Thursday, October 25, 2007

अब तक उनसठ .....| मैं क्या समझूँ !!

“मैं बेकसूर हूँ जज साहब , मैने कुछ नही किया, मेरा यकीन कीजिये, मुझे फँसाया गया है .......” इस तरह की रिरियाहटें और “मैं जो कहूंगा सच कहूंगा ,सच के अलावा कुछ नही कहूंगा ” जैसे पिटे हुए वाक्य अक्सर हिन्दी फिल्मों के अदालती दृश्यों में सुन-दिख जाते हैं ।और नीर-क्षीर-विवेक सा न्याय का न्याय और अन्याय का अन्याय [दूध का दूध और पानी का पानी भी कह सकते है ] हो जाता है । खलनायक और उसके साथी सलाखों के पीछे जाते हैं ।अगर यह फिल्म का अंत हो तो दयनीय भाव के साथ अगर फिल्म का मध्य हो तो गर्दन झटकते हुए ‘तुझे तो मै देख लूंगा’ वाले अन्दाज़ में ।शुरु में भी और मध्य में भी हम जानते हैं अपराधी-दोषी कौन है;यह भी जानते हैं कि उसे सज़ा मिलेगी अवश्य । लेकिन वस्तुजगत में क्या न्याय की प्रक्रिया इतनी ही त्वरित और सजग है ? क्या हम न्यायालय में इंसाफ के अलावा कुछ नही मिलेगा पर यकीन कर सकते हैं ?शायद उत्तर नकारात्मक है । वकालत एक बदनाम पेशा है और असली गुंडों के साथ साथ वर्दीधारी ,कुर्सीधारी,उद्योगपति गुंडे भी हैं ।ऐसे में न्यायालय की सक्रियता और सज़ाओं का दौर चौकाने वाला है ।जनसत्ता का आज का मुखपृष्ठ अलग अलग चार खबरों में 59 लोगों को[गिनती गलत हो तो माफ़ करे‍ हमारा गणित बहुत कमज़ोर और गरीब है] विभिन्न केसों में उम्रकैद के फरमान की तफ़सील दे रहा है ।दस साल पहले दिल्ली के कनॉट प्लेस में फर्जी मुठ्भेड कर के दो व्यापारियों की हत्या करने वाले दस पुलिसवालों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई गयी है ।फरवरी 1998 यानी 9 साल पहले कोयम्बटूर में लालकृष्ण आडवाणी की हत्या की साज़िश रचने और सिलसिलेवार बम विस्फोटों के लिए 31 दोषियों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गयी है ।वहीं नेता भी इस से नही बचे। 2003 में चर्चित् मधुमिता हत्याकांड में अमरमणि को सपत्नीक व दो अन्य को उम्रकैद का फरमान सुना दिया गया है। दिसम्बर 1992 यानी 15 साल पहले बाबरी मस्जिद ढहाये जाने के गुस्से में कानपुर में 11 लोगों को जलाने के मामले में 15 लोगों को अदालत ने उम्रकैद की सज़ा सुनाई है ।इनमें कोयम्बटूर वाले केस में कई अपराधियों को दोहरी-तिहरी-और चार बार उम्रकैद की सज़ा सुनाई गयी है ।अब्दुल ओज़िर को 125 साल कैद की सज़ा सुनाई गयी है । वही फर्जी एंकाउंटर केस में सी बी आई ने दोषियों के लिए मृत्युदंड की मांग की थी ।

यह खबरें क्या संकेत करती हैं ? अदालती प्रक्रियाओं पर यकीन लौटाने में इनसे मदद मिलेगी ? या सर्वोच्च न्यायालय तक जाकर स्थितियाँ पलटने वाली हैं ? मै अब भी निष्कर्ष निकालने में असमर्थ हूँ । क्या न्याय-प्रक्रिया अपनी निरंतर होने वाली आलोचनाओं से झटका खाकर हरकत में आ गयी है ?सच का कितना और कौन सा अंश हम तक पहुँच रहा है ? क्या हमें आनन्दित होना चाहिये ? मै हतप्रभ हूँ ।

