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Friday, August 3, 2007

भागी हुई लडकियाँ –भाग-2

पिछले दिनोँ आलोक जी की कविता ‘भागी हुई लडकियाँ ’ बहुत चर्चा में रही । कारण था असीमा की आप-बीती का प्रकाशन जिसमें अलोक जी के कवि हृदय और व्यक्तित्व में अंतर्विरोध देख कर दुख हुआ ।किसी निर्णय पर पहुँचना नही है मुझे न इतनी औकात है मेरी ।इस विषय पर पहले ही लिख चुकी हूँ ।लेकिन बहुत उत्सुकता थी आलोक धन्वा की कविता “भागी हुई लडकियाँ ”पढने की ।अभय तिवारी जी ने वह इच्छा पूर्ण कर दी ।उन्हे धन्यवाद!
कविता पढने के बाद वह अधूरी सी लगी । एकतरफ़ा ।शायद एक स्त्री-स्वतंत्रता के प्रबल पक्षधर कवि को लडकियोँ के भागने में क्रांतिधर्मिता का दर्शन होता हो जो समाज की संरचना मेँ आमूल-चूल परिवर्तन के बहुत प्रारम्भिक संकेत होँ ।महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के ‘कविता क्या है’ सम्बन्धी लेख से असंतुष्ट होकर आचार्य शुक्ल को फिर से लिखना पडा था “कविता क्या है”।न मै आचार्य शुक्ल हूँ न आलोक जी द्विवेदी हैं ;उनके आस पास भी कही नही ठहरते हम शायद इसलिए आलोक जी से असंतुष्ट होने का जोखिम लिया जा सकता है । ऐसे में “भागी हुई लडकियाँ ”का दूसरा भाग बहुत कम चेष्टा से ,रच दिया है। अ-कवि [अप्रतिष्ठित औत स्त्री :) ]की कविता शायद ऐसी ही हो सकती होगी |
और एक तरफ़ा शायद यह भी है । इसलिए दूसरा भाग कहा है ।यह सचमुच की भागी लडकियां है रतजगो‍ में भागी नही।
तो एक पक्ष यह भी -----
आलोक धन्वा को समर्पित , क्योन्कि उन्ही की कविता से प्रेरित है यह कविता ।
*****
भागी हुई लडकियाँ
कडे जीवट वाली होती हैं
जीती हैं
मौत को शर्मसार करतीं ।
यूँ भी जब तक
गर्भ् में ही मार न दी जाएँ
मरती नही लडकियाँ
आसानी से।
कडी जान होती हैं।
भागी हुई लडकियों के सामने
नही होते विकल्प ।
उनके रास्ते वेश्यालयों तक जाकर
बन्द होते हैं हमेशा के लिए
और भागने के बाद
झरोखे से झाँकने की भी नही रहती हकदार !
उजाले के सफेद पुरुषों को
रात के ग्लानिमय अन्धेरे में
अपनी चूहों,झींगुरों से अटी पडी मैली कोठरी में ,एक के बाद एक
देती हैं राहत ।
भागी हुई लडकियों को
बेच जाते हैं उनके प्रेमी
दलालों द्वारा बलत्कृत होने और्
तब्दील होने
एक रंडी में ।
एक निर्विकल्प दुनिया
खिंच जाती है
चारो ओर ।
खरीदारों के हाथ किसी मवेशी की तरह
टटोलते हैं उनकी देह
और लगाते हैं कीमत ।
*** बज़ारू, बेआबरू
मानते है जिन्हे;
आश्चर्य ! !
वे भी पालती हैं भ्रम इज़्ज़त के
और मुँह सिए पडी रहती हैं
सीले कोनों में रोगों से अटी देह लिए ।
वे नही कहना चाहतीं अपनी पीडा
शर्मिन्दगी के घृणित,कुत्सित पल
नही बांटना चाहतीं।
तीस के बाद
बुढाने लगती हैं तेज़ी से
इसलिए
उनकी लडकियाँ
[जिन्हे भागने की नही पडी
ज़रूरत] ज्ल्दी-जल्दी होने लगती हैं बडी
सीखने लगती हैं हुनर ।
****
घर के भीतर्
शौचालय-सा शहर में वेश्यालय है।
रसोई-सा पवित्र नही पर उससे अहम
जहाँ से निवृत्त्त होकर
पाक-मना
परिवार-संरचनाओं के मुखिया
लौटते है।
फर्क यह है
इन्हे कोई अपना नही कहता सार्वजनिक शौचालय की भाँति ।
जिन्हे गन्दगी छोडने के बाद
अपनी,साफ करने
कोई नही आता ।
****
सीधे-सादे-भोले लोग
सोचते हैँ
भागी हुई लडकियाँ
आत्महत्या क्यों नही कर लेतीं?
मौत से बदतर ज़िन्दगी से
खुद मौत ही बेहतर नही ?
ये सीधे, भोले लोग
समझते क्यों नही
भागी हुई लडकियों के
लौटने के दरवाज़े
ये खुद ही
बन्द कर चुके हैं।
इन्होने बदल दिया है
कोठो को
वॉल्व में ,
भागी हुई लडकियों को रंडियों में,
हत्या को
आत्महत्या में।