Saturday, December 29, 2018

इंस्टेंट तीन तलाक़ : बिल का पास होना और मर्दों की हाय-तौबा


तस्वीर द हिन्दू डॉट कॉम से साभार

शाज़िया आले अहमद


टीवी डिबेट में ज़्यादातर मौलाना तलाक़ ए बिद्अत को बुरा मानते और इस बात की पैरवी करते हैं कि इंस्टेंट तीन तलाक़ नहीं दिया जाना चाहिये जबकि मुस्लिम मआशरे की बात की जाए तो ज़्यादातर मुसलमान क़ुरआन के मुताबिक़ तलाक़ के बारे में जानते ही नहीं थे ।


ये अनजाने में नहीं हुआ इसमें एक सोची समझी साज़िश थी औरतों को कण्ट्रोल करने की । क़ुरआन के मुताबिक़ तलाक़ के लिये मुस्लिम मर्दों और औरतों को जागरूक ही नहीं किया गया । भला हो संघियों का जिनकी मुसंघियों से रस्साकशी के चलते मुसलमानों को काफ़ी हद तक क़ुरआन के मुताबिक़ तलाक़ का पता चला ।


बचपन से देख रही हूँ रमजान शुरू होने से पहले सहरी, इफ़्तार के वक़्त की जानकारी के लिये मस्जिदों और दीगर जगहों से कैलेंडर बंटना शुरू हो जाते थे जिनमें रमज़ान से मुताल्लिक़ कुछ दुआएँ भी लिखी होती हैं ।


ये कैलेंडर लग़भग हर घर में मिलेंगे । इसी तरह शबे बारात और बकरीद के मुताल्लिक़ भी पर्चे बांटे जाते हैं जिनमें इबादत का तरीक़ा और क़ुरबानी का तरीक़ा गोश्त की तक़सीम का ज़िक्र होता है । लेकिन आज तक क़ुरआन के मुताबिक़ तलाक़ की जानकारी के लिये किसी मस्जिद, किसी उलेमा, किसी जलसे से, किसी जमात से कोई पहल नहीं हुयी ।



पीस टीवी पर ज़ाकिर नाइक को सुनकर मैंने भी पहली बार क़ुरआन खोलकर देखा उनकी बताई आयतों को देखा जिनमें तलाक़ का ज़िक्र था जो कि व्यवहारिक और बेहतरीन तरीक़ा था, ये 2004 की बात है शायद । इससे पहले मेरी एक कज़िन इंस्टेंट तीन तलाक़ की भेंट चढ़ चुकी थी जो उसके शौहर ने गुस्से और नशे की हालत में दी थी बाद में उसे अपनी ग़लती पर पछतावा भी हुआ इस तरह दो ज़िंदगियाँ तबाह हो गयीं ।
ऐसे हज़ारों किस्से हैं । ये एक सबसे करीबी था इसलिये मेरी बेचैनी, तकलीफ़ भी सबसे ज़्यादा थी ।


दरवाज़े दरवाज़े घुमने वाली जमातों ने भी कभी मुसलमानों को औरतों के हक़ों को लेकर जागरूक नहीं किया नाही तलाक़ का सही तरीक़ा बताया । अक्सर लोग कहते हैं कि गुमराह लोगों तक इस्लाम पहुँचाने में इन जमातों की अहम रोल है जो काफ़ी हद तक सच भी है ।


लेकिन इन अल्लाह के बन्दों को भी औरतों के हुक़ूक़ से कोई सरोकार नहीं रहा । जब मुसलमान औरतों की हालत पर गैर मुस्लिम तंज़ कसते है उस वक़्त ये रटा रटाया जुमला "इस्लाम औरतों को सबसे ज़्यादा हुक़ूक़ देता है ।"  का नारा बुलन्द करते हैं ये जुमला इतना ही झुटा और खोखला है जितना बीजेपी का नारा "महिला के सम्मान में बीजेपी मैदान में " है ।


अगर वक़्त रहते उम्मते मुस्लिमा के अलमबरदार अपनी झूटी अना को किनारे रखकर इंस्टेंट तीन तलाक़ को ख़ारिज कर क़ुरआन के मुताबिक़ तलाक़ को मुस्लिम मआशरे में राइज़ करते तो आज ज़लील ओ ख़्वार न होना पड़ता ।

इंस्टेंट तीन तलाक़ मुस्लिम औरतों पर थोपा जाने वाला सबसे बड़ा ज़ुल्म था जिसकी वजह से कितनी औरतें ज़िंदा लाशों में तब्दील हो गयीं ।



मज़े और हैरत की बात ये है मुर्दा लाशों पर खड़े लोगों ने ज़िंदा लाशों पर खड़े लोगों को इंसाफ और क़ुरआन सिखा दिया ।

अगर पूर्वग्रह को छोड़कर, लोकसभा में स्मृति ईरानी के भाषण की बात की जाए तो बेहतरीन बोली जिसकी वक़ालत की उम्मीद तथाकथित उलेमा सी की जानी चाहिये थी वो एक काफ़िर ( बक़ौल तथाकथित उलेमा) ने की,,,,,,इससे ज़्यादा शर्मिंदगी की बात क्या होगी ।



 शाज़िया आले अहमद दिल्ली की निवासी हैं जो फेसबुक के ज़रिए सामाजिक मुद्दों पर खरी- खरी लिखती रही हैं। मन और पेशे से वे एक शिक्षक हैं। स्थायी पता, लखनऊ।



Wednesday, October 29, 2014

शब्दों से भर जाना ही रीत जाना है।

रीत जाने के दिन
बहुत मुश्किल होते हैं...
कुढे हुए मन होते हैं
मानो वह रहस्य
जो सभी जानते हैं आस पास
और रह पाते हैं सामान्य
हमें मालूम न हो पाए कैसे भी...।
सपने मे खुद को देखा है
ज़ोर से चिल्लाते
जिस विकृत-अबूझ भाषा में
वह भी तो किसी एकांत में
नहीं हुई थी निर्मित
और जिस पढत की भाषा में होती है
व्याख्यायित वह चींख
वहाँ तक बँधे पुल का भी
अपना समाज शास्त्र नहीं है क्या ?
नहीं है सो जाने से डर स्वप्न के कारण
दरअस्ल
उसी भाषा का भय है मुझे
जिसमें मनोवैज्ञानिकों ने
लिख दिए शास्त्र
और ऐसी किताबों में
रीत जाने की व्याख्याएँ कितनी सरल होती हैं।
सरल होते होते उलझ गया है सब।
कम से कम मेरे साथ।
अब जाना है
पर्यायों की खोज  में निकलना कितनी मूर्खता है
जबकि पर्यायों , विपर्ययों ,विशेषणों और शब्दों से
भर जाना ही रीत जाना है।

Wednesday, October 15, 2014

जो आएगा बीच में उसकी हत्या होगी


तुमने कहा
बहुत प्यार करता हूँ
अभिव्यक्ति हो तुम
जीवन हो मेरा
नब्ज़ हो तुम ही
आएगा जो बीच में
हत्या से भी उसकी गुरेज़ नहीं
संदेह से भर गया मन मेरा
जिसे भर जाना था प्यार से
क्योंकि सहेजा था जिसे मैंने
मेरी भाषा
उसे आना ही था और
वह आई निगोड़ी बीच में
तुम निश्शंक उसकी
कर बैठे हत्या
फिर कभी नहीं पनपा
प्यार का बीज मेरे मन में
कभी नहीं गाई गई
मुझसे रुबाई
सोचती हूँ
इस भाषा से खाली संबंध में
फैली ज़मीन पर
किन किंवदंतियों की फसल बोऊँ
कि जिनमें
उग आएँ आइने नए किस्म के
दोतरफा और पारदर्शी
क्योंकि तुमने कहा था
जो आएगा बीच में
उसकी हत्या होगी ।

Friday, October 10, 2014

भाषा सिर्फ शब्द नहीं है न !

ठीक ही होगा यह जो
समझाते रहे हो तुम
कि एक धुरी होती है जीवन की
कि इतना कुछ
जो कहती ही रहती हूँ मैं
समेटा जा सकता है
एक शब्द में

और उसी एक के गिर्द घूमते हुए
अस्तित्ववान होती है परिधि
जिसमें वलयाकार लिपटी हैं वे परतें
जिन्हें उघाड़ना चाहती हूँ मैं

मैं चिंतित नहीं हूँ कि
क्या एक शब्द से
तुम निभा लोगे पूरा जीवन !!
मुझे भय है
क्या होगा ध्वनियों का
रंगों और बिजलियों का
अँधेरे और रोशनियों का
 इशारों और आकारों  का
जिन्हें छूकर मैं पा लेती हूँ
देखना
बोलना हो जाता है
गिरने में अँधेरा सुनती हूँ
और बिजलियों में पढ लेती हूँ आक्रोश
तुम्हारी पंक्तियों के   अंतरालों  में
लिख लेती हूँ कविता।

भाषा सिर्फ शब्द नहीं है न !

Saturday, September 20, 2014

पिछली सदियों में


पिछली सदियों में
जितना खालीपन था उससे
 मैं लोक भरती रही
तुमसे चुराई हुई भाषा में और चुराए हुए समय में भी।
तुम्हारी उदारता ने मेरी चोरी को
चित्त न धरा ।
न धृष्टता माना।
न ही खतरा।
 हर बोझ पिघल जाता था
जब नाचती थीं फाग
गाती थी सोहर
काढती थी सतिया
बजाती थी गौना ।
मैं खुली स्त्री हो जाती थी।
मुक्ति का आनंद एक से दूसरी में संक्रमित होता था।
कला और उपयोग का संगम
गुझिया गोबर गीत का मेल
अपने अभिप्राय रखते थे मेरी रचना में
इतिहास मे नहीं देती सुनाई जिसकी गूँज
मैं लिखना चाहती हूँ
उसकी चींख जो
मुझे बधिर कर देगी जिस दिन
उससे पहले ही।
मुझे अलंकरण नहीं चाहिए
न ही शिल्प
सम्भालो तुम ही
सही कटावों और गोलाइयों की
नर्म गुदगुदी
अभिभूत करती कविता !
मुझसे और बोझ उठाए नहीं उठता।
नीम के पेड़ के नीचे
चारपाई पर औंधी पड़ी हुई
सुबह की ठंडी बयार और रोशनी के शैशव में
आँख मिचमिचाती  मैं
यानि मेरी देह की
दृश्यहीनता सम्भव होगी जब तक
मैं तब तक नहीं कर पाओँगी प्रतीक्षा
मुझे अभी ही कहना है कि
मुझे गायब कर दिया गया भाषा का अपना हिस्सा
शोधना होगा अभी ही।






















Thursday, April 29, 2010

सिनेमा देखने जाएंगे तो गँवारू ही कहलाएंगे, मूवी देखिए जनाब !!