Monday, October 22, 2007

बाज़ार में खडा रावण


इधर बहुत दिन से कुछ लिखने का वक़्त और् समां नही बन्ध पा रहा । बीच बीच में झांक ज़रूर जाती हूँ कि किसने क्या लिखा । खैर , अब जबकि त्योहारों का आलम है और हम अभी अभी रावण को फूँक कर हटे हैं तो एक आंखिन-देखी की एक पोस्ट भी चिपका ही देते है । हुआ यूँ कि रावण –जलन [ दहन कह लीजिये ] की पूर्व सन्ध्या पर हम दिल्ली के तिलक नगर की ओर एक कार्यक्रम अटेंड करने चल रहे थे । टैगोर गार्डन आते आते सडक के दोनो ओर का नज़ारा देख मुँह खुले खुले रह गये ।लाल-बत्ती, चौराहा तिराहा. फुटपाथ, पार्क जहाँ जहाँ जगह हो सकती थी वही वही बडी बडी मूँछों और दांत वाले, अट्टहास करते रावण, कुम्भकरण और मेघनाथ के विशालकाय पुतले जलने को तैयार पडे थे । कुछ दशानन ,धड और बाकी अंग ट्रकों में सवार होकर सडकों पर दौडने लगे थे न जाने किन गंतव्यों तक पहुँचने के लिए । यह रावण का बाज़ार था । बोर्ड लगे थे- मोहन रावण वाला, सोनू रावण वाला [कोई राम या रामू रावण वाला भी रहा हो तो आश्चर्य नही ] । यह बाज़ार है । राम रावण में बन्धुता है । रावण के भरोसे कई रामों के घर के चूल्हे जल रहे हैं । अखबारें बता रही हैं पुतलों की मांग बढ रही है । पुतले जलाने का चलन बढा है । जयपुर से बडी डिमांड आ रही है । क्या लोग दशहरा को वाकई धर्म की विजय का पर्व मानकर मनाने लगे है ? क्या रावण दहन से वे अपने बच्चों को अच्छाई का पाठ पढाने लगे हैं ।
चलिए चाहे जितना चाहे बाज़ार को गरियाएँ पर इतना ज़रूर हुआ है कि बाज़ार ने सबको अवसर प्रदान किये हैं । वह हर तरह का वे-आउट सुझाता है । सैकडों तरीके और उपाय हरएक के लिए हैं उसके पास ।बाज़ार –दर्शन बडा प्रबल दर्शन है जो हर धर्म ,हर सभ्यता, हर संस्कृति के अनुरूप खुद को ढाल लेता है । त्योहार प्रधान इस देश में वह और भी सफल हुआ है । बाज़ार बिना त्योहार की कल्पना असम्भव है । इसलिए भई हम तो अक्तूबर माह के आने से पहले भय से काँपने लगते हैं। जेबें ढीली होते होते नया साल मनाने की नौबत आ जाती है । श्राद्धों में , नवरात्रों में व्रत के खाने में, आलू चिप्स में, डांडिया के डी जे में ,दुर्गा पूजा के पंडालों में,गीतों में, मेहन्दी में ,शादी में , करवाचौथ में, दीवाली मेलों में,पटाखों में,लडियों में ,मिठाइयों में, उपहारों में, दूज में, गोवर्धन में ...........सब में, सबके बीच बाज़ार उपस्थित रहता है । और इसी के बीच खडा है रावण जो बार बार जल रहा है पर रक्तबीज सा पल रहा है । जितना ही जलता है उतना ही बढता है ।

Friday, September 28, 2007

महापुरुष उदास है

प्रमोद जी का महापुरुष उदास हैऔर अकेला है बेवकूफ बुद्धिजीवियोँ के बीच । मुझे भी हमेशा से लगा किताबें खरीदना [जो पडी रहेंगी शो केस में अपना सारा वज़न लिए], फिक्की के सेमिनार और पुस्तक विमोचन , मण्डी हाउस के बेवजह चक्कर , श्रीराम सेंटर के नाटक , आई आई सी और आई एच सी की गोष्ठियाँ और प्रदर्शनियाँ बेवकूफ बुद्धिजीवियों की बौद्धिक अय्याशी के अड्डे हैं । सोचना और उस सोच पर दुनिया को कायल् कर देना शगल है । ज्ञानदत्त ने सही पहचाना । कभी कभी एक ही के भीतर महापुरुष और बेवकूफ बुद्धिजीवी एक साथ होता है ।विखंडित स्व । स्प्लिट पर्सनैलिटी ।पर अलग भी होता है ।बेजी जी ने कहा –
महापुरुष ज्ञानियों के बीच हो या अज्ञानियों के बीच अकेला ही होता है।

