ,मैं क्या हूँ ? मैं ऐसी क्यों हूँ ? किसने किया ऐसा ? यह व्यवस्था क्या है ? किसके हित मे बनाई गयी ? किसने बनाई ? इसमे मेरी जगह क्या है ? ऐसी जगह क्यों है ? क्या मैं वाकई क्षीण हूँ ? तुच्छ हूँ ? क्या मेरे प्रति किये जाने वाले कुछ सांसारिक कार्य मेरा अपमान हैं जिन्हें मैं दुनिया की रीति माने बैठी हूँ ?
"जीव क्या है ? क्यों है ? जगत क्या है ?ईश्वर क्या है ? मैं संसार में क्यों हूँ ?"ये भारतीय अध्यात्म के आदि प्रश्न हैं जिनके जवाब खोजता हुआ मानव अपनी अस्मिता और अस्तित्व के प्रति सचेत होता है ।जब तक अस्मिता के सवाल ही मन में न उठें कोई भी फैसला हमारा कैसे होप सकता है ? कहाँ से आयेगी वह ऊर्जा जो किसी निर्णय के बाद के आने वाले परिणामों को झेलने के लिए हमारा मन तैयार करेगी ? और क्या हमारे निर्णय निरपेक्ष हो सकते हैं ?जिससे मैं प्यार करती हूँ , उसे उठा के पटक दूँ ,क्योंकि वह एक व्यवस्था के तहत् पला है? या धीम धीमे चोट करूँ ?
मेरी माँ के मन में नही उठे कभी सवाल !वह ज़्यादा पढी नही थी ! उसका ज़माना भी ऐसा था जब स्त्री आज के मुकाबले ज़्यादा बन्धन में थी !मैं ,उसकी अगली पीढी ,जाने कितने सवाल उठा रही हूँ , जाने कितने फैसले खुद ले पा रही हूँ ! मेरा समाज और परिवेश उसकी अपेक्षा में थोड़ा खुला है । मैं उससे ज़्याद पढी लिखी हूँ ।
सोचती हूँ अगर मैं 9-10 क्लास पढी होती ,क्या मैं इतने सवाल उठा पाती ? क्या मैं समझ पाती कि पितृसत्ता क्या है ? वो क्यों खतरनाक है मेरे अस्तित्व के लिए ?मुझे आएना कौन दिखाता रहा ? किताबें ? टी वी ? अखबार ? कॉलेज ?कैम्पस?बहन ? या कोई मित्र?कोई तो होगा !!स्वचेतना का उत्प्रेरक !

मैं कमज़ोर हूँ !मैं उठा के पटक नही सकती अपने पिता को ! अपने पति को ! मैं उन्हे प्यार करती हूँ !इसलिए मुझे वक़्त लग रहा है !वे मेरे असली कष्टॉ को पहचान रहे हैं । वे मेरा साथ देने की कोशिश कर रहे हैं । वे खुद को बदल रहे हैं ।बेशक धीमे धीमे । उठा के पटक सकती हूँ पर ऐसा नही करूंगी ।उनकी कोशिश बेकार हो जायेगी । मुझे उनका साथ चाहिये । मुझे मातृत्व सुख भी चाहिये ।मेरी संतान को भी माता पिता दोनो चाहिये ।बटन न लगाने वाली चिड़चिड़ि पत्नियाँ मेरे आस पास हैं ।उन्हें सोचने की सही दिशा चाहिये ।
आइना दिखाने से बेहतर क्या हो सकता है ?
डॉ. अम्बेदकर ने एक बार कहा था -"गुलाम को यह दिखा दो ,अहसास करा दो कि वह गुलाम है , और वह विद्रोह कर देगा !!"

15 comments:

रचना said...

सबसे पहले ये बात की जो कुछ भी लिखा जाता है वह किसी ना किसी का भोग होता हैं । ९९ % टाइम या तो हमारा या हमारे अपने किसी का । ब्लॉग पर अनाम सवाल कवियत्री से भी उतने ही करते हैं जितने आप से उन पर भी उतने ही आक्षेप हैं जितने आप पर और वो सब भी आप की तरह ही सोचती है कि अनाम को क्या जवाब दो ? लेकिन अगर गौर करे तो अनाम जो प्रश्न करते हैं { अगर वह आप को गली नहीं दे रहे हो या अपशब्द ना कह रहे हो तो } उन सब मे कही न कही या तो एक प्रशन हैं जिसका उत्तर वो खोज रहे हैं या एक उत्तर हैं जो इतन सच हैं कि आप को / मुझे चुभ जाता हैं ।