आप अपने घर को फ्लैट कहना पसन्द करते हैं या अपार्टमेंट ? फिल्म देखने जाएँ तो उसे सिनेमा देखना कहेंगे या मूवी ? भई तय रहा कि आप 'सिनेमा देखने जाएंगे ' तो गँवारू ही कहलाएंगे । मूवी देखिए जनाब !! ई मूवी अमेरिका वाला भाई लोग ने बनाया है न!

गुलामी कोई देश केवल भौतिक रूप से नही करता। गुलाम देश की भाषा भी गुलामी के संकेत देने लगती है और धीरे धीरे दिमाग ही गुलाम हो जाते हैं।अंग्रेज़ की गुलामी के दौर मे उपनिवेश का आर्थिक शोषण-दोहन किया जाता था । भारतेन्दु हरिश्चन्द्र शोषण के इस रूप को समझ रहे थे और कभी छिपे -खुले ज़ाहिर भी कर रहे थे ।'निज भाषा ' की उन्नति भी उनकी चिंता थी । उनकी ये मारक लाइने नही भूलतीं -

अंग्रेज़ राज सुख साज सजै सब भारी
पै धन बिदेस चलि जात इहै अति ख्वारी

वे ।कहने को आज हम आज़ाद हैं , पर क्या वाकई ? ये बड़े सवाल हैं , जिन पर रह रह कर मन मे विचार उठते हैं , दबते हैं , अपनी लाचारी से कराह उठती है , बैठ जाती है!और एक बड़े भारतीय जनसमूह के मन मे तो ऐसे सवाल उठते ही नही होंगे । उपनिवेशवाद ने आर्थिक गुलामी से कैसे मानसिक -भाषाई गुलामी का रूप ले लिया है यह अह्सास तीव्र रूप में कल हमें हुआ जब बच्चो के एक स्कूल की पत्रिका मे ब्रिटिश अंग्रेज़ी के शब्दों के नए अमेरिकी इस्तेमाल पढे वर्ना शायद मैं इस ओर कभी ध्यान न देती कि ब्रिटेन की अंग्रेज़ी को सर माथे लेने वाली कौम कब धीरे धीरे अमेरिकी अंग्रेज़ी को अपना कर इठलाने लगी।

देखिए -
अमेरिकन इंग्लिश - ब्रिटिश इंग्लिश
Apartment ----------Flat
Bar -----------------Pub
Cab -----------------Taxi
Corn ----------------Maize
Movie ---------------Cinema
Pants ---------------Trousers
Eraser---------- ----Rubber
Sick -----------------Ill
Vacation------------- Holiday
Can------------ tin
Flashlight ----------Torch
Overpass---------- Flyover
Faculty -------------Staff

ओह ! इरेज़र को रबर बोलना कितना खतरनाक हो गया है आप जानते नही है क्या ।

पहले कुठाराघात हिन्दी पर किया , स्वाभिमान को खतम करने के लिए ....अब देखिए हम उन्हे भी पीछे छोड़ कित्ता आगे आ गए हैं । अब हम सबसे बड़े बॉस की गुलामी में नाक ऊंची करते हैं।

Wednesday, April 28, 2010

आप कितने बड़े "मैंने" हैं

आप अक्सर कुछ लोगों से बात करना , मिलना अवॉइड करना चाहते हैं अलग अलग कारणों से।स्वाभाविक भी है।हर किसी से नही मिलता मन। लेकिन दुनिया ऐसे नही चलती न!कभी न कभी आपको उनसे टकराना ही पड़ता है।रियल दुनिया की दोस्ती छोड़कर आप वर्चुअल स्पेस मे ही भाग कर क्यों न आ जाएँ ..आप उस प्रवृत्ति से बच नही सकते जिसे हम अपनी मित्र मंडली मे "मैने" कहकर अभिव्यक्त करते हैं।

ये मैने कौन होते हैं?

मैने वे है जो आत्माभिभूत हैं और साथ ही जिन्हें लगता है कि समाज -बिरादरी -मित्र मण्डली में अपेक्षित स्थान सम्मान और आदर उन्हे नही मिल रहा जबकि वे तो कितने महान हैं।
आप उनसे टकराए नही कि उधर से शुरु हो जाएगा ....." आप ऐसा कैसे कह सकते हैं मैनें ज्ञान-विज्ञान का प्रसार किया है, मैने अपने सारे अंग मृत्यु से पहले ही दान दे दिए हैं, मैने अपनी पत्नी को अधिकार दिए हैं, मैने अपना पतिव्रत धर्म निभाया है, मैने तो ...मैने कभी किसी का अहसान नही लिया...मैने कभी बे ईमानी ....मैने ये.. मैने वो .... अरे आप क्या समझते हैं मैने सारी ज़िन्दगी हिन्दी की सेवा करने मे बिता दी....भई मैने ..........
मैने किसी की एक भी फालतू बात नही सुनी आजतक .. मैने अपने बच्चों को सबसे अच्छी एजुकेशन दी है , मैने तो अपने बच्चों को हमेशा फ्रीडम दी है.मैने... मैने ...मैं तो साफ साफ बात करता हूँ हमेशा चाहे बुरी लगे .... मै बहू-बेटी (या बेटा-बेटी भी हो सकता है) मे कोई फर्क नही करती ....

"मैनें तो हमेशा ही सधी हुई लेखनी चलाई है ... मैने हिन्दी ब्लॉग जगत मे हमेशा ही विवेक - विश्लेषण की चेतना पैदा करने की कोशिश की है....आप क्या जाने मैनें हिन्दी ब्लॉग जगत मे किस किस बात का प्रसार किया और इसी मे अपना जीवन लगा दिया...मैने हिन्दी ब्लॉगिंग के लिए ...ब्ला ब्ला ....मैने हिन्दी ब्लॉग जगत मे ...ब्ला ... ..मैने ....मैने ...मैने.......

और आप मेरी मेहनत को क्षण भर मे एक खराब टिप्पणी करके नष्ट कर देना चाहते हैं ....मैने कभी किसी को खराब कमेंट नही दिया...मैने कभी किसी की पोस्ट की बुराई नही की..... मैने किसी विवाद का आगाज़ नही किया ......मै तो आपके ब्लॉग पर कभी नही गया आपको ही क्या ज़रूरत पड़ी थी यहाँ आकर मवाद बिखेरने की...
हुँह !

आप जानते हैं मैने कैसे कैसे हालात मे अपना कॉलम लिखा है ?अपनी बीमारी के बाद अस्पताल से निकलते ही मैने फलाँ को बेटी के अपार्टमेंट में बुलाकर अपना कॉलम लिखवाया और नियत समय पर 'हँस' मे भेजा ..और आप यूँ की कह देते हैं कि हमने फलाँ लेख गलत लिखा (यह हिम्मत!!) साहित्य के लिए मैने जो जो सहा है कोई नही सह सकता , सबसे बढकर मैने हिन्दी की जितनी सेवा की है वह कोई नही कर सकता (निराला या कोई प्रेमचन्द भी नही) इतने साल मैने साहित्य के लिए झोंक दिए।मैने हमेशा प्रतिक्रियाओ का सम्मान किया।मैने कभी रुपए पैसे का हिसाब नही रखा।
और आपने किया ही क्या है जो टिप्पनी करने चले आते हैं?


आप हँसते हँसते कहेंगे कि जी हाँ आपने , आपने , आपने ....
सब कुछ आपने ...
हम तुच्छ प्रानी जाने क्यों इस धरती पर कीड़ों की तरह बिलबिला रहे हैं जबकि सारी क्रांति , सारा धर्म कर्म , सारा ज्ञान विज्ञान का प्रचार , सारी विद्वत्ता , सारा परोपकार तो आप ही करते आए हैं कर रहे हैं!!हम तो बे ईमान हैं, कामचोर हैं, हिन्दी की सेवा नही करते, विज्ञान का तो भी नही जानते,बच्चों को सबसे घटिया सस्ते स्कूल मे पढाते हैं,सबकी फालतू बात भी हम ही सुनते हैं...उधार करते हैं, हम अधर्मी हैं ....सबके अहसान लेते हैं ...हम साफ बात नही करते.. आप धन्य हैं ! अब हमे जाने दीजिए प्लीज़!अपन तो ये भी नही जानते कि यहाँ करने क्या आए हैं !
और आप पिण्ड छुड़ाकर भागेंगे।

-----------

चिंता न करें , इस लेख की कोई कड़ियाँ नही आने वालीं। वैसे आप तो जानते ही हैं मैने कभी व्यक्तिगत आक्षेप नही किए , न ही मैने किसी का कभी दिल दुखाया , मैने तो यही सोचा है कि कुछ समझ का विस्तार हिन्दी ब्लॉग जगत मे कर सकूँ ... भई मैने तो मैने मैने कभी नही किया :)

Tuesday, April 27, 2010

बच्चे हमारे खेत की मूली नही हैं !


