हाँ पर खुश होने और रहने का ताल्लुक ज्ञान से है मैं नहीं मानती। (यकीन नहीं हो तो मुझे ही देख लें :)))
दोनो बातों से सहमत हूँ ।पर व्याख्या अपेक्षित है ।मेरा आशय भिन्न है ।कुछ कबीर की तरह है ---
सुखिया सब संसार है खावै और सोवै दुखिया दास कबीर है जागै और रोवै
जिसने ज्ञान पा लिया वह कभी खुश रह ही नही सकता ।खुशी का ताल्लुक बेखबर रहने से है ।अज्ञानी होने से है ।बच्चा जब तक दुनिया के दर्द-रंज जान नही लेता वह खुश है । अबोध है मासूम है तो सब आनन्द है ।आनन्द पर वज्रपात होता है जब जान जाता है संसार को । सुख का भोंथरापन समझ लेने के बाद चैन नही मिलता ।कबीर ने जाना कि सुख और खुशी भ्रम है क्षणिक हैं ।जिनके पीछे पगलाई भीड भाग रही है वह वस्तुएँ कितनी सारहीन हैं । इसलिए कबीर दुनिया के इस चलन को देखता है और दुखी रहता है । कैसे इनसान खुद को मूर्ख बनाता है और जिए जाता है । इसलिए प्रमोद जी का महापुरुष दुखी है । वह जानता है ।बौद्धिक होना , बने रहना और दिखना क्या है । ए.सी. की हवा खाते नाटक का मंचन होते देखना और हाशिये के लोगो पर बात करना और मुद्दों को चाय-समोसे के साथ उडा देना।महापुरुष दुखी ही रहेगा और अकेला भी ।बेवकूफ बौद्धिक जब तक अज्ञानी है वह अय्याश है और उसकी हर चिंता फैशन है ।

Saturday, September 8, 2007

सत्ता तो भ्रष्ट करती ही है ....

