Tuesday, April 15, 2008

IBRT -"पहले वे उपेक्षा करेंगे ,फिर वे हसेंगे ,फिर वे लड़ेंगे ...और फिर हम जीत जायेंगे ...."


बहुत छोटी थी जब एक बार धर्मशाला गयी थी ।बहुत हैरानी होती थी वहाँ बसे एक छोटे तिब्बत को देख कर ।अपने मे खुश ,बुद्ध के अहिंसक श्रद्धालु ,शरणार्थी और अति साधारण मानव । लेकिन दिल्ली के बस अड्डा के पास की मोनास्ट्री से निकल ये जीव अचानक सड़कों पर कैसे उतर आये हैं ये देख अब हैरानी नही हो रही ,स्वातंत्रय किसी भी जाति की सबसे बड़ी चाह है ।एक भारतीय शायद इस बात को बहुत बेहतर समझ सकता है । लेकिन क्या वह देश भी इसे समझ पाएगा जिसने दमित होने का , जिसने शासित और शोषित होने का दंश नही सहा ?क्या मुख्य धारा का आदमी कभी हाशिये के दर्द और विमर्श को समझ सकता है ?या उसके विद्रोह को अपने विद्रूप से सदैव झुठलाने की कोशिश करता है ?और जब हाशिये के पक्ष मे बोलता है तो हमेशा उसकी शक्ति का ह्रास करने के लिए ?
बड़ी हैरानी होती है जब हम विद्रोह और विरोध के कारणो पर न जाकर विद्रोह और विमर्श के तरीकों पर ही बहस करने बैठ जाते हैं ?
तिब्बती आज भड़क उठे हैं । क्या हम उनका शोर सुन पा रहे हैं ? या शोर पर सवाल उठा रहे हैं ? भारत मे जन्मी एक बेचैन तिब्बती आत्मा कह रही है कि हम वह शोर सुनें ।इस बेचैन आत्मा के सवाल हैं -

“Please relieve us from the expectations of a community which is non-violent in nature. Buddhism preaches non-violence, but which religion doesn’t? Isn’t it human to shout and protest if your country is suppressed for decades, despite attempts of peaceful dialogue? We are just humans, not Buddha”.

आज़ादी के साथ साथ यह सवाल है अस्मिता का । और किसी भी दमित जाति की अस्मिता का सवाल शक्ति ,सत्ता के नियंत्रण से टकराता है ।इस मायने में मैं स्त्री ,दलित या किसी भी दमित अस्मिता के सवाल को भी साथ ही जोड़कर देखूंगी ।
कोई भी अस्मिता जब मुखर होती है उसके पीछे कुछ ऐतिहासिक ,राजनीतिक ,सामाजिक करण होते हैं । स्त्री ,दलित अस्मिताओं के मुखर होने के पीछे भी रहे हैं । या सबसे सही यह है कि इतिहास अपने आप मे एक बड़ा कारण हो जाता है ।वर्ना कोई दमित अस्मिता अचानक एक ही दिन अत्याचार सह कर लड़ने को आतुर नही हो जाती ।40-50 साल के अहिंसक विरोध के बाद ही आज तिब्बत भड़क उठा है । सदियों के अन्याय सहने के बाद और अपनी लॉयल्टी {?}दिखाने के बाद ही स्त्री-दलित अस्मिताएँ अब जब तब भड़क उठती हैं ।
समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखा जाए तो किसी अस्मिता के मुखर होने के पीछे कुछ अनिवार्य तत्व होते हैं जैसे -

1.उस समुदाय या जाति द्वारा एक समान इतिहास शेयर करना ।
2. समान संस्कृति और परम्परा को शेयर करना
3. उस समुदाय के उद्गम सम्बन्धी समान धारणाएँ और मिथक -परमपरा से समान रूप से सम्बद्ध होना ।