इस पोस्ट के विषय मे इतना कहुगी आप को सब चाहीये { और आप को मिला भी हैं } फिर परेशानी क्या हैं ? क्यों आप खुश नहीं हैं ? आप से मतलब उनका जिनका आप प्रतिनिधितव कर रही हैं । आप को पुरूष का साथ { पिता या पति या पुत्र } सही और अच्छा लगता है क्या ग़लत हैं इसमे ? आप उनके बदलने का इंतज़ार करना चाहती है उसमे भी क्या ग़लत हैं ? पर आप मे इतनी कटुता और घुटन क्यों हैं इस समाज के प्रति जब आप ने हर उस बात को एन्जॉय किया जो इस समाज ने आप को दी तो फिर आप किस से अपनी आज़ादी मांग रही हैं ?

बस समस्या इतनी है की आप कही खो गयी उस सब मे और आप को लगता हैं कि आप कि पहचान नहीं हैं । अगर कोई ना खुश हैं अपनी वैवाहिक जिन्दगी मे और उसे तलाक लेने कि सलाह दी जाती हैं तोह महज इसलिये कि वो अपनी जिन्दगी दुबारा जी सके ।

नारी कि सम्पूर्णता अगर पुरूष के साथ से होती तो mother टेरेसा , लता मंगेशकर हमे कभी नहीं मिलती । महादेवी वर्मा का साहित्य भी ना होता ।
प्रेम का सच्चा स्वरूप होता हैं केवल देना और अपने को मिटाना , भूल जाना अपने अस्तित्व को । अगर आप अपने पिता और पति को प्यार करती हैं तो मिटा दीजिये अपने आप को और आप को जो आत्मिक सुख मिलेगा वो आप की " अपनी पहचान " से बड़ा होगा । पर ऐसा भी कहा लिखा हैं कि सामाजिक बन्धन मे बाँध कर ही प्यार हो सकता हैं ?? पुरूष कि तरह भी प्यार हो सकता हैं निर्मोही बन कर , जिसमे वो केवल अपने बारे मे सोचता हैं ।
जितनी भी विवाहित महिला ये लिखती हैं कि वो ना खुश हैं तो मुझे लगता हैं कि वो एक दिखावा करती हैं , अपने समय पर वह बिल्कुल नहीं बोलती , बोलती हैं दूसरो को राह दिखाने के लिये । ख़ुद अपने कन्यादान के समय पर चुप रहती हैं , दहेज के समय पर भी चुप रहती हैं , जब पति का अफैर होता है तब भी उसी के साथ रहती हैं पर दूसरो को समझाती हैं की वह घुट रही हैं ।
रास्ते बहुत हैं पर सब कठिन हैं स्वंत्रता मन से होती हैं ।
समय बदल रहा है क्योकि आज आप { विवाहित } और मै { अविवाहित } दोनों एक दूसरे से खुले मंच पर प्रशन कर सकते हैं । मेरा मानना है बदलना स्त्री को होगा , उसे अपनी कमियों को खोज कर अपनी सम्पूर्णता को पाना होगा । उसे अपनी सम्पूर्णता की तलाश अपने मे करनी होगी ।
और जहाँ मेने "आप "लिखा हैं वह पर्सनल नहीं हैं

विनीत कुमार said...

कभी-कभी ये आर-पार का मामला साफ न भी दिखे तो भी पुरुषों को आर-पार दिखा जरुर जाती है। क्योंकि सही हमेशा पुरुष नहीं होते ये ठीक बात है लेकिन हर गलत पर स्त्रियां चुप मार ही जाती है, ऐसा भी तो नहीं होता।..और मजा तो तब आता है जब वो कहगने लग जाए तुमसे पार पाना मुश्किल है। जाहिर है मजाक में नहीं गुस्से में, प्रतिशोध में और कभी-कभार एहसास के स्तर पर।

सुजाता said...

rachana said
......इस पोस्ट के विषय मे इतना कहुगी आप को सब चाहीये { और आप को मिला भी हैं } फिर परेशानी क्या हैं ? क्यों आप खुश नहीं हैं ? आप से मतलब उनका जिनका आप प्रतिनिधितव कर रही हैं । आप को पुरूष का साथ { पिता या पति या पुत्र } सही और अच्छा लगता है क्या ग़लत हैं इसमे ? आप उनके बदलने का इंतज़ार करना चाहती है उसमे भी क्या ग़लत हैं ? पर आप मे इतनी कटुता और घुटन क्यों हैं इस समाज के प्रति जब आप ने हर उस बात को एन्जॉय किया जो इस समाज ने आप को दी तो फिर आप किस से अपनी आज़ादी मांग रही हैं ? .............