उदय प्रकाश की एक कहानी है “वारेन हेस्टिन्ग्स का सान्ड ”जिसमे‍ एक स्थान पर उन्होने लिखा है” सत्ता तो भ्रष्ट करती ही है।” बात मे‍ दम है ।सत्ता जिसके पास भी होगी उसे ही भ्रष्ट करेगी चाहे वह स्त्री हो दलित या मज़दूर ।न न... । मेरा मन्तव्य हाशियाई-विमर्शो‍ अर सन्घर्षो‍ पर धूल डालना नही है । एक हाशिये का तो मै खुद भी प्रतिनिधित्व करती हूँ। यह और बात है कि एक तरह से विमर्श अपने आप में मुख्यधारा की प्रक्रिया है ।माने यह कि विमर्शकार बन कर मैँ भी मुख्यधारा हो जाती हूँ। कैसे ? जैसे आदिवासी या दलित् समाज का व्यक्ति मुख्यमंत्री बनते ही अपने समाज को भूल राजनीति की मुख्यधारा के अनुकूल आचरण करने लगता है । ये दलितों के “अभिजन” हो जाते हैं । तो सत्ता और शक्ति , विमर्श की परिधि में भी कुछ कुछ मिलती है‌‍ । ये बडी अप्रत्यक्ष सी प्रक्रियाएँ हैं ।
खैर , मुद्दा वही पुराना है जिस पर पिछली पोस्ट में बात की थी । स्त्री पर बात करते हुए अक्सर हम जिन पूर्वधारणाओं से ग्रस्त रहते हैं ,और जिनके कारण हमेशा से स्त्री-विमर्श का तेल हुआ है ।ये धारणाएँ हैं--- पहला, स्त्री की लडाई या प्रतिद्वन्द्विता पुरुष से है । स्त्री को मुक्ति पुरुष से चाहिये । दूसरा, स्त्री-विमर्श किसी भी अन्य हाशियाई –विमर्श की ही तरह सत्ता-विमर्श है।यानी यह सत्ता पाने की जंग है । तीसरा,सभी क्षेत्रों में स्त्री के आगे बढने से स्त्री की सशक्तीकरण हो रहा है । चौथा, लडकियाँ बोर्ड के नतीजों में हमेशा आगे रहती है इसलिए वे ज़्यादा होशियार और प्रतिभावान हैं और इसलिए कहना चाहिए कि वे शिक्षित हो रही हैं ।
पहले मिथ का निराकरण का प्रयास मै पिछली पोस्ट में कर चुकी हूँ ।
अब दूसरी बात - स्त्री-विमर्श किसी भी अन्य हाशियाई –विमर्श की ही तरह सत्ता-विमर्श है।यानी यह सत्ता पाने की जंग है ।
इसी के जवाब की भूमिका मैने आरम्भ में बान्धी है ।यह ठीक है कि स्त्री विमर्श की झण्डाबरदार हो जाते ही मुझे मुख्यधारा वाले थोडे-बहुत लाभ तो मिलने लग जाते है लेकिन यह मानने से इनकार नही किया जा सकता कि हाशियाई-विमर्शों से एक दमित-दलित वर्ग में अस्मिता का बोध भी आया है और चेतना भी । बहुत से आन्दोलनों को खडा करने और दबी अस्मिताओं को उभारने में ये विमर्श कामयाब हुए हैं । यही इसकी शक्ति है । लेकिन वे जो हाशिये की अस्मिता नही है ,जिन्होने हाशिये पर होने के अपमान और दंशों को नही झेला ;जब वे विमर्शकार होते है तो उनका विमर्श फैशन से कम नही लगता ।साथ ही यह विमर्श के मनत्व्यों को हानि पहुँचाता है हाशिये के प्रति लोगो को असम्वेदनशील बनाता और भ्रमित करता है। तभी तो पुरुषों द्वारा अक्सर यह कह दिया जाता है कि” औरतों की लडाई सत्ता और शक्ति पाने के लिए है ”।शायद इसीलिए मनीष ने यह कहा कि मीडिया में औरतें अपनी प्रतिभा नही किसी और शक्ति के बलबूते बढ रही हैं ।यह आंशिक सत्य हो सकता है । बहस तो यह भी हो सकती है कि- सत्य क्या है यह कौन बताएगा ?अंतिम सत्य , पूर्ण सत्य कुछ नही है । सो डंके की चोट पर यह कहना कि स्त्री प्रतिभा नही प्रतिमा है – गलत होगा ।यह भी बौखलाहट भरा पूर्वाग्रह ही है ।इसका अन्य पक्ष यह भी है कि कई बार स्त्री-सशक्तिकरण के भ्रामक अर्थ ग्रहण करते हुए झंडाबरदारी करने वाली कुछ स्त्रियाँ केवल कुछ पुरुषों द्वारा मूर्ख ही बनाई जा रही होते हैं । यह किसी विमर्श का सबसे घातक पहलू है । प्रतिभा जी का राष्ट्रपति बनना भी मुझे इसी श्रेणी में लगता है ।यह स्त्री का सशक्तीकरण नही स्त्री-विमर्श की हार है जब स्त्री को मोहरा बना कर मकसद हल किया जा रहा है और लगातार स्त्री-शक्ति के गीत गाये जा रहे हैं ।
सत्ता और शक्ति स्त्री अपनी काबिलियत और हौंसलों से हासिल करती है और उसका उपयोग अपनी समझ से बेहतरीन करती है तो वह पुरुष से ज़्यादा सम्माननीय है क्योंकि जो पुरुष ने आसान रास्तों से गुज़र कर किया उसके लिए एक स्त्री ने शोलों पर चलकर रास्ता तय किया होता है ।ऐसे में अगर किरण बेदी दिल्ली की पुलिस अधीक्षक बनती तो यह वास्तविक अर्थ में स्त्री सशक्तीकरण होता ।
कहने का तात्पर्य यह कि स्त्री की लडाई सत्ता,शक्ति,नियंत्रण की शक्ति को हस्तांतरण करने की नही है ।उसकी लडाई भागीदारिता की लडाई है ।समान अवसरों और समान हकों की लडाई है । उसकी लडाई उसे हीन मानने और समझने की मानसिकता से है ।उसकी लडाई में सबसे बडा दावा मानाधिकार का दावा है ।जीवन की वैसी ही अकुंठ और बेहतर स्थितियों की लडाई जो पुरुष को उपलब्ध है ।
इस लडाई में सत्ता और शक्ति केवल उपकरण हैं ,ज़रिया है मात्र । यदि इन्हे लक्ष्य समझा गया तो लडाई का मूल बिन्दु ही नष्ट हो जाएगा। मूल लडाई व्यवस्था की संरचना के पीछे छिपी मानसिकता है । स्त्री के लिए वास्तविक गतिरोध भौतिक् जगत में नही ,मनों के भीतर ,दिमागों में, अवचेतन में हैं । सत्ता तो भ्रष्ट करती ही है । इसलिए यह दावा बेकार है कि शीला दीक्षित या मायावती का मुख्यमंत्री होना इसलिए सही है कि वे किसी मर्द से बेहतर प्रशासन चलाएगी और मानवीय मूल्यों या बेहतर समाज की स्थापना कर पाएगी ।सत्ता की कज्जल-कोठरी में जो जाएगा ,कालिख तो लगेगी ही ।
अत: स्त्री होने के कारण किसी अधिकार को पाने का दावा गलत है तो उतना ही गलत दावा प्रतिपक्ष का होगा कि स्त्री होने के कारण अधिकार या सत्ता को स्त्री हासिल नही कर सकती।

