Wednesday, April 23, 2008

सास बहू को विमल जी की नज़र लगी


आखिर विमल जी ने अपनी ठुमरी मे सास -बहू मेलोड्रामा और स्त्री के कामिनित्व व दुष्टता को नज़र लगा ही दी । उस दिन वे बड़े चिंतित थे इस पोस्ट में और हम भी टिप्पणी मे चिंता ज़ाहिर कर आए थे । पर सच कहें तो जाने कितने साल से इस चिंता मे हैं कि आखिर सीरियल क्यों हमारे समाज को और खासकर औरत को सदियों पीछे धकेल रहे हैं ? एकता कपूर को कई गालियाँ भी दे डाली मन ही मन ।
आज अखबार देखा तो पता लगा कि अफगानिस्तान की सरकार ने तुलसी और कसौटी जैसे सीरियलों पर रोक लगा दी है । ताली बजाने को मन हुआ ।पर पूरी खबर पढ कर खुशी को जंग लग गया । एक बन्द समाज की सुन्दर पैकेज में से उठती सड़ान्ध को माने दूसरे बन्द समाज ने नकार दिया हो ।यदि काबुल वालों ने ‘सास भी कभी बहू...’ को इसलिए नकारा होता कि ये कहानियाँ हमारे नागरिकों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए बिल्कुल भी ठीक नही हैं ,और ये साज़िश ,रंजिश ,हिंसा , विकृत -घिनौने चरित्रों व गलत सदेशों के इर्द गिर्द घूमती हैं ...तो अच्छा होता । लेकिन काबुलीसरकार ने कारण दिया तो केवल “विवाहेतर सम्बन्ध व टूटती शादियाँ ” । मुस्लिम समाज में बेहद लोकप्रिय होने पर भी ये सीरियल इन दो कारणों से कठमुलाओं को रास नही आये । साज़िश और बदले की भावनाओं से भरे हुए किरदार और कहानियाँ तो ठीक हैं पर शादी का टूटना और विवाहेतर सम्बन्ध कतई स्वीकार नही किये जा सकते ।आखिर अफगानी समाज पर इसका क्या असर होगा ?
शादी एक ऐसा बेसिक रिश्ता है जिसका टूटना किसी बन्द समाज को बर्दाश्त नही । और उसकी पवित्रता {?} को बचाए रखने के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं ।इन कहानियों में समाज के असली परेशानियाँ और स्त्री की मूलभूत समस्याएम कहाँ खो गयी हैं । घर को जोड़े रखना ,सत्य और त्याग की मूर्ति बनना ,करवाचौथ मनाना ,पति को देवता मानना । क्या यही हैं आज की स्त्री के जीवन की ज़रूरतें ?विमल जी ने जिन सीरियलों के नाम गिनाए वे साफ दिखा रहे हैं कि स्त्री की एक ट्रेडीशनल छवि को ही प्रोत्साहित किया जा रहा है ।

स्टार प्लस में एक खबर है “सास बहू और साज़िश ”जिसके पीछे का नारा है कि “क्योंकि सीरियल भी खबर हैं ” । इतना महत्व इन घटिया कहानियो को ? तो मुझे सबसे बड़ी आपत्ति है इस सीरियलों मे दिखाई जाने वाली साज़िशें और बदले और षडयंत्र और तानाकशी और सभी बुराइयों के बीच एक दिये सी खुद जलती और दूसरों को रोशनी देती अकेली सीता पार्वती सी नायिका से । जाने किस घर की कहनियाँ हैं ये ।गलतफहमियाँ पैदा करती हुई खलनायिकाएँ और रोती बिसूरती सावित्रियाँ जो सक्षम समर्थ हैं ।

ज़रूरत है इन सीरियल्स के पूरे बहिष्कार की ।
लेकिन मेरे या एक दो और लोगों के बहिष्कार से क्या होगा । जनता इन्हें लोकप्रिय बना रही है ,चैनल पैसे भुना रहा है ,सरकार हाथ पर हाथ रखे बैठी है ।
कहाँ से नियंत्रण स्थापित होगा । सरकार के हाथ मे हमेशा कैंची देना क्या सही होगा ? जनता क्या इतनी शिक्षित और समझदार है कि खुद ही इन्हे देखना बन्द कर दे ? क्या एक सेंसर बोर्ड होना चाहिये सीरियल्स के लिए ? या कि खुद निर्माता को जनता के प्रति यह ज़िम्म्मेदारी समझते हुए कहानियों का चयन ध्यान से करना होगा ।

19 comments:

rakhshanda said...