एक समान इतिहास है जो एक स्त्री होने के नाते मुझे हर स्त्री से ही नही जोड़ता बल्कि हर स्त्री को उसके अतीत के साथ निरंतरता में खड़ा करता है। यहीं से उसे बल मिलता है ।दलित अस्मिता के साथ भी ये सभी घटक लागू होते हैं और तिब्बती लोगो के साथ भी । ये सभी अस्मिताएँ एक ऐतिहासिक प्रक्रिया के तहत आगे आई हैं ।और एक समान वर्तमान भी शेयर कर रही हैं ।केन्द्रीय शक्ति सत्ता और ज्ञान की मुख्यधारा से एक समान उपेक्षा और दमन भी शेयर कर रही हैं ।
कहने वाले अभी कह रहे हैं कि दलित बार-बार वही बात करते हैं उनके पास कहने को कुछ नया नही माना कभी अन्याय हुआ था पर अब भी क्यो रो रहे हैं ,स्त्री विमर्शकारों के भी सिर पैर नही और उनकी दलीलों मे कुछ नया नही ये सुघड़ औरतो की आत्ममुग्धता के अलावा कुछ और नही ,तिब्बती भी बुद्ध के अनुयायी होकर भी हिंसा पर उतारू हैं और इसलिए खोखले हैं वे इतनी जल्दी अहिंसा से हिन्सा पर उतर आये ? इतना ही सब्र था ?
माने यह कि हर बार की तरह विरोध के कारणो पर विचार न कर के हम सब विरोध के तरीकों पर बहस कर के इधर उधर खिसक ले रहे हैं ।सवाल पुराने होते जा रहे हैं और सच ये है कि वे बढते जा रहे हैं लेकिन उनके जवाब की जगह उपेक्षा मिल रही है । और सबसे बड़ा सच यह है कि ओलम्पिक की मशाल के साथ हर देश की सरकार खड़ी है ...........
मुख्यधारा की यह उपेक्षा और यह उपहास क्या वाकई इन अस्मिताओं को उभरने से रोक लेगा ?क्या हम भड़के हुए तिब्बत पर पानी डालकर उसकी आग बुझा देंगे .....?


बेचैन आत्मा का{जाने कितनी आत्माओं का}यह विश्वास है कि उपेक्षा और उपहास का यह सिलसिला थमेगा ।-

"Mahatma Gandhi has said "First they ignore you, then they laugh at you, then they fight you. And then... you win." I hope to God it’s true for Tibet!"

" पहले वे उपेक्षा करेंगे ,फिर हसेंगे ...हाशिये के पूरे पन्ने पर बिखर जाने वाला हास्य ...{या कहें अट्टहास } , फिर वे लड़ेंगे .....और तब हम जीत जायेंगे ।"

आमीन !!
IBRT -India born restless tibetan

11 comments:

Tygogal said...

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अभिषेक ओझा said...

हम भी आशा करते हैं कि अंत में जीत हो !

अतुल said...

जब तक आदमी गुलाम रहेगा, धरती पर तूफ़ान रहेगा. चीन अमेरिका दोनो को यह समझ लेनी चाहिए.

swapandarshi said...

tibet ke logo kee aur unake sangharsh kee jeet ho, ye meree bhi kamaanaa hai

Udan Tashtari said...

आमीन!!!

रवीन्द्र प्रभात said...

यकीनन ऐसा हो !

Anonymous said...

achchha likhti hain sujata aap...
padhkar achchha laga.
yeh sach hai ki tibbatiyon ke tareekon ko lekar sab jagah rona-peetna macha hai,par koi unki aawaz sun lene ki koshish nahin kar raha.
aakhir itni hay atauba ke peechhe ka dard kya hai... ye sochna hoga.
abhinav raj
india tv,
delhi

Suresh Gupta said...

आपकी बात से मैं पूरी तरह सहमत हूँ. समस्यायों के कारणों को जानने की हिम्मत समाज कम ही जुटा पाटा है. कुछ समस्याएं, जैसे गुलामी और आज़ादी, युगों से चली आ रही हैं, पर कोई समाधान नहीं निकल पाया. हम भारतीयों को एक गुलामी से आज़ादी मिली. कुछ दिन तक खुशी मनाई. जब जागे तो पता चला गुलामी का सिर्फ़ रंग बदला है. अब दूसरी गुलामी से आजाद होने का संधर्ष चल रहा है. यह संघर्ष चलता रहेगा. इस संघर्ष में तिब्बतियों को सफलता मिले ईश्वर से यही प्रार्थना है.

विश्व शान्ति का संदेश,
बंदूकों की छाहँ में,
आज कहीं खो गया.
ओलम्पिक मशाल की,
रिले दौड़ का भारतीय हिस्सा,
जैसे तैसे पूरा हो गया.

JoJosho said...

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Multifuncional said...

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