खुला बड़ा मैदान हो , घास हो , मिट्टी हो और दो चार बच्चे ...अब उन्हे किसी की परवाह नही ..वे मुक्त हैं ,उनकी दुनिया किसी वयस्क का उपनिवेश नही है , वे अपने नियम खुद बनाएंगे , खुद ही फैसला सुनाएंगे ..वे मिट्टी मे लोट पोट होंगे ...आप डपटते रहिए..वे आनन्द के गोते लगाएंगे ..आप झरने से बहते कल-कल पानी ,हवा मे झूमते पेड़ों की ताली बजाती पत्तियों और बुलबुलों के कलरव का सा आनन्द लेंगे उनके इस आनन्द भरे खेल मे।
लेकिन यह भी सपने जैसा लगता है।महानगरों में बच्चों के खेलने की जगहें लगातार कम हो रही हैं , मॉल बढ रहे है।जो पार्क हैं भी वे या तो बूढों के अड्डे हैं या जवानों ने सुबह शाम वॉक के लिए कब्ज़ा लिए हैं।बच्चों के लिए चेतावनियाँ लिख दी गयी हैं - साइकिल चलाना मना है , गेन्द लाना मना है , पकड़े जाने पर जुर्माना ...छोटे छोटे बच्चे सड़क पर क्रिकेट खेलें या साइकिल चलाएँ क्या ?
खेलना बच्चों के लिए ठीक वैसे ही ज़रूरी और नैसर्गिक क्रिया है जैसे कि भूख लगने पर भोजन करना।और जो अनुभवी हैं वे जानते हैं कि खेलना बच्चों को खाने से भी अधिक ज़रूरी और प्रिय दिखाई पड़ता है।खेल का समय बच्चों का वह स्पेस है जो बड़ों की दुनिया मे किसी भी तरह उन्हे हासिल नही होता।प्रकृति के समीप होना , आस पास को जानना , भावनात्मक , समाजिक और शारीरिक विकास के लिए 'खेलना'एक बेहद ज़रूरी बात है जिसे तमाम शिक्षाविद, समाजशास्त्री, बाल विशेषज्ञ बार बार कह चुके।शिशु-शिक्षण प्रणालियों में किंडरगार्टन और मॉंन्टेसरी पद्धति सभी मे खेल के द्वारा सीखने पर ज़ोर दिया गया।खेल मानवीय विकास का बेहद नैसर्गिक और बेहद सामान्य तरीका है।

बाहर खेलने की जगहें और अवसर ही नही रहेंगे तो बच्चे अपने आप टी वी , कम्प्यूटर जैसे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स की ओर रुख करेंगे।इसका एक बड़ा कारण शिक्षा और खेल पर बराबर ज़ोर न होना भी है । कितने स्कूल खेलने के लिए छोटे बच्चों को रोज़ के टाइम टेबल मे जगह देते हैं।नर्सरी का बच्चा भी पूरा दिन कक्षा मे बन्धक की तरह बिठाया जाता है। खिड़की से बाहर झाँकने और पढने के घण्टे में तितली पकड़ने मे मस्त होने पर बुरी तरह लताड़ा जाता है, दोस्त बनाने की कोशिश में शिक्षक की झिड़कियाँ खाता है , उस नन्हे आज़ाद पंछी को लगातार 'चुप' रहने को कहा जाता है।उन्हे खेलने दीजिए , बढने दीजिए ..नही तो वे कुण्ठित हो जाएंगे ।कैसे इन्हे समझाएँ कि स्कूल को जेल मत बनाईये जहाँ खेलने का समय बचाने के लिए बच्चा अपना टिफिन छोड़ दे और दिन भर भूखा रहे ।प्राण जाए पर खेल न जाए !
ऐसे मे यह महसूस होता है कि शिक्षा के अधिकार से भी ज़रूरी बाल- अधिकार 'खेलने का अधिकार' है जिसे हम बच्चों से छीन रहे हैं। राजेश जोशी की कविता 'बच्चे काम पर जा रहे हैं 'एक और दर्दनाक पक्ष दिखाती है।यहाँ वे बच्चे हैं जो किसी भी अधिकार से वंचित हैं , दर असल वे बचपन से ही वंचित हैं । वे असमय प्रौढ हो जाने को अभिशप्त हैं।खेल -कूद की उम्र मे काम पे जाना और पढने की बजाए गाहक को रिझाना सीखना उनके साथ वह अमानवीय अत्याचार है जिसे रोकने मे राज्य और समाज दोनों ही नाकाबिल साबित हुए हैं।

किसी भी समाज और देश का भविष्य इससे तय होता है कि वह अपने बच्चों ,भावी नागरिकों के साथ कैसे पेश आता है।बच्चे हमारे खेत की मूली नही हैं ! उन्हे उनका बचपन नही मिलना इस बात का संकेत है कि हमें हमारा भविष्य नही मिलेगा !

Wednesday, April 1, 2009

एलिस इन वंडरलैंड

अच्छी लड़की ।सीधा कॉलेज ।कॉलेज से सीधा घर ।आँखे हमेशा नीची । लम्बी बाह के कुर्ते और करीने से ढँकता दुपट्टा ।पढने मे होशियार ।शाम को कभी घर से बाहर नही निकली । छत पर अकेली नही गयी । यहाँ कैम्पस में सारी शिक्षा ,सारी संरचनाएँ ढह गयीं छत और आँगन और सड़कें एकाकार हो गयीं ।आज़ादी का पहला अहसास ।हॉस्टल के कमरे में पहली बार वोदका को लिम्का मे मिलाकर पिया और घंटों मदहोश रही ।खों-खों करते सिगरेट का पहला कश खींचा ।कैम्पस में ढलती शाम को सडक के दोनो किनारे फूटपाथ के किनारे बनी मुँडेरी पर दो दो छायाएँ दिखाई पड़ जातीं । मुख पर एक स्मित रेखा खिंच आती ।हॉस्टल की ज़िन्दगी । परम्परावादी घरों से निकली हुई लडकी के लिए एक एडवेंचर "एलिस इन वंडर्लैंड "जैसा ।कोई देख नही रहा ।देखता भी हो तो मेरी बला से,कौन फूफा- मामा- ताया -ताई लगता है ।
बहुत चाहा था कि हमें भी हॉस्टल भेज दिया जाए लेकिन माँ-पिताजी ने साफ इनकार कर दिया -'हॉस्टल में लड़कियाँ बिगड़
जाती हैं , और ज़रूरत भी क्या है हॉस्टल मे रहने की घर से कॉलेज एक घण्टा ही तो दूर है '।तो हमारा बस नही चला ,और कैसे कह देते कि बिगड़ना ही तो चाहते हैं हम भी , या हिम्मत नही हुई पूछ लें कि 'बिगड़ना क्या होता है '। तीखी प्रतिक्रिया के बाद खुद पर से ही विश्वास डगमगा गया और माता पिता का तो ज़रूर डगमगाया ही होगा यह सोच कर कि जाने क्यो अच्छी भली लड़की ऐसा कह रही है ,किसने सिखा -पढा दिया , गलत सोहबत मे तो नही पड गयी ।
बहुत सालों तक युनिवर्सिटी आते जाते देखती रही इठलाती लड़कियों को जो पी जी विमेंस मे आकर ठहरती थीं । वे अपने कपड़े खुद खरीदने जातीं , भूख लगने पर और मेस का खाना पसन्द न आने पर अन्य इलाज क्या हो सकते थे वे जानती थीं ,तमाम प्रलोभन सामने होने पर भी वे परीक्षाओं के दिनों मे जम कर पढाई करती थीं ,शहर के किसी कोने मे अकेले आना जाना जानती थीं ।
इधर हम फूहड़ता ही हद थे ।माँ के साथ ही हमेशा कपड़े जूते खरीदे । उन्हीं के साथ हमेशा घूमे । उन्हीं के साथ फिल्में देखीं ।कॉलेज हमेशा एल-स्पेशल से गये । कॉलेज भी एल-स्पेशल ही था । दिल्ली के पॉश इलाके का कॉंनवेंट कॉलेज । सामने भी एल -स्पेशल कॉलेज। नॉन एल-स्पेशल कॉलेज हमारे इलाके से बहुत दूर हटके थे । कोने मे पड़ा हुआ एक ऊंची ठुड्डी वाला कॉलेज जिसमें पढ कर हमने टॉप तो किया पर दुनियादारी में सबसे नीचे रह गये ।

उस वक़त मे हम यह भी सुना करते थे कि हॉस्टल मे पढी लड़की की शादी मे भी अड़चन आती है।भावी ससुराल वाले समझते हैं कि ज़रूर तेज़ तर्रार होगी वर्ना इतनी दूर आकर हॉस्टल मे कैसे रह पाती?शादी के बाद सबको नाच नचा देगी।
वह यही चाहते है कि लड़कियाँ दबें,वे झुकें,वे मिट जाएँ ॥ मै सोचती हूँ कि बिगड़ना लड़की के लिए कितना ज़रूरी है और तेज़ तर्रार होना भी।आत्मनिर्भरता की जो शिक्षा हॉस्टल मे रहते मिल जाती है वह झुकने और मिटने दबने नही देती।।माहौल थोड़ा बदला है शायद घर की घुटन और हॉस्टल की आज़ादी में अंतर कम हो गया है । पर अब भी बाहर से आयी लड़कियाँ यहाँ ज़िन्दगी के कड़े पाठ सीख रही हैं । उन सी आत्मनिर्भरता हममें अब जाकर आयी है , यह देख ईर्ष्या होती है । घर से दूर अकेले ,अनजान शहर में रहना और आना-जाना जो विवेक पैदा करता है वह सीधे कॉलेज और कॉलेज से सीधे घर वाली लड़्कियाँ शायद ही वक़्त रहते सीख पाती हैं ।

आज से दस साल पहले के मुकाबले आज दिल्ली जैसे शहर का वातावरण कहीं अधिक उन्मुक्त है।लेकिन इस उन्मुक्ति के आकाश में क्या वह आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान सच में दमक पाया है जिसकी मुझे हरदम उम्मीद है? जो उन्मुक्त हैं वे बेहद हैं केवल वर्गीय अंतर के कारण।साथ ही इस स्वतंत्रता मे समझ और सोच भी शामिल है इसका मुझे कुछ सन्देह है।
जो बन्धी थीं वे अब भी बन्धी हैं।रोज़ के समाचार उन्हें और डराते हैं।जो सचेत हुई हैं वे अब भी बहुत कम हैं!लड़की न जाने इस वंडरलैंड में कब तक भटकती रहेगी और अपनी पहचान खोज पाएगी !