Friday, September 7, 2007

मोहल्ले का स्त्री-विमर्श और कुछ छूटे हुए मुद्दे

मोहल्ले पर आजकल स्त्री-विमर्श चल रहा है ।अच्छा है । पर पीडा इस बात की है कि विमर्श एकांगी दृष्टिकोण को लिए चल रहा है । सारी बात चीत के बाद लगता है कि मुद्दा मात्र यह रह गया है कि ‘स्त्रियाँ हर क्षेत्र में प्रगति कर रही है और भारत की किस्मत लिख रही हैं ‘जैसा कि पूजा के लेख से ध्वनित होता है या फिर ठीक उलट कि ‘स्त्रियाँ आगे तो बढ रही हैं लेकिन प्रतिभा के बलबूते नही किन्ही और ही मानदनडों पर ‘।माने लडाई बहस एक सरफेस के ऊपर काई सी जम रही है जिसके नीचे की गहराई अभेद्य और अगम्य हो जाएगी अगर यह विमर्श कुछ पल और यूँही चलता रहा। इसलिए सोचा कि कुछ वास्तविक मुद्दे उठ जाने चाहिये इससे पहले कि बात में बात सा कुछ न बचे और शब्द रीत जाएँ और अर्थ चुक जाएँ ।
मेरी समझ से स्त्री के आगे बढने या न बढने से कहीं ज़रूरी बातें और हैं । इसलिए पहले तो उन मिथों से निबटना ज़रूरी है जो हर इस बहस में शामिल व्यक्ति की पूर्वधारणा के रूप में काम कर रहा है । ये मिथ है‍ -
पहला, स्त्री की लडाई या प्रतिद्वन्द्विता पुरुष से है । स्त्री को मुक्ति पुरुष से चाहिये । दूसरा, स्त्री-विमर्श किसी भी अन्य हाशियाई –विमर्श की ही तरह सत्ता-विमर्श है।यानी यह सत्ता पाने की जंग है । तीसरा,सभी क्षेत्रों में स्त्री के आगे बढने से स्त्री की सशक्तीकरण हो रहा है । चौथा, लडकियाँ बोर्ड के नतीजों में हमेशा आगे रहती है इसलिए वे ज़्यादा होशियार और प्रतिभावान हैं और इसलिए कहना चाहिए कि वे शिक्षित हो रही हैं ।

अब इन मिथों का निराकरण -
स्त्री की लडाई ,दर असल , पुरुष से नही पितृसत्ता से है जिसका समान रूप से शिकार पुरुष भी है ;इसलिए स्त्री की मुक्ति या लडाई पुरुष की भी मुक्ति और लडाई है ।लेकिन अफसोस यह है कि इस् मुद्दे पर स्त्री व पुरुष एक दूसरे को प्रतिद्वन्द्वी मानते हैं और सारी ऊर्जा अवास्तविक शत्रु से जूझने में निबट जाती है ।मायने यूँ समझिए कि, जब एक स्त्री अपनी पारम्परिक भूमिकाओं से निकल कर मनचीता करना चाहती है तो उसका रास्ता रोकने वालों में पितृसत्ता के चौकीदार पुरुष ही बाधा नही बनते बल्कि इसी व्यवस्था में रची-पगी स्त्रियाँ भी उतनी ही बाधक बनती हैं ।पुरुषो को समझना होगा कि वे एक कितने ही शिक्षित हो जाएँ वे एक बन्धी बन्धाई परिपाटी के अनुरूप ही व्यवहार कर रहे हैं । यह भी समझना होगा कि पुरुष का साथ ही गंतव्य है और मंतव्य है न कि पुरुष से मुक्ति । पुरुषों को धरती से मिटाकर स्त्रियाँ कहाँ जाएँगी ?
इसलिए कामना साथ की ही है चाहे वह इच्छित साथ लड कर लेना पडे ।
“चक दे इंडिया” इस मायने में एक अच्छा उदाहरण सामने लाती है ।लडकियों की टीम वर्ल्ड कप में जाने लायक है यह सिद्ध करने के लिए उसे लडकों की टीम के साथ खेलना पडता है । वास्तव में भी जब जब स्त्री की क्षमताओं पर विचार हुआ है तो उसका पैमाना पुरुष ही रहा है ।स्त्री अपने आप में कुछ नही अगर उसकी प्रतिभा पुरुष की प्रतिभा से टक्कर लेने लाबिल नही है ।यहाँ ये कायनात के दो अलग ,पूरक प्राणी ,साथी न होकर दो लडाके हो जाते हैं। जिसमें एक अपनी भिन्न शारीरिक और मानसिक शक्तियों व क्षमताओं के कारण हीन साबित होता है।इसलिए शारीरिक क्षमता को सिद्ध करने के लिए प्रजनन और पोषण से ही बात नही बनती स्त्री को पहलवानी भी करनी पडती है ;और वह करती है;खुद को साबित करने के लिए ये वे अग्नि-परीक्षाएँ हैं जिनसे वह आज भी गुज़रती है ,और सफल भी होती है । शारीरिक क्षमताएँ और काबिलियत सिद्ध करने के लिए अभी तक पुरुष से नही कहा गया है कि-“चलो जी, तुम्हे तब मानेंगे जब बच्चा पैदा करके दिखाओ “
तो लडाई दो विपरीत लिंगियों की नही है । उनके सामाजी करण की प्रक्रिया और उसके पीछे के संसकारों या मानसिकता से है ।
समानता के मायने क्या है ? इस पर भी सोचने की ज़रूरत है । बाकी मिथों का जवाब अगली पोस्ट में ।यूँ भी पिछली पोस्ट विचारों के प्रवाह में बहुत दीर्घ हो गयी थी ।इसलिए अभी इतना ही । बहस आमंत्रित है .........