रचना जी ,
सबसे पहले तो धन्यवाद कि आपने धैर्यपूर्वक ये अगड़म बगड़म पोस्ट पढी और इतना दीर्घ रेस्पॉंस दिया ।
बहुत सी बातें मैने पोस्ट में कहाँ दीं फिर भी आपके इस सवाल पर चिंता हो रही है ।
बड़े आदर सहित एक दो बातें कहना चाहती हूँ ---
चिंता यहाँ है कि मेरी दुनिया मेरे घर के बाहर भी है ।
और मेरी सबसे बड़ी बेवकूफी इस बात में है कि मैं अपने आस पास की स्त्रियों की स्थिति के प्रति सम्वेदंशील हो जाती हूँ और वह दुख मेरा दुख बन जाता है ।
मैं स्वयम को स्त्री जाति के इतिहास की ,अतीत की निरंतरता में देखती हूँ ।मैं मेरी माँ , उसकी माँ और सास उनकी भी माँ .............मैं उसी निरंतरता में खड़ी हूँ ... सबसे अलगा कर नही देख पाती कि चलो मैं तो खुश हूँ बाकियों के साथ जो होना होगा होगा । हिम्मत होगी तो लड़ लेंगी नही होगी तो भुगतेंगी।
एक बेवकूफी यह भी करती हूँ कि यह समजह्ती हूँ कि मैं अपने आस पास के प्रति चिंतित होकर कुछ उखाड़ लूंगी किसी का । शायद कहीं कुछ नही बदलेगा । पर जिन्हें बदलना है उन स्त्रियों को सबसे पहले आइना देखना होगा कि वे क्या हैं क्यों है कहाँ हैं .......उन्हें आइना दिखाने का दम्भ जाने कैसे आ जात है मुझमें ।
अक्सर लगता है कि शायद गलत जगह पर सारे एफर्ट्स जा रहे हैं । नेट पर आने वाले समाज को इन बातों की ज़रूरत ही नही है ।
पर .........
मैं अपने समय में ,अपने उपलब्ध मध्यम से ,अपने और अपने जैसियों के सवाल दर्ज कर रही हूँ .............कभी कोई सुन लेगा तो भला ....नही सुनेगा तो इस अराहत से मरूंगी कि वक़्त के प्रति ,अपने समुदाय के प्रति अपने सीमित शब्द सामर्थ्य और माधय्मो से मैं अभिव्यक्त कर गयी ।
यही बहुत होगा !!

सुजाता said...

अंतिम वाक्य ऐसे पढिये -
कभी कोई सुन लेगा तो भला ....नही सुनेगा तो इस राहत से मरूंगी कि वक़्त के प्रति ,अपने समुदाय के प्रति अपने सीमित शब्द सामर्थ्य और माधय्मो से मैं अपना कर्तव्य कर गयी ।इससे ज़्यादा कर सकती थी । पर कम से कम तो किया !
यही बहुत होगा !!

रचना said...
This comment has been removed by the author.
रचना said...

पितृसत्ता की आदत है महिला को और बहुत सी इसमे बहुत खुश हैं क्योकि पितृसत्ता के बाहर की ज़मीन पथरीले होती हैं , पितृसत्ता के बाहर का आसमान मे जालने वाली धूप होती हैं . और महिला इससे बचना चाहती हैं आत्म समान और आज़ादी कि कीमत होती हैं और उस कीमत का नाम हैं तकलीफ , निरन्तर एक लड़ाई अपनी सामाजिक परस्थितियों से जो हर महिला नहीं चाहती । ज्यादतर महिला को सब कुछ प्लेट पर परसा हुआ मिलता हैं फिर भी उन्हे खुशी नहीं होती क्योकि अपने आप परस कर खाने मे जो बात हैं वो उस सुख से वंचित हैं ।
http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/
aaiinaa dusro ko naa dikhaa kar khudh ko dheekhaye ham sab toh jaldi badlav aayega . kyoki apne samay mae sab chup rehnaa chahtey haen aur achchey banaaey rehnaa chahtey haen aur waqt bewqt aayinaa duro ko dekhatey haen . badlav laana haen to pehlae apnii khushiyon kii aahuti daene hogee
aur yae bahut mushkil haen.

सुजाता said...