Saturday, February 14, 2009

प्यार करने वाले कभी डरते नही,जो डरते हैं वो ...


जी हाँ , शायद वैलेंटाइंस डे का रंग है यह, मैने कभी नही मनाया, पर आज मनाने का मन है।जाती हूँ गुलाब खरीदने।पर पहले दो लाइने लिख दूँ।सोच रही हूँ,प्यार पर कुछ कहने का क्या हक बनता है जबकि इस एक नाम के मायने हर एक के लिए अलग अलग हो जातें हों।इसलिए प्यार क्या है पर नही कहना ही सब कुछ कह देने जैसा है।'ये भी नही,ये भी नही'करके शायद कोई उस तक पहुँच पाए।
शायद यह आश्चर्य की बात नही कि समाज फिल्मों मे प्यार करने वालों को जुदा होते देख जितना रोता है उतना ही खफा होता है जब यह सीन अपने घर मे देखने को मिल जाए। कत्लो गारत मच जाती है,लड़के-लड़कियाँ सूली से लटका दिए जाते हैं,राजवंशों के प्रेम की बात तो बिलकुल ही नही करूंगी।ऑनर किलिंग्स और इमोशनल ब्लैकमेलिंग पर केन्द्रित है मेरी दृष्टि।
ऐसा क्या है कि हमारा समाज प्यार का समर्थन नही करता लेकिन विवाह का पूरा पूरा समर्थन उसे प्राप्त है चाहे वह विवाह पीड़ादायक ही क्यो न हो, उसे निभाए चले जाना बहुत ज़रूरी बना दिया जाता है।अगर मै प्यार की फितरत पर जाऊँ तो बात कुछ समझ मे आती है।प्रेम अपने मूल स्वरूप मे आपको आज़ाद करता है, हिम्मत देता है,बहुत बार बागी बना देता है,अपनी ख्वाहिशों के प्रति सचेत करता है,और अकेलेपन की चाहत रखता है।
इसके ठीक विपरीत विवाह बान्धता है,उलझाता है,सामाजिक सुरक्षा सबसे ऊपर होती है,घरबारी आदमी पंगा नही लेना चाहता,समाज की अपेक्षाओं पर खरा उतरना चाहता है,ख्वाहिशों का केन्द्र बदल कर "अन्य" हो जाताहै,और विवाह हमेशा सार्वजनिक उत्सव की तरह मनाया जाता है और यह दखलान्दाज़ी ताउम्र चलती रहती है।
विवाह संस्थाबद्ध है तो प्रेम व्यवस्था-भंजक है।प्रेम एकांत है विवाह सामाजिक स्वीकृति है।शादी के नियम हो सकते हैं,प्यार का कोई रूल नही।

प्रेम और विवाह के इस मूल स्वरूप को समझ लेने के बाद साफ हो जाता है कि कोई भी मॉरल-सेना क्यों प्यार का विरोध करती है।प्यार आज़ाद करता है और हम आज़ाद ही तो नही होने देना चाह्ते।इसलिए आस पड़ोस ,घर परिवार नाते रिश्तेदारों से लेकर सभी प्यार के विरुद्ध अपने अपने बल्लम उठा कर खड़े दिखाई देते हैं।

समाज और व्यक्ति का यह द्वन्द्व हमेशा चलता रहता है और समाज दण्ड और पुरसकार की नीति अपना कर हमेशा ही व्यक्ति को नियंत्रित करने के प्रयास मे रत रहता है।यह दण्ड कंट्रोल करने वाले ग्रुप की समझ के मुताबिक घर-
निकाला भी हो सकता है,जायदाद से बेदखली भी हो सकती है,मौत भी हो सकती है या पार्क बेंच पर बैठा देख शादी करवा देना भी हो सकता है।
मुझे यह कहने मे कतई शक नही कि हमारा समय और समाज प्रेम विरोधी है,इसलिए मुझे हैरानी नही कि बहुत से माता-पिता वैलेंटाइंस डे की खिलाफत से प्रसन्न दिखाई दे रहे हों और मन ही मन मे राम सेना की जयजयकार भी कर रहे हों।प्यार अच्छा है, पर कहानियों में.....जिन्हें पीढी दर पीढी सुनाया जाए हीर-रांझे, सोनी-महिवाल की दुखांत गाथा के रूप मे अवास्तविक स्वप्नलोक की सूरत देकर।और सीख दी जाए हमेशा राम-सीता के वैवाहिक प्रेम के आदर्श की,प्रेम निवेदन पर जहाँ काट दी जाए नाक किसी स्त्री की।

Friday, February 13, 2009

यारी टुटदी है तो टुट जाए...

अशोक कुमार पाण्डेय said...
अरे अविनाश जी
विगत दस पान्च सालो का एक गाना बताइये जो स्त्री विरोधी ना हो!
फ़िल्म अब बाज़ारू माध्यम है और बाज़ार के लिये औरत की देह एक सेलेबल कमोडिटी तो और उम्मीद क्या की जाये।

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यूँ मै भी सहमत हूँ कि पंजाबी मे इस तरह की प्रेमभरी झिड़की लड़के लड़कियों को दी जाती है,मोए,मरजाणे,फिट्टे मूँ वगैरह वगैरह ....गाना लोकप्रिय हो रहा है...
पर फिलहाल मै सोच रही हूँ कि एक गीत कम से कम बॉलीवुड मे ऐसा है जो स्त्री विरोधी नही सुनाई देता, हालाँकि देखने से गीत मे हलकापन आता है पर सुनने पर यह किसी चोखेरबाली के शब्द प्रतीत होते हैं।हमारी तो बिन्दिया चमकेगी और चूड़ी खनकेगी , आप दीवाने होंते हों तो होते रहिए हम अपना रूप कहाँ ले जाएँ भला!!हम तो नाचेंगे आप नाराज़ होते हों तो हों!जवानी पर किसी का ज़ोर नही,इसलिए लाख मना करे दुनिया पर मेरी तो पायल बजेगी,मन होगा तो मैं तो नाचूंगी, छत टूटती है तो टूट जाए।और उस पर भी गज़ब लाइने यह कि - मैने तुझसे मोहब्बत की है, गुलामी नही की सजना ,दिल किसी का टूटे चाहे कोई मुझसे रूठे मै तो खेलूंगी , यारी टुटदी है तो टुट जाए।जिस रात तू बारात ले कर आएगा , मै बाबुल से कह दूंगी मै न जाऊंगी न मै डोली मे बैठूंगी , गड्डी जाती है तो जाए।फिल्म के सन्दर्भ से परे हटाकर ,एक प्रेमी को प्रेमिका की यह बातें कहते सुनें तो मुमताज़ चोखेरबाली ही नज़र आएगी।

आप सुनिए और बताइए -

Thursday, February 12, 2009

पिंक चड्डी - बहस का फोकस तय कीजिए

पिंक चड्डी का आह्वान सैंकड़ों कमेंटस दिला सकता है खास तौर से जब आपका ध्यान पिंक चड्डी का आह्वान करने वाली एक स्त्री पर केन्द्रित हो।पितृसत्तात्मक मानसिकता के आगे क्या रोचक बिम्ब उजागर होता होगा यह कल्पना करके? इसलिए सूसन की हिमाकत पर कीचड़ उछालना-उछलवाना ज़रूरी है जो उस बिम्ब का इस्तेमाल आपको शर्मिन्दा करने के लिए कर रही है जिसकी कल्पनाओं मे कभी किसी पुरुष ने ब्रह्मानंद की प्राप्ति की हो।आफ़्टर आल रात के दो बजे किसी बार मे पिंक चड्डी पहन नाचने वाली लड़की को झेला (एंजॉय)किया जा सकता है, मुँह पर तमाचे की तरह आ पड़ने वाली पिंक चड्डी का सामूहिक विरोध स्वरूप उपहार भेजने वाली को कैसे सहा जा सकता है?मेरी दिली इच्छा है कि टिप्पणी कार वाला काम करके सभी कमेंट्स को यहाँ चेप दूँ पर वही जाकर पढ लें , मै अपनी बात कहूंगी,यह काम टिप्पणीकार के लिए ही छोड़ दूँ।

यह पोस्ट देखी और इस बात से कतई हैरान नही थी कि पिंक चड्डी आह्वान के पीछे की ऐतिहासिक गतिविधियों को किनारे पर धकेल कर भ्रष्ट होती स्त्रियाँ और भ्रष्ट होते स्त्री आन्दोलन पर ही बहस होने वाली है क्योंकि शायद वहाँ पोस्ट का फोकस ही यह था।
मै समझना चाहती हूँ कि पिंक चड्डी की ज़रूरत क्यों आ पड़ी होगी?