Thursday, September 6, 2007

एक पगलाए वक्त में रस-चर्चा

जब काव्य में रस की बात होती है तो सबसे पहले रसराज श्रृंगार [आम भाषा में प्रेम –और उसके भी दोनो पक्ष संयोग और वियोग ] का नाम आता है ।“पृथ्वीराज रासो” की परम्परा के रासो काव्य युद्ध और श्रृंगार के वर्णनों से अटे पडे हैं। यानि वीर और श्रृंगार रस इनमें प्रमुख हैं। श्रृंगार का बखान क्या करूँ, वह हमेशा प्रासंगिक रहेगा और सबका स्वानुभूत भी । युद्ध के वर्णनों में मिलने वाले वीर रस और अन्य दो रस- रौद्र व जुगुप्सा मुझे बात करने को अधिक प्रासंगिक जान पड रहे हैं ।चलिए वीर रस की बात करें।वीर रस की प्रेरक स्थितियाँ होती हैं जब अधर्म , अत्याचार और अन्याय का सर्वत्र बोलबाला हो ।खलनायक के दुराचरण और निर्बलों पर उसका अन्याय वीर रस के नायक को भडकाने और रस की पूर्ण निष्पत्ति में सहयोग देते हैं। ऐसे में जननायक के रूप में खडा नायक वीर रस से स्फूर्त और सद्दुदेश्य से संचरित होता है और उसका वीरतापूर्वक शस्त्र उठा कर शत्रु पर वार करना वीर रस का निष्पादन करता है । ऐसे में रौद्र रस वीर का सहयोगी बन कर प्रकट होता है । रौद्र शब्द अधिकांश लोगों ने शिव के रौद्रावतार या रौद्र रूप के विषय में सुना होगा । रौद्र रस का स्थायी भाव क्रोध है [स्थायी भाव माने वे मूल भाव जो आदिम काल से मनुष्य के मन में रहते आये है और रहेंगे ,और अनुकूल अवसर आते ही प्रकट हो जाते हैं] ।यह क्रोध दुराचारी के चिढाने और हरकतों से बाज़ न आने पर वीर नायक में उतपन्न होता है।ऐसे में नायक की क्रोध से आंखे लाल होना, बाँह ,होंठ फडकना ,हुंकार करना, चुनौती देना रौद्र रस का सृजन करते हैं। ये दोनो रस मिलकर युद्ध के वातावरण को सजीव बनाते हैं तो वहीं युद्ध के बाद लाशों और् खून् से लिथडे कटे शरीर ,मरघट सी नीरवता और गिद्धों चीलों का लाशों में से आँख जिह्वा नोच नोच कर खाना ऐसा घृणित वातावरण बनाते हैं जिनसे जुगुप्सा रस की निष्पत्ति होती है माने कै करवा सकने की क्षमता वाला उबकाई भरा वातावरण्।
यह वीरता प्रदर्शन और क्रोध कभी भी निर्बल और शोषित के प्रति नही होता ।उद्देश्य की पवित्रता और धर्म संस्थापना की मंशा से ही होता है। लेकिन अगर क्रोध और बल-प्रदर्शन कमज़ोर के प्रति होने लगे,मानो कंस का मथुरावासियों पर अत्याचार , तो वहाँ क्या रस होगा ;न,न...रसाभास....रसाभाव.....या शायद रसभंग ! रसभंग की ये स्थितियाँ हमें आज हर ओर दीख पड रही हैं ।डारविन के विकासवाद [survival of the fittest] ने यूँ भी प्रतिस्पर्द्धा में निर्बलों के पिछड जाने और सबलों के और और सबल होते जाने को वैज्ञानिक वैधता दे ही दी तो कार् मालिक और चालक के रिक्शेवाले के प्रति असम्वेदनशील होकर जैसे तैसे आगे बढ जाने में अचरज क्या है ? मनों का बोझ लादे असहाय रिकशावाला लाख चाह कर भी जो कुछ नही कर सकता,और उसे भी उसी सडक पर ही चल कर आगे तक जाना है उस पर भी बेसब्र गाडियाँ लगातार “पीं-पीं” चींखती रहती हैं और थूक में चबाई सभ्य गालियाँ उस पर फेंकते हुए सबसे आगे बढ जाती हैं।