@रचना जी
एक बात और ...
जब कोई स्त्री घुटन को अभिव्यक्त करने लगे ...सरे आम ...तो समझिये कि उसके व्यक्तित्व की ग्रंथियाँ खुलने लगीं हैं और वह अस्मिता के प्रति सचेत हो रही है ।
एक उदाहरण देती हूँ ।पति के अफेयर की चर्चा या पति द्वारा पीटे जाने की चर्चा कभी कोई स्त्री किसी और से नही करेगी ।यह अपनी बदनामी है ।लेकिन अगर वह ऐसी बातों का खुलासा करने लगे तो निश्चय जानिये कि वह अपनी अस्मिता के प्रति सचेत हो रही है ।असीमा भट्ट ने जब कथादेश में आलोक धनवा के साथ अपने अनुभव लिखे और अपनी घुटन को अभिव्यक्त किया तो वह वही पुरानी असीमा नही रही थी ।

********
दिखावा कभी घुटन का नही होता । दिखावा होता है खुलेपन का ।
*********
@ रचना ने कहा -नारी कि सम्पूर्णता अगर पुरूष के साथ से होती तो mother टेरेसा , लता मंगेशकर हमे कभी नहीं मिलती
-------सम्पूर्णता तो भ्रम है । सार्थकता की तलाश होनी चाहिये ।स्त्री पुरुष साथ रहने के लिए बने हैं ,चाहे पति के रूप मे चाहे भाई के रूप मे चाहे मित्र के रूप में ।
प्यार के बारे मे भी मैं मानती हूँ कि इसकी अनुभूति और प्राप्ति और अभिव्यक्ति और परिभाषा हर कोए अपने तरीके से करता है ।एक तय रास्ता और परिभाषा नही है ।

आपका बहुत धन्यवाद ! इसलिए कि आपके प्रश्न मुझे और बहुत सी बातों पर लिखने की ओर ले जा रहे हैं ।सम्वाद कायम हो रहा है ।

सुजाता said...

@ rachana said -
aaiinaa dusro ko naa dikhaa kar khudh ko dheekhaye ham sab toh jaldi badlav aayega
@मतलब जो आज़ाद है और समर्थ है और पितृसत्ता की चालाकियों को समझ चुकी है -जैसे आप और मैं --क्या हम बार -बार "खुद को" आइना दिखाते रहें ?

बदलाव जल्दी और देर से का प्रश्न नही है ......
वह तो अपनी गति से आयेगा । मैं बीज बो सकती हूँ , खाद -पानी दे सकती हूँ {वही देने की कोशिश कर रही हूँ }पर पेड़ में फल अपने समय से आयेगा और अपना समय लेकर पकेगा ।

Anonymous said...

aaj subah meri Girl Frnd ne mujhe phone kiya, uska night duty chal raha hai.. ham dono hi alag shahar me rahte hain.. usne mujhe kaha ki ek baat batani hai, magar sun kar tum gussa karoge.. main aaj subah office se sidhaa ghar nahi lauti.. mere saath Asif naam ka larka kam karta hai, main uske saath uske bike par ghumane chali gayi thi aur 2-3 ghnte tak ghumti rahi thi.. mera answer tha ki isme gussaane vali kya baat hai? tum khush ho, main bhi khush hun.. bas man me ek baat aayi, ki yahan mere shahar me meri ek bahut hi achchhi frnd hai jise main apani GF se pahle se jaanta hun.. main ek baar usake saath koi movie dekhne chala gaya tha to vo 2 dino tak roothi rahi thi.. main jaanta hun ki vo mujhase bahut pyar karti hai(shayad main jitna usase karta hun usase bhi jyada).. main use galat bhi nahi thahra raha hun.. bas apni baat aap logo tak rakh raha hun..

main apane chitthakarita ke itihas me pahli bar Anonymous ke naam se koi tippani kar raha hun.. kaaran ye nahi ki main apna naam chupana chaahta hun.. karan bas itna sa hai ki main nahi chaahta ki koi mere Personal life me tank-jhank kar sake.. aur aapki jaankari ke liye kahna chaahunga ki aap sabhi mujhe achchhi tarah se jaanti hain..

Rajesh Roshan said...

जब भी किसी को कोई दिक्कत होती है तो वह उसका हल धुन्धता है. हल भी कई तरीके के होते जल्दी और सरल और एक कठिन. मुमकिन है जाहिर है कठिन को कोई अपनाना नही चाहता है. सब लोग जल्दी (तलाक़) से काम करना चाहते हैं.