पिंक प्रतीक है - स्त्रैण का ।
चड्डी और वह भी जनाना - प्रतीक है स्त्री की प्राइवेट स्पेस का।


अब देखिए -
पब मे दिन दहाडे(रात के दो भी नही बजे थे)आप लड़कियों को खदेड़ खदेड़ कर मार मार कर चपत घूँसे लगा लगा कर और दुनिया भर के पत्रकार बुला कर उनके सामने अपने शौर्य का प्रदर्शन कर रहे हैं।किसी स्त्री के अंग को आपको हर्ट करने , छूने का अधिकार किसने दिया? उसके इस प्राइवेट स्पेस मे दखल देने का अधिकार आपको किसने दिया?उन लड़कों को मैने पिटते नही देखा जो उस वक़्त साथ थे।यह कितना अपमानजनक था किसी स्त्री के लिए एक सभ्य मनुष्य़ समझ सकता है।
अगर दुनियावाले लड़कियों मे यह डर बैठाना चाहते हैं कि रात को दो बजे घूमोगी तो हम तो रेप ही करेंगे तो मुझे लगता है कि अहिंसात्मक विरोध के लिए प्राइवेट स्पेस के प्रतीक के रूप मे पिंक चड्डी से बेहतर विकल्प नही हो सकता,जबकि इस लोकतांत्रिक देश की सरकार मुतालिख जैसों को कानून के साथ खिलवाड़ करने की छूट दे रही हो और हर गली नुक्क्ड़ पर दो चार संस्कृति के स्वयमभू ठेकेदार लड़कियों का राह चलना दूभर कर दें और हम मे से कोई किसी एक स्त्री की फजीहत करते हुए उसके मोबाइल का नम्बर बांटने लगें।

कुछ लोग इंतज़ार मे है कि देखते हैं कौन शर्मिन्दा होता है - मुतालिख या निशा सूसन ?

इस प्रश्न मे निहित है कि वे मान कर चल रहे हैं कि इस मुद्दे मे उनका कोई कंसर्न नही , वे तमाशबीन की तरह केवल और केवल सूसन के शर्मिन्दा होने की बाट जोह रहे हैं।भई, स्त्री अपनी चड्डी भेजेगी तो शर्मिन्दा उसे ही होना चाहिए न !!

जो समाज जितना बन्द होगा और जिस समाज मे जितनी ज़्यादा विसंगतियाँ पाई जाएंगी वहाँ विरोध के तरीके और रूप भी उतने ही अतिवादी रूप मे सामने आएंगे।सूसन के यहाँ अश्लील कुछ नही, लेकिन टिप्पणियों मे जो भद्र जन सूसन पर व्यक्तिगत आक्षेप कर रहे हैं वे निश्चित ही अश्लील हैं।मुझे लगता है यह तय कर लेना चाहिये कि इस बहस का फोकस क्या है , सूसन या रामसेना या पिंक चड्डी या स्त्री के विरुद्ध बढती हुई पुलिसिंग और हिंसा।

या चड्डी निर्माता और चड्डी विक्रेता या तहलका ।

बड़ा मुद्दा क्या है ? असल मुद्दा क्या है?

Tuesday, January 20, 2009

जो ब्लॉग तक मे नही है

प्रशांत की पोस्ट "प्रेम करने वाली लड़की जिसके पास एक डायरी थी" पढकर सहसा मन मे आया कि वाकई हर लड़की के पास एक ऐसी लिखी-अनलिखी डायरी ज़रूर होती है जिसे वह अपने प्रेमी-पति-निकटस्थ से छिपाती है।यूँ यह व्यक्तिगत स्पेस का मामला माना जा सकता है क्योंकि यह कतई ज़रूरी नही कि हर व्यक्ति अपनी डायरी को सार्वजनिक करना,या कम से कम कुछ दोस्तो के साथ बांटना ही चाहे।यह उसका अपना इलाका है और मनोविज्ञान की माने तो मानव मन की कई ऐसी परते हैं जिसके बारे मे वह खुद भी बहुत नही जानता तो दूसरे तो क्या ही जानेंगे।मै क्या और कितना बताना चाहती हूँ यह तय करना मेरा अधिकार है ,सही है।
लेकिन बात मै कहीं और भी ले जाना चाह्ती हूँ।
चूँकि "डायरी" हिन्दी लेखन की एक अलग विधा है सो इतना तो तय है कि किसी व्यक्ति की नितांत निजी अभिव्यक्तियों में कुछ ऐसा ज़रूर है जो डायरी लेखन को एक विधा का दर्जा दिलाता है।बाहर की दुनिया में देखे गए ,भोगे गए अनुभवों की कोई व्यक्ति कैसी व्याख्या करता है और उस व्याख्या मे उसके अपने जीवन के भोगे गए ,देखे गए यथार्थ क्या भूमिका अदा करते हैं यह जानना बहुत दिलचस्प हो सकता है।और अक्सर उपयोगी !
वह डायरी जहाँ कोई लड़की अपने राज़ छिपाती है वह अप्रत्यक्षत: उसके समाज ,उसके परिवेश,उसके समय और उसकी मन:स्थिति की आलोचना के लिए पुष्ट आधार बन सकते हैं।ठीक वैसे ही जैसे सपना की डायरी या आज से लगभग एक शताब्दी पूर्व लिखी गयी दुखिनी बाला की जीवनी।
अब मै यह सोचती हूँ कि हम जब खुद को छिपाना चाहते हैं तो उसके पीछे की मानसिकता क्या है ? क्या हम एक विशिष्ट छवि को बरकरार रखना चाहते हैं? और नितांत निजी डायरी शायद दुनिया की नज़रों मे आपको पतनशील ,बागी , बेवफा ,बे ईमान ,कायर ,पागल या ऐसा कुछ लेबल दिलवा सकती है जिसके कारण आपकी बनाई छवि , अपेक्षित छवि टूट सकती है और आपका सीधा सपाट चलता खुशहाल(जो शायद प्रतीत ही होता है)जीवन नष्ट हो सकता है।
ऐसे मे भी मुझे लगता है कि बाहरी दबाव डायरी लिखने और फिर उसे छिपाने के पीछे काम करते हैं , ऐसा कतई नही है कि कोई व्यक्ति चूँकि एक निरपेक्ष जीव है इसलिए वह यह प्राइवेसी चाहता है।इस मायने मे पर्सनल जो भी है वह दर असल पॉलीटिकल है।
इस या उस ब्लॉग पर लिखते हुए भी किसी का दिमाग यदि सावधान दिमाग है तो वह खुद ब खुद शब्दों,वाक्यों,घटनाओं मे एक ऐसा फिल्टर लगा देगा कि जो सामने आए वह वही हो जो वह चाहता है कि आए।शायद कुछ मानक हैं ,कुछ मापदण्ड जिसके अनुसार हम अपनी हर एक पोस्ट सम्पादित करते हैं और वही दिखाते हैं जो दिखाना ठीक हो मानको के अनुरूप।ये मानक कौन तय करता है? समाज !

लेकिन मानव मन की यह चालाकी क्या हर बार काम करती है ? कहीं न कहीं लाइनों के बीच का अनलिखा दिख जाता है और ताड़ने वाला दिमाग उस महत्वपूर्ण अनलिखे को समझ कर नृतत्वशास्त्र ,समाज्रशास्त्र,साहित्यशास्त्र,सबॉल्टर्न इतिहास जैसे महत्वपूर्ण ज्ञान शाखाओं के लिए अमूल्य अवदान दे जाता है।
मै सचमुच चाहती हूँ कि प्रेम करने वाली उस लड़की की डायरी मै पढ सकूँ और जान सकूँ कि वह सरल लड़की कैसे बनाई गयी थी,खुद को छिपाना उसे कैसे सिखाया गया था ,उसकी सामाजिक कंडीशनिंग किस तरह हुई थी और प्रेम को लेकर उसकी अवधारणा अपनी थी या समाज की दी हुई?जो भी हो मै उम्मीद करना चाहती हूँ कि प्रेम करने वाली लड़की अपने परिवेश परिवार और समाज के दबावों से मुक्त होकर प्रेम करे और उसकी डायरी सामाजिक लर्निंग के विखण्डन की प्रक्रिया की ओर उसे ले जाए ..इस तरह से डायरी लिख लिख कर छिपाने की उसे ज़रूरत न रह जाए और कभी अचानक हाथ लग जाने पर उसकी डायरी सपना की डायरी की तरह सन्न ,अवाक कर देने वाली न हो।

Friday, January 9, 2009

अस्तित्व की आत्मा है गन्ध

फिल्मों की समीक्षा कभी लिखी नही इसलिए ऐसा कोई अनुभव नही है (फिल्म समीक्षा यह है भी नही)पर आम भारतीय नागरिक होने के नाते आस-पास ,परिवार,राजनीति,कल्चर,इतिहास सभी पर छींटाकशी करने की अपनी भी कुछ आदत है ही :-)आप इसे व्यंग्य समझ सकते हैं पर यह सच बात है।
खैर ,
आज की चिट्ठाचर्चा की शुरुआत मे एक फिल्म का ज़िक्र किया था मैने।"पर्फ्यूम : द स्टोरी ऑफ़् अ मर्डरर" जो साल 2006 मे आई थी।मूल रूप से यह फिल्म पैट्रिक ससकिंड के जर्मन मे लिखे गए उपन्यास "डास पर्फ्यूम"(1985)पर आधारित है।अठाहरवी शताब्दी के फ्रांस मे जन्मा जॉन बप्टीस ग्रैनुली जिसके पास सूँघने की अद्वितीय शक्ति है मछली बाज़ार मे मछली बेचने वाली एक स्त्री की पाँचवी संतान है जिसे अपनी अन्य संतानो की तरह माँ बाज़ार के बच जन्मते ही अपने शरीर से अलग कर देती है मरने के लिए और वापस खड़ी हो जाती है मछली खरीदने आए ग्राहकों के सामने।लेकिन वह बालक रो उठता है और आस पास वाले जान जाते है ,माँ को फाँसी पर लटकाया जाता है हत्या के जुर्म मे और ग्रेनुली अनाथालय भेजा जाता है।आठ नौ वर्ष की अवस्था मे उसे एक दास के रूप मे बेच दिया जाता है। इसी दासत्व के दौरान तरुण होने पर उसे काम के सिलसिले मे एक पर्फ्यूमर बाल्दिनि के घर जाने का मौका मिलता है।यहीं बाल्दिनी को उसकी अनोखी घ्राण शक्ति का पता चलता है और बाल्दिनि की शागिर्दी मे ग्रेनुली दुनिया की बेहतरीन सेंट बनाता है।लेकिन अब भी उसकी मुश्किल है कि इंसान की गन्ध को कैसे सुरक्षित किया जा सकता है।और खूबसूरती को संजोने के लिए उसकी गन्ध को सहेज लेना ही सबसे अच्छा तरीका है ताकि वह कभी न मरे ।उसे वह लड़की नही भूलती जिसका पीछा वह उसके बदन से आती एक विचित्र खुशबू के कारण करता है और अनचाहे ही उस की जान ले लेता है।उसे अपने आस पास के मानवीय शरीरों की गन्ध एक दूसरे से अलहदा साफ पता चलती है।
इसी बेचैनी मे एक गुफा मे सात साल के एकांतवास के बाद उसे अहसास होता है कि जहाँ हर इंसान के बदन मे एक गन्ध बसती है जो उनके अस्तित्व का प्रमाण है वहीं उसका अपना शरीर नितांत गन्धरहित है।
अपने मास्टर बाल्दीनी के बताए एक ऐसे पर्फ्यूम को बनाना सीखने के लिए वह ग्रास Grasse की ओर निकल पड़ता है जिसे सूँघते ही मनुष्यों को अहसास हो कि वे स्वर्ग मे हैं और सभी के मन मे सात्विक , पवित्र भावनाएँ भर जाएँ।इस सेंट के लिए वह एक के बाद एक 25 कुमारी लड़कियों की क्रूरता से हत्या करता है और उनके बालों सहित पूरे शरीर की गन्ध को उनकी को निचोड- लेता है।अंतत: शहर के कोतवाल की खूबसूरत बेटी लौरा के बदन की गन्ध मिलाकर एक ज़रा से शीशी मे जो सेंट तैयार होता है उसे वह अपने पकड़े जाने के बाद सारे शहर के बीच ऊंचे मंच पर जल्लाद के सामने जब खोलता है और सिर्फ एक बूँद रुमाल पर रखकर उड़ा देता है ..तो आस पास सब बदल जाता है ..कसाई पैरों पर गिरकर उसे एंजल कहता है ,बिशप सहित शहर के सभी लोग रात भर प्यार ,स्नेह और मानवीय भावनाओं मे डूबे हिप्नोटाइज़ से रह जाते हैं।