यहाँ कार मालिक का रौद्र रूप रौद्र रस की खिल्ली सी उडाता लगता है । क्या यह आँखें लाल होना क्रोध से बाँहें फडकना अधर्मी,दुराचारी के कुकृत्यों के कारण है ? यह रौद्र है ? या पागलपन ? शायद पागलपन ही है । ये अतिवादी प्रतिक्रियाएँ और अकारण का गुस्सा जिसमें पगलाया आदमी एक उमा खुराना पर गुस्सा होकर कई निरपराधों के वाहन जला डालता है या सीलिंग के विरोध में सडकों पर उतर आकर पत्थरबाज़ी करता,ट्रकें जलाता है। या कमज़ोर को सामने देखते ही जिसे अचानक अपनी शक्ति का भान हो जाता है जिसके दम्भ में वह सडक पर ही पीट पीट कर किसी की हत्या कर डालता है । या वर्दी का गुंडा “मारो साले को !” कहते हुए प्रशासन की दी हुई बंदूक से, समर्पण को तैयार निहत्थे गुण्डे को भून डालता है । ऐसे लोगो को कौन सा वीर कहा जाए ? युद्धवीर ...दानवीर ... कर्मवीर....दयावीर....। न । न यह वीरता है न यह कोई रस है ।महज़ बल-प्रदर्शन वीरता नही और महज़ क्रोध रौद्र नही ।यह दिमागी बुखार है जिसका कोई वैक्सीन नही ।वर्ना पडोसी के कुत्ते को जान से सिर्फ इसलिए मार डालना कि उसका भौंकना पसन्द नही,या अपनी ही संतान को मार डालना सिर्फ इसलिए कि वह पिता के हिस्से के चिप्स खा गया दुरुस्त दिमागी हालत के लक्षण तो कतई नही हैं ।गरीब परिवारों के बच्चों की बोटियाँ चबाने वाले मोनिन्दर सिंह ही वहशी नही हैं सिर्फ ।यह इस पगलाए वक्त के हर उस आदमी का वहशी जुनून है जिसे अपने हाथ् का डंडा और असहाय की चमडी दीखती है बस ।
तो वीर और रौद्र रस की स्थितियाँ आज सम्भव नहीं । ये दोनो रस रस चर्चा में बहिष्कृत होने चाहिए । ये निहायत अप्रासंगिक हैं । बचा –जुगुप्सा रस । वह निहायत प्रासंगिक है ।निठारी की कोठी के भीतरी नज़ारे को यदि कोई कवि छन्दोबद्ध करे तो जुगुप्सा रस का अब तक का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण बन पडेगा ।भीड के विरोध-प्रदर्शन और पुलिस के शांति-प्रयासों के बाद का सडकों का नज़ारा भी जुगुप्सा रस के लिए मॉडीफाएड स्थिति होगी ।इसे रस भंग कहने वाले मूर्ख होंगे । अब बाकि बचे रसों की बात । हास्य रस् भी श्रृंगार का साथी है और कभी अप्रासंगिक नही होने वाला । करुण रस तो शायद अब रसराज हो जाए क्योंकि सर्वत्र स्थितियाँ इसकी प्रेरक ही हैं । सरकारी-प्रशासनिक अफसरों-गुंडो और आतंकवाद के दौर में भय रस भी अति प्रासंगिक है और वैज्ञानिक –प्रौद्योगिक तरक्की के चलते अद्भुत रस भी यदा-कदा दीख जाएगा । अभी बहुत कुछ अद्भुत होना बाकी है ।भक्ति रस विवादास्प्द रस की श्रेणी में है क्योंकि भक्ति वाले शांत रस और उसके स्थायी भाव निर्वेद में कोई रुचि न रखकर धर्म और राजनीति में अधिक दिलचस्पी दिखा रहे है ।बम-बम भोला में रमते हुए लाठी बल्लम लिए कुश्ती के दाव पेंच भी खेलते रहते हैं । वात्सल्य रस या कहे माता पिता का संतान के प्रति प्रेम –यह भी प्रश्न चिह्नित है ।इसकी प्रतिकूल परिस्थितियाँ वात्सल्य भाव के पुष्टिकरण में बाधा बन रहा है ।केवल कृष्ण की बाल-लीलाओं में आनन्द लेने को जेंडर-बायस कहा जा रहा है ।बालिका-शिशु की अठखेलियों को अभी तक नज़रान्दाज़ किया गया है।
सो नतीजा यह कि सब रसों में वीर और रौद्र रस को छोडकर बाकि सभी रस काव्य में और समाज में अपनी अपनी प्रासंगिकता के लिए अडे है ।रौद्र और वीर को या तो अपना स्वरूप बदलना होगा या मिटना होगा या अप्रासंगिक होना होगा माने सिर्फ किताब तक सीमित रहना ।ऐसी कोई स्थिति समाज में नही होगी जिससे प्रेरित हो कर हम वीर या रौद्र का उदाहरण दे सकें या जिनके आधार पर कवि काव्य लिख सके ।