@Anonymous

देखिये सबसे पहली बात जहा जितनी अपेक्षाये होती हैं दुःख भी वही सबसे जायदा होता है. आपकी गर्ल फ्रेंड आपसे प्यार ही केवल जायदा नही करती वो अपेक्षा भी जायदा करती है इसी कारण से वो रूठ भी गई

apurn said...

bada he sarthak samvaad hai
agar sari mahilayen itni tarksangat ho jayen to sach me sab kuch kitna badal sa jayega.

swapandarshi said...

मुझे लगता है कि सुजाता और रचना दोनो की बाते, दो ज़रूरी बाते है, और एक मायने मे एक दूसरे की पूरक भी. सुविधासम्पन्न, और पढी-लिखी महिलाये, आज जहा पहुंची है, जितनी भी मोल-भाव की ताकत हासिल कर सकी है, सिर्फ व्यक्तिगत स्तर् पर ही स्त्री-मुक्ती का सवाल खत्म नही हो सकता. व्यक्तिगत स्तर पर ही मुक्ती की बात करना, और सिर्फ व्यक्ति को ही उसकी गुलामी, उसकी किस्मत, उसके दुख के लिये जिम्मेदार बना देना, एक मायने मे स्त्री-मुक्ति के सवाल् को बेमानी करार देना भी है. इसमे कोई दुविधा नही है कि ये एक बडा सामाजिक सवाल है, और समाज की संरचना को प्र्श्न के दायरे मे लाना निहायत ज़रूरी भी है.

मनुष्य की सही मायने मे मुक्ती, चाहे वो स्त्री हो, पुरुष हो, और इस प्रिथ्वी के दूसरे प्राणी और यन्हा तक कि हवा-पानी भी प्रदूषण मुक्त तभी हो सकते है, जब इस धरती के बाशिन्दो मे एक समंवय हो, और किसी का अस्तित्व, किसी का सुख किसी दूसरे के दुख के एवज मे न मिला हो.

चुंकि हम एक ऐसे समाज मे रहते है, जो आज स्त्री के पक्ष मे नही है, और यहा रहने न रहने का चुनाव भी हमारा नही है. हम सिर्फ इतना कर सकते है, कि एक घेरे को और एक बन्द कमरे को जहा हमने, कुछ सामान जुटा लिया है, अपनी अनंत आज़ादी का आकाश समझ कर इतरा सकते है, जहा कभी सुरज की रोशनी नही आती.

दूसरा रास्ता ये हो सकता है, कि हम से जो भी बन पडे, इस समाज के समीकरण बदलने के लिये, वो करे. ज़ितना बन सके उतना करे. हर एक व्यक्ति की अपनी सुविधा और सीमा हो सकती है.

इस दूसरे रास्ते की तलाश मे एक चीज़ जो अहम है, वो है इमानदारी, कथनी और करनी मे. और जो भी इन समीकरणो को बदलने की कोशिश करेगा, उसे गजालत तो उठानी ही पडेगी, कोई उसे सर -आंखो पर नही बिठाने वाला. और जो लोग इन खतरो को जानकर, सचेत तरीके से उठाते है, वही समाजिक चेतना की अगुवाई भी करते है.

मानव समाज पाषाण-युग से यहा तक इन्ही धीमे बद्लाओ के बाद पहुंचा है, और लगातार बदलेगा. एक समय् का लांछन दूसरे समय और काल मे उपाधि बन सकता है. और संकर्मण के दर्मियान बदलाव से ज्यादा कभी -कभी बद्लाव की बाते सुविधाजनक हो जाती है, क्योंकि उनके लिये कोई कीमत नही चुकानी पड्ती. और इसीलिये, इस पहलू पर रचना की बाते, बहुत ज़रूरी है

Suresh Gupta said...

बहुत सारी बातें लिखी हैं आपने. शादी न करना, या शादी के बाद तलाक़ ले लेना यदि समस्याओं का एक यही सही हल है तब तो यह कदम उठा ही लेना चाहिए. एक बात और, आपने कहा - "मेरी माँ के मन में नही उठे कभी सवाल ! वह ज़्यादा पढी नही थी ! " ऐसा कैसे कह सकती हैं आप? सवाल तो सब के मन में उठते हैं. ज्यादा पढ़ना शायद ज्यादा सवाल उठा देता है. आज की नारी सवालों के जबाब बाहर तलाश रही है. शायद सवालों के जबाब अन्दर हों. शायद आपकी माँ ने उन्हें अन्दर पा भी लिया हो.

pearl neelima said...

तलाक़ पर क्यों ? पहले एक पति से निपटना पड़ता है फिर किस किस से लड़ोगे ? क्यों ना दिमाग़ लगाकर पुरुष को अपने अनुकूल बना लिया जाए ---मज़ा तो तभी है

sexy11 said...

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