उधर ग्रेनुली अपनी जन्म स्थली पर वापस जाता है और कसाइयों मच्छीमारों के हिंसक ,अशिक्षित ,अमानवीय लोगों के झुँड के बीच वह शीशी खुद पर ही डाल लेता है। देखते ही देखते इनसानो का वह झुँड उसे इस कदर लिपटता है कि अनतत: कुछ नही बचता।

फिल्म एक थ्रिलिन्ग , भयमिश्रित , रहस्यमयी प्रभाव छोडती है। एक फिल्म के रूप मे बहुत प्रभावी है। माना जाता है कि उपन्यास के मुकाबले उसे कम क्रूर दिखाया गया है। कुल मिलाकर फिल्म शॉकिंग है।
यदि उपन्यासकार की दृष्टि से देखा जाए तो यह मुझे ज़्यादा डराने वाली बात थी कि उपन्यास मे थ्रिल्ल , सनसनी , शॉक के प्रभाव को अतिशय बनाने के लिए खूबसूरत , वर्जिन लडकियों की सीरियल मर्डर की योजना बनाई गयी है। यूँ हैरान नही होना चाहिये क्योंकि कवाँरी लड़कियों के महत्व के साथ साथ इस तरह की अमानवीयता संसार भर की सभ्यताओं की विशेषता है। और यूँ भी यह इस विचार की अच्छी पोषक है कि मानवीय गुण और मानवीय सम्वेदों को प्रभावित करने वाली गन्ध केवल फीमेल मे होती है।शायद ब्यूटी,स्त्री,और सात्विकता को पर्याय बना दिया गया है।
एक दूसरी बात जो मुझे समझ नही आती वह है फिल्म का ऐतिहासिक सन्दर्भ ।क्या यह कथा काल्पनिक है ? या इस तरह का कोई प्रमाण हमें अठाहरवीं शताब्दी के फ्रांस मे मिलता है?जैसा कि विकिपीडिया -इसे इतिहास और साहित्य का हाइब्रिड कह्ता है।
जो भी है उपन्यास पढना वाकई एक अलग अनुभव होगा जब फिल्म ही तरह तरह की गन्धों का जीवंत अह्सास करवा देने मे सक्षम है तो उपन्यासकार की इस बेस्ट सेलर को पढना और भी रोमांचकारी होगा।
फिलहाल यूट्यूब पर से एक क्लिपिंग दे रही हूँ -

Wednesday, October 22, 2008

आप भी लुत्फ लीजिये न ..बहस वहस जो भी...व्हाटेवर ... हो उसे छोड़िये !

"कोई फर्क नही अलबत्ता" या कि आज के कुछेक खाते-पीते युवाओं की बेलौस वाणी की तर्ज़ पर कन्धे उचका कर मुँह बिचका कर कहें "whatever !!" ...बहुत बार इस रवैये के साथ कुछ लोग किसी गम्भीर बह्स में कूद जाते हैं और अपने दो चार जाति भाइयों के साथ मिलकर ठिठोली का विषय बना लेते हैं सारे मुद्दे को । उस पर अगर बहस किसी ऐसे मुद्दे पर हो जिसमें स्त्री की अस्मिता, मुक्ति या परम्परागत छवि के बरक्स नवीन छवि की बात उठती हो ,स्त्री को प्रभावित करने वाले कानूनी संशोधनों की बात हो तो बहस की आग मे हाथ तापने वाले "व्हाटेवर" वाले बेखयाल , बेपरवाह लोग निरंतर परम्परा और संसकृति की दुहाई देते हैं और तर्क के बदले "भावनाओ को समझने की बात भी करते हैं " और उस पर तुर्रा यह कि सामने वाला अतार्किक है ।भाई हम तार्किक हैं तभी शायद भावनाओं से आगे जाकर सोच रहे हैं,इसलिए भावनाएँ तो आप ही समझें कृपया !
हम बड़े आराम से यह मुद्दा किसी मंच से उठा सकते थे पर क्या करें कि औरों को तो फर्क नही पड़ता होगा अपन को पड़ता है जब बहस व्यक्तियों के नामों के सहारे शीर्षक बना बना कर हिट्स लेने वाली मानसिकता से शिथिल और हास्यास्पद हो जाती है।"...वालियों" को बदनाम करने मे मेरा भी पूरा हाथ होगा ही , इसलिए जब बात अपन के नाम से होने लगी है तो अच्छा है कि मंच का दुरुपयोग न करके मै अपने ब्लॉग से आवाज़ बुलन्द करूँ !18 अक्तूबर की बात और हम अब जाग रहे हैं तो भई क्या करें दुनियावी मानुषों की तरह अपने के जीवन के भी कुछ पचड़े हैं ही रोटी पानी कमाने के , सो तब देखा नही , और ऐसे हितैषी भी नही है ब्लॉगजगत मे अपने कि तुरंत फोन की घण्टी घुमा दें -कि भई आपकी पोस्ट या कमेंट से बवाल हुआ ...आप जल्द जवाब दें ....{अच्छा ही है कि हमारा साबका समझदारों और सयाने ब्लॉगरों से है}
जिनकी सोच किसी खास दायरे मे कैद हो वे बहस नही केवल कुतर्क ..या कहें प्रलाप कर सकते हैं ,और जो अपने तर्क {?} के समर्थन में गवाहों को पेश करने लगे तो अपन को बिलकुल भी सन्देह नहीं कि यह .....वालियों का भय है और खाली दिमाग वाली कहावत चरितार्थ हो रही है ....और कविता मे कहें तो यह सोच कुछ ऐसी है कि ---

हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद है ,
सूरत बदले न बदले
ब्लॉग हिट होना ही चाहिये
...
व्यक्तिगत हमले बाज़ी न माना जाए इसलिए अपन ने लिंक नहीं दिये हैं ,ब्लॉगजगत मे बेशक दो चार मूढ होंगे ही पर बाकी बहुत समझ दार भी हैं सो वे लिंक स्वयम खोज लेंगे ।जिन खोजाँ तिन .....
और जब आप भी लुत्फ ही उठा रहे थे "....वालियों" को उकसा कर ,नाम ले लेके आमंत्रित कर कर के तो अपना उद्देश्य भी कोई फर्क नही अलबत्ता वाले अन्दाज़ मे मज़े लेने का हो आया है जी :-) सो यह पोस्ट नमूदार हुई है आपकी जानिब ।
आप सब सुधीजन मज़े लें क्योंकि हिन्दी ब्लॉगजगत हो या हिन्दी पत्रकार या बाकी हिन्दी वाले सब अबही तक टुच्चेपन मे ब्रह्मानन्द खोज रहे हैं ।सो ये हमरी ओर से टुच्चेपन के महायज्ञ मे एक छोटी सी अतार्किक आहुति !