अफगानिस्तान सरकार ने इसे बंद करके कोई अच्छा काम नही किया है ,बंद करने का जो कारन उन्होंने बताया है वो तो उनकी पुरानी और घिसी पिटी सोच का आईना है.
लेकिन बात यदि सीरियल की करें तो सुजाता दी ,समझ में नही आता की इस में किस समाज को दिखाया जा रहा है,किस दुनिया में रहते हैं ऐसे लोग? पर उस से ज़्यादा हैरानी होती है की कौन लोग हैं जो ऐसे सीरियल पसंद करते हैं?
जिस सीरियल का एक दृश्य मुझ से बर्दाश्त नही होता ,उसे कौन लोग इतना पापुलर बना रहे हैं?
आपने ठीक कहा ,कहीं तो कोई रोक लगनी चाहिए,वरना ये सीरियल बड़ी तेज़ी से समाज को दूषित कर देंगे.

इरफ़ान said...

यह अफ़ग़ानिस्तान का दुर्भाग्य कहा जाएगा. मुझे उनसे सहानुभूति है.

मुझे भी कुछ कहना हैं said...

deviating a little from your post sujata sorry for that but since there is always more to then what the eye can see . why people lap up such serials inspite of them being below the standard is simple that "common" can connect to them . "elite" and "bduhijeevi" cant . i myself dont watch them but i know families who watch them regulaarly .
what afgaan govt does is unde their own law and dont forget that they have simultaneusly asjed for a better content programs
if feel comment is out of place ,feel free to delete it


एक औरत ही एक औरत की दुश्मन हैं ।


कल मेरी एक ब्लॉगर मित्र ने पूछा कि आप ये क्यों नहीं मानती कि औरत ही औरत पर अत्याचार करती हें{http://sarathi.info/archives/1248 } । उन्होने कहा कि वह एक ऐसी महिला को जानते हैं जिस पर उसकी सौतेली माँ ने बहुत अत्याचार किये हैं । उन्होने कहा जब से उस घर मे सौतेली माँ आयी थी उस बच्ची का जीवन नरक हो गया । अगर हम इस तरह कि घटनाओं से निष्कर्ष निकालेगे तो वह कभी सही नही होगा ? मुझे नहीं लगता कोई भी औरत किसी दूसरी औरत पर अत्याचार करेगी । मेरे हिसाब से तो वह सौतेली माँ भी उतनी ही पीड़ित हैं जितना वह बच्ची । पीड़ित समाज कि रुढ़िवादिता से । क्या कोई भी औरत अपनी खुशी से एक ऐसे आदमी से शादी करना चाहेगी जिसकी पहले भी शादी हो चुकी हो और जिसके बच्चे भी हो { कुछ अपवादों को छोड़ कर जहाँ एक विधुर कि शादी एक विधवा से होती है या जहाँ एक परिपक्व महिला अपने आप ये फैसला लेती हैं } । एक बिनब्याही लड़की की एक विधुर से शादी और आते ही माँ के संबोधन से परिचय , क्या ये न्याय हैं ? ऐसे मे वह सौतेली माँ किसी पर भी अत्याचार कर सकती हैं क्योकि वह अत्याचार नहीं कर रही हैं वह तो केवल लड़ रही हैं समाज कि कुरीतियों से , अपने साथ हुई नाइंसाफी से ,बस ग़लत इतना हैं कि ये लड़ाई उसे बहुत पहले अपने माँ , पिता या अभिवावाको से लड़नी चाहीये थी । उस घर मे अगर इस माँ को एक लड़के की भी सौतेली माँ बनाना पड़ता तो वह उस लड़के की भी जिंदगी दूभर ही करती । नारी कभी नारी कि विरोधी नहीं हैं और ना हो सकती हैं , पर उसे संस्कार जरुर हमारे समाज मे ऐसे दिये जाते हैं कि एक नारी दूसरी नारी का विरोध करती दिखाई देती हैं । बेटी की माँ को कहा जाता हैं उसका ओहदा बेटे की माँ से कम हैं {http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2008/04/blog-post_13.html इस लिंक के कमेन्ट सेक्शन को देखे } पर उसको कभी ये नहीं बताया जाता कि बेटे कि माँ को समाज ने ऐसा क्या मेडल दिया हैं जो बेटी कि माँ को नहीं दिया । दोनों माँ को स्त्री होने कि सजा ये समाज समय समय पर देता रहता हैं । अगर लड़की कि माँ को कहता हैं "बेटी को संस्कार नहीं दिये " तो लड़के की माँ को कहता हैं " बहु पर बहुत अत्याचार करती हैं " । क्यों हमारे समाज मे पुरूष पर कोई दोषारोपण नहीं होता ? क्या पुरूष का कोई रोल नहीं हैं इस समाज मे ? क्या जिमेदारी हैं पुरूष की । और अगर टेलीवीज़न चैनल पुरूष को केवल एक शो पीस बना कर दिखाते हैं तो क्या ग़लत कर ते हैं । हम सब भी तो यही मानते हैं की समाज की हर बुराई महिला की ही वजह से हैं और पुरूष क्योकि कुछ नहीं करता तो अस्तित्व विहीन हो गया हैं । सब एकता कपूर की बुराई करते हैं पर जो बात उसने हमारे सामाजिक ढांचे से पकडी हैं वह क्या वाकई ग़लत हैं ??ये भ्रान्तियाँ कब तक भारतीये समाज मे फैली रहेगी पता नहीं । शायद सबसे बड़ी भ्रांति ये ही हैं की एक औरत ही एक औरत की दुश्मन हैं ।