Monday, August 20, 2007

विज्ञापन ---चाहिये एक फुल-टाइम ,घरेलू,गधेलू, जड ,जवान,स्वस्थ नौकर

विज्ञापन हिन्दी-लेखन की अद्यतन विधा है [यह मेरा मानना है]।पॉपुलर भी [नही है तो हो जाएगी]।हाशियाई विमर्श में हम दोनो ओर हैं। कुछ प्रसंगों में मुख्यधारा और कुछ म्रं सीमांत या हाशिये पर हैं।जहाँ हम मुख्यधारा हैं वहाँ हाशिये के प्रति सम्वेदनशीलता लाख प्रतिबद्धता के बाद भी नही आ पाती ।इसलिए जब नौकर पर एक कहानी लिखने का सोचा तो नही लिख पाए। आराम और फुरसत से ब्लाग लिखते हुए अपने नायक के सन्दर्भ में फुरसत की बात जम नही रही थी ।नौकर का फुर्सत और आराम मे होना या कहें अस्मितावान होना मालिक होने के भाव को चुनौती देता है ।इसलिए कहानी का केन्द्रीय भाव पकड नही आता था । कहानी का फॉर्म नही जम रहा था ।तभी यह अद्यतन विधा याद आयी । यूँ भी कहा जाता है [पता नही कहाँ कहा जाता है ] कि लेखक विधा नही चुनता उसका कथ्य अपने लिए उपयुक्त विधा का चुनाव अपने आप कर लेता है । सो हमारे कथ्य और मंतव्य ने अपने लिए विज्ञापन विधा का चुनाव स्वयँमेव कर लिया ।

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चाहिये एक फुल-टाइम ,घरेलू,गधेलू, जड ,जवान,स्वस्थ नौकर [बच्चोँ को प्रेफरेंस दी जाएगी ]जिसे थकान न होती हो ;होती भी हो तो बताए न, जो कम रोटी और कम नीन्द पर ज़्यादा काम कर सके,जिसे आराम हराम हो ,जिसे अखबार पढना,चिट्ठी लिखना न आता हो ,जिसकी किसी समसामयिक विषय पर अपनी कोई राय न हो, जिसके चहरे पर आशा और आँखों में सपने न हों ,नौकर होने के कारण जिसके हाड-गोड आसानी से तोडे जा सकें,जिसका परिवार न हो, हो तो गाँव में हो जहाँ उसे जाने की छुट्टी नही दी जाएगी क्योंकि गाम जाकर ये नौकर जात वापस नही आते, विवाह की आज़ादी नही होगी ,विवाहित होने पर पत्नी-बच्चे गाँव मेँ ही रहे तो अच्छा ,दोस्ती-मित्रता की आज़ादी नही होगी ,जो सबके सोने के बाद सोए और सबके जागने से पहले जाग जाए,जिसके रीढ की हड्डी और गर्दन की हड्डी न हो या तोडी जा चुकी हो और वह गर्दन सीधी करके खडा न हो सकता हो लेकिन काम करने का उसमें ज़बर्दस्त जोश हो , ,जो परेशान होकर भागने का प्रयास न करे अन्यथा चोरी का केस लिखवा कर पकडवा लिया जाएगा [पिटाई होगी सो अलग] ,जो डाँट खाने पर मुँह न खोले ,वफादारी में कुत्ते के समान, स्वभाव में गऊ , बोलने में बकरी समान , बोझ ढोने में गधे के समान, फुर्ती में घोडे के समान उपयोगिता में बैल के समान और मालिक के सामने मेमने के समान् हो। और अंतत: वह सिर्फ और सिर्फ नौकर हो ।
बीमारी व दुर्घटना की स्थिति मे‍ इलाज की गारन्टी नही ।योग्य उम्मीदवार सम्पर्क करे‍-बाक्स नम्बर -१०००