Friday, September 5, 2008

बचपन के हत्यारे स्कूल

वह 6 साल का नटखट बालक नही जानता था कि “सस्पेंडिड” के मायने क्या होते हैं| स्कूल से सस्पेंशन और वह भी उस काम के लिए जो उसकी उम्र में नीन्द और भूख जैसी ज़रूरत है , स्वभाव है ।इसलिए बहुत सम्भव है उसके लिए “नॉटी”होने की सज़ा स्वरूप मिला स्कूल से 6 दिन का सस्पेंशन अचानक मिली छुट्टियों से कम मज़ेदार न हो। लेकिन उसका यह भोलापन कुठाराघात का शिकार हो गया है और बचपन की मौज मस्ती काफूर हो गयी है। वह स्थान जिसे अब तक परिवार और मन्दिर की तरह एक पवित्र संस्था मानने की परम्परा है ,जहाँ हम अपने बच्चों को मानवीयता, शिष्टाचार और जीने की तमीज़ सीखने भेजते हैं वही स्थान उस बचपन के लिए कितना खतरनाक और अमानवीय हो सकता है इसके साक्षात उदाहरण हम कई बार देख चुके हैं। टैगोर इंटरनेशनल स्कूल के पहली कक्षा के छात्र लव दुआ के साथ जो हुआ वह एक और घण्टी है उस खतरे की जो स्कूलों मे जाने वाली हमारी नन्ही जानों पर आन पड़ा है।

स्कूल में जब बच्चा पहला कदम रखता है तो उसकी आयु मात्र 3 साल होती है ,वह परिवार माँ-दादी –दादा के संरक्षण और दुलार से पहली बार बाहर निकलता है , उसके लिए सारी दुनिया वयस्कों का बनाया एक ऐसा तिलिस्म होती है जिसमें कब कहाँ हाथ रख देने पर कौन सा खज़ाना खुल जाएगा या कब कौन सी दीवार ढह पड़ेगी या ज्वाला मुखी फट पड़ेगा वह नही जानता । उसके लिए खेल , आनंद ,और शरारत के साथ साथ एक सहज प्रश्नाकुल जिज्ञासा के अतिरिक्त और कुछ समझ आने वाला नही होता। ऐसे में जब स्कूल उस नन्हे जीव को भावनात्मक सुरक्षा देने के स्थान पर दुत्कार , प्रताड़ना और उलाहने देता है तो स्कूल का मतलब ही बदल जाता है।वहाँ जाना भय का पर्याय हो जाता है और छुट्टी आनन्द का।
अभी “तारे ज़मीन पर ” जैसी फिल्में बहुत पुरानी नहीं हुईं जिसे सराह सराह कर अभिभावक-शिक्षक थक नही रहे थे। शारीरिक दण्ड जाने कब से स्कूलों मे प्रतिबन्धित


मैं समझने की कोशिश करना चाहती हूँ उस मनस्थिति को ,उस वातावरण को जिसमें अध्यापक एक दरिन्दे मे तब्दील होता है और स्कूल जेलखाने में।प्रबन्धकों का दबाव, कार्यभार की अधिकता, वेतन की कमियाँ वगैरह । लेकिन किसी भी तरह यह बात समझ नही आ रही कि किसी 6 साल के बच्चे का “नटखट” होना असहज , अस्वाभाविक बात कैसे है।क्या बालपन अपराध है ? दिल्ली और एन सी आर के बहुत से मान्यता प्राप्त स्कूल हमारे अधिकांश बच्चों के साथ यही सुलूक कर रहे हैं। वे न केवल उनके बचपन की हत्या कर रहे हैं वरन उनकी समझ की भी हत्या करके उन्हें वह समझा रहे हैं जो वे समझते हैं कि ठीक है।स्कूल के पहले ही दो-तीन दिनों में नन्हे बच्चे को , जो शिक्षक को अभिभावक से भी बड़ा दर्जा देता है उन्हें समझा दिया जाता है कि तुम मूर्ख हो – कुछ नही जानते – इसलिए चुपचाप सुनना तुम्हारा परम कर्तव्य है।अधिकांश अध्यापक इस समझ के साथ आते हैं कि बच्चा कोरा कागज़ है। शुरुआती दिनों में ही उन पर “स्लो”, “नॉटी”,”सुस्त” “स्मार्ट””डिसलेक्सिक” जैसे लेबल चिपका दिये जाते हैं और बारहवीं कक्षा तक वे अध्यापकों के कवच की तरह काम करते हैं।और हद है कि 12 साल मे बालक की उस प्रवृत्ति मे कोई बदलाव नही होता ।प्रतिस्पर्द्धा की अन्धी दौड़ मे अपने बच्चों को आगे रहने काबिल बनाने के लिए अभिभावक स्कूल के इस व्यवहार से निभाने की भरपूर कोशिश करते हैं।अधिकांश स्थितियों में तो वे इस बात से परिचित भी नही होते कि जो शिक्षण पद्धतियाँ उसके बच्चे के स्कूल में अपनाई जा रही हैं उनमें कहीं गड़बड़ है ।


इसमें कोई शंका नही कि छोटे बच्चे के लिए स्कूल का सबसे बड़ा उद्देश्य होना चाहिये कि बच्चे का स्कूल जाने का मन करे लेकिन अफसोस कि उसी को हासिल करने मे स्कूल असफल हैं । इसके लिए सबसे ज़रूरी है कि स्कूल में पहुँचते ही बच्चे को भावनात्मक और शारीरिक सुरक्षा का आश्वासन मिले और वह भरोसा करना सीखे । गिजुभाई ने प्राथमिक शिक्षा पर अपनी प्रसिद्ध पुस्तक का नाम ‘दिवास्वप्न’ क्यों रखा था यह कुछ कुछ अनुमान होने लगा है।दिनदहाड़े ,खुली आँखों से सपना देखने की हिमाकत करना असम्भव को साकार होते देखने के बराबर है।प्राथमिक शिक्षा को लेकर वे जैसे सम्वेदनशील थे वह अध्यापकों,अभिभावकों व स्कूल प्रबन्धनों के लिए मिसाल होना चाहिये ।पर अफसोस कि शिक्षा जगत प्राथमिक शिक्षा में बच्चे के प्रति सम्वेदनशील होना शायद कभी नही सीख पाया। शिक्षक-प्रशिक्षण के विभिन्न कोर्सों की यह सबसे बड़ी कमी है कि वे अध्यापकों को बालमन और बाल प्रवृत्तियों को समझना ही नही सिखा पा रहे।वे नही सिखा पा रहे कि नटखट होना बच्चे का स्वभाव है, नैसर्गिक प्रवृत्ति है।वे उन्हें पहले दिन से ही प्रौढ बना देना चाहते हैं।

स्कूलों को पहले दिन से ही ट्रेंड बच्चे चाहिये जो अपना काम समय पर पूरा करने , टेस्ट में नम्बर लाने , कक्षा मे चुप बैठने, अध्यापक के कहे को पत्थर की लकीर मानने , और अपनी समझ –सहजता-बालपन का त्याग करके इस दोहे का गूढार्थ समझ लें ।6-7 साल का बच्चा बाहर खुले-खिले बड़े मैदान में तितली को उड़ता देख उसे पकड़ने की बजाए श्याम पट्ट पर लिखी पढाई को टीपे ।जब बच्चे का व्यवहार अध्यापक के अनुरूप नही होता तो उसे अनेक तरीकों से हतोत्साहित किया जाता है।ऐसे में लीक से हटकर चलने वाले बच्चे या तो हतोत्सहित और असहाय महसूस करते हैं या बागी हो जाते हैं ; और उनके बागी स्वभाव को स्कूल व अध्यापक तरह तरह के अपराधों की श्रेणी मे रखकर विचित्र प्रकार के दण्ड की व्यवस्था करता है ।
अब तक की हमारी समाजिक -शैक्षिक अधिगम ने यही सिखाया है कि जो बच्चा जितनी जल्दी व्यवस्था से समझौता कर ले ,अपनी वैयक्तिक विशिष्टताओं को छोड़ एक “यूनिफॉर्मिटी” के तहत भीड़ बन जाए ,उतना ही सफल और सुखी होगा ।“खेलोगे कूदोगे होगे खराब..” जैसी कहावतें सुना सुना कर हमें और हमारे बच्चों को ऐसा भीरू,चुप्पीपसन्द ,कायर और रीढविहीन बना दिया गया है कि हम खुद सवाल उठाए बिना स्कूल के कायदों पर चलने लगते हैं। “करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान” ने घिस-घिस और रट-रट की मानसिकता को बुद्धिमता का पर्याय बना दिया।सवाल उठाने की संस्कृति न हमें मिली , न हमारे बच्चों को मिल रही है। ऐसे में लव दुआ का केस और डराता है कि हर दिन अपने बच्चे को स्कूल भेजते हुए अनजाने भय से रूह काँपती है कि कहीं हमारे दिल का टुकड़ा कैसी कैसी छींटाकशी , पिटाई ,अपमान , भेदभाव और भेद-भाव को सह रह होगा या ईश्वर न करे किसी दिन जीवन भर के लिए किसी भयंकर मानसिक-शारीरिक क्षति का शिकार न हो जाए।

Wednesday, September 3, 2008

आओ बहनो , पहनो बुर्खा


स्त्री जाति हृदयहीन नही है। माँ , बहन ,बेटी,पत्नी,सखी ,साथिन - सभी रूपों में उसने अपने साथी पुरुष को हमेशा सम्बल दिया ,उसके हितों को सर्वोपरि रखा। लेकिन आज के युग मे वह पुरुष पर अत्याचार करने लगी,बलात्कार करने लगी ,कलहकारिणी हो गयी, अर्द्धनग्न हो गयी ,कामिनी बन बन जवान पुरुषों को कामोन्मत्त करने लगीं ऐसा कि वे प्रताड़ित ,शोषित महसूस करने लगे।इतनी अर्द्धनग्न बालाएँ देख आज का जवान {प्रौढ और बूढा भी}अपने मन को कैसे काबू में रखे।खूंटे से बान्धे रहे ?आज तक बन्धा है कभी ? बान्ध लेंगे तो जैसे ही किसी दिन रस्से खुली या टूटी सब्र ढह जाएगा और अनर्थ हो जाएगा। सब इन नारीवादी ,आधुनिकाओं ,नये ज़माने की औरतों के कारण जो अपना तन ठीक से ढंकती नही।
बहनो,
ऐसा अत्याचार देख मेरा मन द्रवित हो रहा है। साड़ी में नाभि दिख जाती है , कमर दिखती है ,पीठ भी दिख जाती है ,ऑफिस में पुरुष कैसे काम करेगा ? बस में बिना चिपके कैसे खड़ा रह सकेगा?
जींस में फिगर दिखती है । कामिनी की कल्पना कर कर साथी पुरुष कैसे काम -पीड़ित हो रह पाएगा?बताइये भला ?क्या आप उन्हें बलात्कार या छेड़खानी की मानसिक ग्लानि से आज़ादी नही दिलवाना चाहतीं ?