rakhshanda said...

मैं आपकी बात से सहमत हूँ,सचमुच बड़ी आसानी से ओरत पर इल्जाम लगा दिया जाता है,लेकिन ज़रा बताएं,दहेज़ के लिए बहू पर ज़ुल्म धाने वाली ओरत भला कौन सा गुस्सा निकाल रही होती है या कौन सा फर्स्त्रेशन निकाल रही होती है...यदि इस बात का गुस्सा निकल रही है की उस से भी कभी दहेज़ लिया गया था तो ये ग़लत है.और जो ग़लत है उसकी बुरा कहने में कोई हर्ज नही है.

Priyankar said...

ये बेहूदा सीरियल्स एक किस्म की मानसिक विकृति हैं और बेहद खतरनाक किस्म का सांस्कृतिक प्रदूषण .

vimal verma said...

आपने लिखा कि "खुद निर्माता को जनता के प्रति यह ज़िम्म्मेदारी समझते हुए कहानियों का चयन ध्यान से करना होगा ।" निर्माता तो कटपुतली है असल काम तो चैनल का है...चैनल ही बताता है कहाँ मेलोड्रामा लाना है और कहाँ ईमोशन,चैनल के पास इन सब का आंकड़ा रहता है कि किस सीन को देखकर दर्शक भाग जाते हैं और किस सीन को ज़्यादा दर्शकों ने देखा,मतलब मिनट-मिनट की रेटिंग रहती है,....हमारे बहिष्कार से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा...भावनाएं माल हो गई हैं चैनल इन्हें बेचना जानता है...किसी नये चैनल को इसकी ज़िम्मेदारी लेनी होगी....

Pramod Singh said...

इन सीरियल्‍स ने एक काम तो किया.. कि मेरे जैसे फलतौआ तक का टीभी देखना छुड़वा दिया.. जब इनकी तरफ़ देखकर थूकने की इच्‍छा नहीं होती तब मन ही मन शुक्रगुज़ार भी होता हूं.. कि चलो, उस वक़्त का कुछ और इस्‍तेमाल होगा..

Parul said...

ye serials ek kism ke atyaachaar hain darshkon par.....

rakesh tripathi said...

serials tabhi chalate hain jab voo dekhe jatein hain.dekhe kyon jate hain is par bat karne ki jaroorat hai.actually feminism tabhi safal ho payega jab estriyan naukari karein ya vyapar..koi kam karein.pati,bhai,pita,purohit,parosi..baith kar ekta kapoor ka serial dekhein..jumping monkey baap se aage nikli na ekata jitender se door kahin dooniya ko sweekarati hui aur bhoonati bhi.bura kya hai...three salutes ,lal,haraand neela to ekta kapoor..welldone and keep your spirits up.nirala and premchand should take inspiration from her.

हर्षवर्धन said...

सवाल ये है कि कितनी सास, बहू और बेटियों को इसे देखने में मजा आ रहा है। और, कोई भी बहस बेमानी है।

tarun mishra said...

जय श्री गुरुवे नमःसोचो जिसने तुम्हें सुंदर सृष्टि दी , जो किसी भी प्रकार से स्वर्ग से कम नहीं है , आश्चर्य ! वहां नर्क (Hell) भी है । क्यों ? नर्क हमारी कृतियों का प्रतिफलन है । हमारी स्वार्थ भरी क्रियाओं मैं नर्क को जन्म दिया है । हमने अवांछित कार्यों के द्वारा अपने लिए अभिशाप की स्थिति उत्पन्न की है । स्पष्ट है कि नर्क जब हमारी उपज है , तोइसे मिटाना भी हमें ही पड़ेगा । सुनो कलियुग में पाप की मात्रा पुण्य से अधिक है जबकि अन्य युगों में पाप तो था किंतु सत्य इतना व्यापक था कि पापी भी उत्तमतरंगों को आत्मसात करने की स्थिति में थे । अतः नर्क कलियुग के पहले केवल विचार रूप में था , बीज रूप में था । कलियुग में यह वैचारिक नर्क के बीजों को अनुकूल और आदर्श परिस्थितियां आज के मानव में प्रदान कीं। शनै : शनैः जैसे - जैसे पाप का बोल-बालहोता गया ,नर्क का क्षेत्र विस्तारित होता गया । देखो । आज धरती पर क्या हो रहा है ? आधुनिक मनुष्यों वैचारिक प्रदूषण की मात्रा में वृद्धि हुयी है । हमारे दूषित विचार से उत्पन्न दूषित ऊर्जा ( destructive energy ) , पाप - वृत्तियों की वृद्धि एवं इसके फलस्वरूप आत्मा के संकुचन द्वारा उत्त्पन्न संपीडन से अवमुक्त ऊर्जा , जो निरंतर शून्य (space) में जा रही है , यही ऊर्जा नर्क का सृजन कर रही है , जिससे हम असहाय होकर स्वयं भी झुलस रहे हैं और दूसरो को भी झुलसा रहे हें । ज्ञान की अनुपस्थिति मैं विज्ञान के प्रसार से , सृष्टि और प्रकृति की बहुत छति मनुष्य कर चुका है । उससे पहले की प्रकृति छति पूर्ति के लिए उद्यत हो जाए हमें अपने- आपको बदलना होगा । उत्तम कर्मों के द्वारा आत्मा के संकुचन को रोकना होगा , विचारों में पवित्रता का समावेश करना होगा । आत्मा की उर्जा जो आत्मा के संपीडन के द्वारा नष्ट होकर नर्क विकसित कर रही है उसको सही दिशा देने का गुरुतर कर्तव्य तुम्हारे समक्ष है ताकि यह ऊर्जा विकास मैं सहयोगी सिद्ध हो सके । आत्मा की सृजनात्मक ऊर्जा को जनहित के लिए प्रयोग करो । कल्याण का मार्ग प्रशस्त होगा । नर्क की उष्मा मद्धिम पड़ेगी और व्याकुल सृष्टि को त्राण हासिल होगा । आत्म - दर्शन (स्वयं का ज्ञान ) और आत्मा के प्रकाश द्वारा अपना रास्ता निर्धारित करना होगा । आसान नहीं है यह सब लेकिन सृष्टि ने क्या तुम्हें आसन कार्यों के लिए सृजित किया है ? सरीर की जय के साथ - साथ आत्मा की जयजयकार गुंजायमान करो । सफलता मिलेगी । सृष्टि और सृष्टि कर्ता सदैव तुम्हारे साथ है । प्रकृति का आशीर्वाद तुम्हारे ऊपर बरसेगा । *****************जय शरीर । जय आत्मा । । ******************

Ila's world, in and out said...

जब तक हमारी जनत ऐसे सीरियल देखेगी, तब तक ये बनाये जाते रहेंगे. आस पडोस में अब कोई किसी का हाल या दुख सुख नही पूछता, जब चार औरतें मिलती हैं तो सिर्फ़ और सिर्फ़ सास बहू के सीरियलों की ही चर्चा होती है.

pallavi trivedi said...

mujhe to lagta nahi ki darshakon ke itne chahete serials itni aasani se alvida kah denge...

munish said...

Hey Galz n Guyz ! whtz d bullshit yar? Cant u ppl. juss take a peg or two n simply have some fun ? Have FUN
n trust here NONE! got it ? Luv ALL n stand TALL!! hic!

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कुमार मुकुल said...

दरउसल सामाजिक पिछडापन और अशिक्षा इसके लिए जिम्‍मेवार है कि ऐसा कचरा सीरियल महिलाएं देखती हैं उनके पास विकल्‍प नहीं है, यूं इनका विरोध होना चाहिए हां अफगान सरकार ने गलत करणों के मददेनजर ऐसा किया है यह शर्मनाक है,

महिलाओं केा चैनलों में सर उठाते ऐसे खतरनाक खूबसूरत लगते फनों को कुचलना सीखना होगा ताकि वे फनफनाना बंद करें,... नोटपैड का लिंक ठीक कर दिया है मैने

Udan Tashtari said...

ज़रूरत है इन सीरियल्स के पूरे बहिष्कार की -बिल्कुल सही...हमने तो इनका पूर्ण बहिष्कार बहुत दिनों से कर रखा है.

Ekta Kapoor said...

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as ekta kapoor every thing start with "k" so it also with "k"
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http://www.kapoorekta.com


Interesting na

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sexy11 said...

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