ब्लाउस में भी क्लीवेज दिख जाती है ।सलवार-कमीज़ पर दुपट्टा न डालो तो उभरे उरोज़ देख बेचारा पुरुष पटखनियाँ खा खाकर बेहाल हो जाता है।
क्या आप वाकई पुरुष समाज को इतना दुख देना चाहती हैं ?अधिकांश अच्छी बहनें "नहीं" में उत्तर देंगी। और उपाय खोजना चाहेंगी ।
मेरे पास एक बढिया उपाय है । क्यों न हम सभी आज से बुर्खा पहनने का प्रण लें और बढते बलात्कारों और बदतमीज़ियों को होने से रोकें। साथ ही हमारे पुरुष साथियों का भी भला होगा। न नाभि ,पीठ,कमर ,यहँ तक कि चेहरा{कटीले नैन ,रसीले होंठ}दिखेंगे न ही वे मानसिक रूप से बलत्कृत होंगे।
और यूँ भी पुरुषों से अधिक स्त्रियां बलात्कार करती हैं, लेकिन वे मानसिक सतह पर करती हैं इस कारण बच जाती हैं. समाज में जहां भी देखें आज अधनंगी स्त्रियां दिखती हैं. पुरुष की वासना को भडका कर स्त्रियां जिस तरह से उनका मानसिक शोषण करती हैं वह पुरुषों का सामूहिक बलात्कार ही है. किसी जवान पुरुष से पूछ कर देखें. पुरुष को सजा हो जाती है, लेकिन किसी स्त्री को कभी इस मामले में सजा होते आपने देखा है क्या.

हमें अपनी नैतिक ज़िम्मेदारियों को समझना चाहिये। समाज पतन की ओर जा रहा है ।हम उसे बचा सकते हैं।आइये अपने भाइयों , मित्रों , ब्लॉगर बन्धुओं ,पिताओं , दूसरों के पतियों , अपने बेटों को बचायें ।

Wednesday, August 20, 2008

साहित्य अकादमी मे बे-कार जाने का अंजाम


कभी कभी कुछ घटनाएँ या समान्य सी लगने वाली बात-चीत पर भी ज़रा ध्यान दिया जाए तो विचित्र और अक्सर महत्वपूर्ण तथ्य ,अनुभव या समझ प्राप्त होती है।यूँ ही कल हमारे साथ हुआ।सहित्य अकादमी, मण्डी हाउस ,में एक कार्यक्रम के लिए गये थे।विश्विद्यालय के छात्रों के प्रयासों से छपने वाली पत्रिका सामयिक मीमांसा के लोकार्पण का अवसर था।अभी कार्यक्रम ख्त्म नही हुआ था ,पर मुझे जाना था सो मै उठकर चली आयी।गेट के भीतर ही खड़ी मै अपनी एक मित्र की प्रतीक्षा कर रही थी कि गार्ड को न जाने कैसे हमारी फजीहत करने की सूझी।वह कुर्सी से खड़ा हुआ और एक गत्ते से सीट झाड़ता हुआ बोला -"मैडम बैठ जाएँ,गाड़ी आएगी तब आ जाएगी"
मुझे तत्काल कुछ न सूझा ,क्या कहूँ ,मेरे होंठ बस फड़क रहे थे कुछ उगलते नही बन रहा था।अब वह फिर बोला
"बैठिये मैडम , गाड़ी आती होगी "
मैने कहा-"नही ठीक है , आप ही बैठिये"
"हम तो दिन भर बैठते ही हैं मैड्म आप बैठिये खड़ी क्यों रहेंगी जब तक गाड़ी आती है" उसने जिस भी अन्दाज़ मे यह कहा मुझे ऐसा लगा कि मेरा उपहास उड़ाया है।मै लाल-पीली हो रही थी,मन मे आया एक अच्छी सी गाली उस पर पटक के मारूँ । हद है !एक तो गाड़ी , वह भी ड्राइवर वाली !!मैं बस या मेट्रो से नही जा सकती।
तभी गुस्सा काफूर हुआ ,गार्ड की इस बात से एकाएक लगा कि क्या साहित्य अकादमी में ऐसी ही महिलाएँ आती हैं जिनके पास ड्राइवर वाली गाड़ी होती है? मेरे इस अभाव{?}की बात रहने दें तो सोचती हूँ कि साहित्य अकादमी आते जाते रहना अफोर्ड करने के लिए एक खास वर्गीय चरित्र की मांग करता है क्या? वह भी एक स्त्री से ?बहुत सम्भव है कि एक मध्यवर्गीय नौकरीपेशा स्त्री के पास साहित्य अकादमी के लिए न तो वक़्त बचता होगा न ही ज़रूरत। यह बौद्द्धिक अय्याशी वह अफोर्ड नही कर सकती होगी।बौद्द्धिक अय्याशी न भी कहूँ तो यह भटकना , आवारगी उसके लिए कहाँ !!मैं भी तो यही सोच कर भागी थी घर कि 8 बज रहे हैं रात के , कल का दिन चौपट हो जाएगा।बेटे का यूनिट टेस्ट है कल। पति को पढाने को कह तो दिया है पर एक घण्टा और यहाँ रुकने का मतलब है कि खाना आज भी बाहर् से आयेगा।वे भी थके होंगे, अभी घर पहुँचे होंगे ।यहाँ न आती तो दिन भर की थकान उतारने के बाद खाना बनाने के अलावा भी समय बच जाता {ब्लॉगिंग के लिए}।उस पर अभी बाहर सड़क पर जाकर औटो या बस या मेट्रो में धक्के खाने थे।शोफर ड्रिवेन कार !! आह !यह दुनिया मेरे लिए नही है!नही है!मेरे लिए नही है तो ,किसी स्कूल टीचर ,क्लर्क के लिए या किसी भी सर्वहारा के लिए तो कैसे ही हो पाएगी।उस गार्ड के लिए भी नही जो रोज़ वहाँ गेट पर चौकी दारी करता है। इसलिए बौद्धिक अय्याशी है।

फिर एकाएक दूसरी बात सोची , गार्ड ने कहा था -हम तो बैठते ही हैं दिन भर । गार्ड दिन भर बैठता ही है तो .....!खैर , वह गार्ड कितनी तंख्वाह पाता होगा कि दिन भर वह "खड़ा" रहे और मैडमों व सरों को सल्यूट मारे या तमाम तहज़ीब व आदर सहित उन्हें गाड़ी का इंतज़ार बैठ कर करने को कहे।
बहुत साधारण सी बातें और हमारा मन भी उन्हें कहाँ कहाँ ले जाता है।सब ठीक है।सब ऐसा ही है। ऐसा ही चलता रहेगा।क्या सच ?

Thursday, June 26, 2008

जहाँपनाह खुश हुए ......

कभी पढा था जो राष्ट्र विद्वानों ,कलाकारों और साहित्य कारों को सम्मान नही देता उसका पतन नज़दीक होता है ।बहुत सही बात है । आजकल अकादमियाँ , संस्थाएँ ,चयन समितियाँ ,यही करती हैं । राजा-महाराजा युग में इसका तरीका कुछ और था । मैं कल्पना कर रही हूँ किसी दरबारी सीन की। घनानन्द ने छन्द पढा और राजा ने खुश हो कर सोने के सिक्कों की थैली उछाल दी । महाराज प्रसन्न हुए !! या मुगले-आज़म का सीन । अनारकली ने नृत्य पेश किया और बादशाह सलामत ने खुश होकर बेशकीमती हार उछाल दिया ।
कहने को सामंतवाद देश से जा चुका है । लोकतंत्र है । शासक नही हैं हमारे प्रतिनिधि हैं । ऐसे में आप यदि राष्ट्र के सर्वोच्च पद पर हैं और समृद्ध व सम्मानित व्यक्ति हैं और आपको कोई कविता भावविभोर कर जाती है तो आप उस अति भावुक क्षण में क्या करेंगे ?
कवि को गले से लगा लेंगे ?आपकी आंखें नम हो जाएंगी ? अब भी सुनते हैं लता मंगेशकर को 'ए मेरे वतन के लोगों....' गाते सुन पंडित नेहरू की आंखें भीग गयी थीं ।

ऐसा ही भावुक क्षण तब आया जब सुलभ शौचालय की 30 महिला कर्मचारियों का एक दल जो यू एन रवाना होने वाला है , राष्ट्रपति से मिलने पहुँचा और उनमें से एक लक्षमी नन्दा ने अपनी एक कविता 'पतन से उड़ान की तरफ' का पाठ किया । कविता एक महिला सफाई कर्मचारी के उत्थान की बात कहती थी जिसे सुनकर राष्ट्रपति इतनी भावविभोर हुईं कि तत्काल 500 रुपए का नोट निकाल कर लक्ष्मी को थमा दिया ।लक्ष्मी अति प्रसन्न थी । यह उसके लिए एक बेशकीमती नोट था जिसे वह कभी खर्च नही करेगी । निश्चित रूप से वह 500 का नोट एक टोकन था ,कोई बहुत बड़ी राशि नही थी । और लक्ष्मी भी उसे किसी स्मृति चिह्न की तरह ही सम्भाल कर रखेगी । पर मुझे अब भी यह सामंती अदा परेशान कर रही है । राष्ट्रपति उठ कर सफाई कर्मचारी लक्षमी को गले से लगा लेतीं तो उनका सम्मान मेरे मन में कई गुना बढ जाता । पर खुश होकर या भावुकता के क्षण में जब आपके विशिष्ट ,ज़िम्मेदार हाथ जेब से कुछ निकालने को आतुर हो जाएँ तो मेरे लिए यह निश्चित ही -जहाँपनाह खुश हुए ....! वाला सामंती अन्दाज़ ही है ..अखबार जिसे अनबिलीवेबल , हार्ट्वार्मिंग ,ब्रेथ टेकिंग घटना कह रहे हैं ....

Saturday, June 7, 2008

कहाँ से आए बदरा ..



दिल्ली से चम्पावत के रास्ते मे ये आवारा बादल कैमरे में कैद कर लाए ...